शनिवार, 25 जुलाई 2026

*मां से दादी बनने तक का सफ़र*

एक दिन मैंने मेरे भाई के बेटा होने के बाद, यूं ही, अपनी माँ से पूछा - "माँ...आपको दादी बनकर कैसा लगता है?"  मेरी माँ मुस्कुराई, उनके चेहरे पर चमक सी आ गई , उनकी आँखें जैसे, कहीं  ,बहुत दूर सी चली गईं. हो.,उन्होंने बहुत धीरे से कहा - "दादी बनना ऐसा है जैसे ज़िंदगी , एक बार फिर, माँ बनने का मौका दे रही हो...  

लेकिन इस बार ,ये,थोड़ा कम डर के साथ, थोड़ा ज़्यादा सुकून के साथ का पल होता है!  

पहले खुद के बच्चों को बड़ा करने की जल्दी थी, हर बात की चिंता थी,अपनी हर गलती पर डर सा ,भी लगता था..  

पर अब दादी बनने के बाद बस प्यार ही प्यार सा महसूस होता है ! एक सकून सा लगता है दुबारा अपने बेटे के बेटे को देखकर उसी की परछाई नजर आती है,

और ऐसे ही

अब जब मैं , तुम्हारे पोते को ,भी देखती हूँ, तो उसमें  मुझे ,तुम्हारा भी बचपन सा दिखता है !  

उसकी हँसी में तुम्हारी आवाज़, उसकी शरारतों में तुम्हारी परछाई !  

और तब मुझे लगता है कि क्या वक्त इतना  जल्दी गुज़र गया. है...  

कल तक तुम और भैया,दोनों, मेरी उंगली पकड़ कर चलते थे, और आज तुम दोनों , मासूम, का  प्यारा हाथ, थामे खड़ी हो !  

फिर माँ ने दोनों, को सीने से लगाया और मुस्कुराकर कहा -  

"माँ का प्यार इस तरह से कभी खत्म नहीं होता... वो बस इसी तरह एक गोद से ,दूसरी गोद तक, यूं ही  जीवन पर्यन्त चलता रहता है",।


सोमवार, 18 मई 2026

*गलतफहमी*

 जीन्स और टी शर्ट में आकर उसने हैलो आंटी कहा। मैंने भी प्रत्युत्तर में हैलो ही कहा। तभी उसकी माँ बोली, आंटी के पैर छुओ बेटा। उसको असहज देख कर मैंने कह दिया, रहने दो बेटा, उसकी कोई जरूरत नहीं है। बातों से एकदम बिंदास, खिलखिलाकर हँसने वाली, अपनी माँ से हर बात पर तर्क वितर्क करती "स्निग्धा" मेरे बेटे "सुयश" की पसंद ही नहीं प्यार भी थी ।

सुयश मेरा एकलौता बेटा है, जैसा नाम वैसा गुण । जब जब मैं दूसरा बच्चा न होने के लिए उदास होती तो विशाल कहते, ईश्वर ने दस बेटों के गुण दिए है हमारे सुयश में । लेकिन मेरा मन एक बेटी की चाहत में हमेशा कलपता रहा । सोचती थी बहू को ही बेटी का प्यार दूँगी। अपनी बहू की जो छवि मैंने सोची थी स्निग्धा उसकी बिल्कुल विपरीत थी। उसकी माँ ने ही हँसते हुए कहा, अपने नाम के विपरीत है स्निग्धा ! लड़कों की तरह वेश भूषा, हँसना, बोलना,अक्खड़पना भरा हुआ था उसमें, जाने सुयश को क्या दिखा इसमें !

शादी की रस्मों के बाद स्निग्धा हमारे घर आ गयी, लेकिन मेरा मन उसे लेकर हमेशा सशंकित रहता था। मासूम गुड़िया सी बहू लाना चाहती थी मैं अपने सुयश के लिए पर ये तो ! हमेशा डर लगता था कि अगर मैं उसे अपने घर के तौर तरीके समझाऊँ तो वो मेरे साथ क्या व्यवहार करेगी । मैं इन्हीं सब उधेड़बुन में लगी हुई थी और सुयश स्निग्धा अपना हनीमून मना कर वापस भी आ गए ।

अगले दिन से दोनों को आफिस जाना था। सुबह की नींद मुझे बहुत प्यारी थी, सोचती थी बहू आ जायेगी तो उसके हाथों की चाय पीकर अपने सुबह की शुरुआत करूँगी। लेकिन स्निग्धा को देख कर मैंने अपना ये सपना भुला दिया और सुबह 6 बजे का अलार्म लगा कर सो गई ।

पूजा की घंटियाँ सुन मेरी नींद खुली, अभी छः भी नहीं बजे थे। बाहर निकल कर देखा, स्निग्धा आरती की थाल लिए, पूरे घर में घूम रही थी। मुझे लगा मैं सपना देख रही हूँ, तब तक वो पास आकर बोली मम्मा प्रसाद लीजिये ।

फ्रेश होकर बाथरूम से निकली तो मैडम चाय के दो कप लिए हाजिर थीं। चाय पीने के बाद बोली मम्मा मुझे नाश्ते में बस सैंडविच और चीला बनाना ही आता है। आप लोग नाश्ते में क्या खाते हैं? पीछे से सुयश आकर बोला, जो भी तुम बनाओ हम वही खायेंगे।

सुयश ने मेरा हैरान चेहरा देख कर पूछा," क्या हुआ माँ, चाय पसन्द नहीं आयी !

नहीं रे इतनी अच्छी चाय तो खुद मैंने ही नहीं बनाई कभी !"

फिर मैंने स्निग्धा से कहा,"तुम्हें ऑफिस जाना है बेटा, तैयार हो जाओ। अभी मेड आ रही होगी मैं उसके साथ मिलकर नाश्ता बना लूँगी।"

अरे नहीं मम्मा नाश्ता तो मैं ही बनाऊँगी, फिर तो मैं पूरा दिन आफिस में रहूँगी तो घर पर सब आपको ही देखना पड़ेगा।

स्निग्धा कभी कोई मौका नहीं देती थी कमी निकालने का, लेकिन मैं फिर भी डरी रहती कि यह इसका छ्द्म तो नहीं ! 

मन ही मन भले ही डर रही थी लेकिन उसके जैसी बहू पाकर बहुत खुश थी मैं, पर खुशियों को भी कभी-कभी नजर लग जाती है ! सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था कि विशाल को हार्ट अटैक आ गया, ऐसा लगा जैसे मेरा जीवन ही उजड़ गया ! मैं उन्हें आई सी यू के बाहर से देख घंटों रोती रहती, उस समय मेरी स्निग्धा ने मुझे सास से बेटी बना दिया। मुझे अपनी बाहों में भरकर चुप कराती, जबरदस्ती अपने हाथों से खाना खिलाती। हर वक़्त यही कहती पापा बिल्कुल ठीक हो जायेंगे। हॉस्पिटल के बिल, दवाइयों का खर्चा इस तरह से देती जैसे उसके अपने पापा का इलाज हो रहा हो ।

मैंने आई सी यू के बाहर खड़ी होकर विशाल को देखती उसकी नम आँखों को भी देख लिया था । सुयश और मेरे सामने मजबूत चट्टान बनी मेरी स्निग्धा वास्तव में बहुत कोमल थी। घर आने के बाद भी विशाल का ख्याल हम दोनों से ज्यादा रखती । अपनी नई नवेली शादी के बावजूद देर रात तक हमारे साथ बैठी रहती ।

मासूम गुड़िया सी बहू का सपना देखने वाली सास को एक मजबूत बेटी मिल गयी थी। जिसका चोला पाश्चात्य था पर दिल एकदम देशी था ।

आज मेरे जन्मदिन पर सुयश ने कहा,"माँ, तैयार हो जाइए,आपकी पसन्द की साड़ी खरीदने चलते हैं। "मुझे कुछ नहीं चाहिए सुयश ! तूने स्निग्धा के रूप में मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा दे दिया ! मेरी भीगी आँखे पोछ कर सुयश ने पूछा, वैसे है कहाँ आपकी दबंग बहू? जिसने अपनी दबंगई से आपका भी दिल जीत लिया ! तब तक स्निग्धा ने मेरे गले में अपनी बाहें डाल कर कहा, हैप्पी बर्थडे मम्मा और एक पैकेट पकड़ाते हुए कहा, ये दुनिया की बेस्ट मम्मा के लिए, पैकेट खोल कर देखा, तो उसमें कांजीवरम साड़ी थी, बिल्कुल वैसी ही जैसी मैं हमेशा से लेना चाहती थी ! मेरे आश्चर्य चकित चेहरे को देखकर बोली, वो जब आप रेखा की तस्वीर गूगल पर सर्च करके घंटों देखती थीं तभी मुझे समझ आ गया कि आप उनकी तस्वीरों में देखती क्या हैं ! अपनी जोरदार हँसी के साथ उसने फिर से मुझे गले लगा लिया। खुशी में बहते आँसुओं को पोछकर उसने कहा, “एक माँ के दिल की बात एक बेटी तो समझ ही जाती है ना मम्मा"! हाँ मेरी स्निग्धा, साड़ी सूट बहुत कम पहनती है, वो हर रोज हमारे पैर भी नहीं छूती, उसकी आवाज भी धीमी नहीं है, उसे घर के काम भी नहीं आते, रोटी तो भारत के नक्शे जैसी बनाती है,और जब गुस्साती है तो....उफ्फ पूछिये ही मत ! वो एक आदर्श बहू की छवि से बिल्कुल जुदा है लेकिन मेरे लिए सबसे खास है। 

तभी तो विशाल कहते हैं, आदर्शों नियमों पर पड़ गयी भारी, सबसे प्यारी बहू हमारी |

Credit for unknown

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

*एक अजनबी*

 *एक अजनबी*


मैं ओला चलाता हूँ।

ज़्यादातर नाइट शिफ्ट करता हूँ। पिछले हफ्ते रात ग्यारह बजे एक बुज़ुर्ग सज्जन को उठाया।  सफ़ेद पंजाबी धोती, आँखों में थकान—लेकिन आवाज़ में अजीब-सी दृढ़ता।*


गाड़ी में बैठते ही बोले,

*“आज रात मुझे पाँच जगहों पर ले चलना होगा । मैं तुम्हें 5000 रुपये दूँगा। नकद, लेकिन अंत तक कारण मत पूंछना।”*

   यह कहकर एक कागज़ आगे बढ़ाया।  उस पर पाँच पते लिखे थे ।


*पहला पड़ाव-*

दक्षिण कोलकाता का एक पुराना घर।

मैंने गाड़ी रोकी।  वे उतरे नहीं। सिर्फ़ खिड़की का शीशा नीचे करके देखते रहे। दस मिनट तक।

आँखों से निरंतर आँसू बह रहे थे, लेकिन कोई आवाज़ नहीं।

“चलो… अगला।”


*दूसरा पड़ाव-*

एक प्राथमिक विद्यालय।  गेट बंद। अंदर अँधेरा मैदान।

वे उतरकर धीरे-धीरे झूले तक गए।  एक झूले पर बैठकर हल्के-हल्के झूलने लगे।

बीस मिनट बाद लौटे।  बोले -

“यहीं पढ़ाता था। तैंतालीस साल।  ज़िंदगी का सबसे अच्छा समय यही था।”


*तीसरा पड़ाव-*

एक छोटा पुराना कॉफ़ी हाउस।

अंदर जाकर एक कप चाय मँगाई।  कोने की मेज़ पर अकेले बैठे रहे। चाय को छुआ तक नहीं।  बस चारों ओर देखते रहे।

पंद्रह मिनट बाद लौटकर हल्के से मुस्कुराए -

“यहीं, मेरी और मिताली (उनकी पत्नी) की पहली मुलाक़ात हुई थी। 1969 में।”


*चौथा पड़ाव-*

निमतला श्मशान घाट।

वे उतरे।  चिताभस्म के पास एक फ़लक के सामने खड़े होकर धीमे-धीमे कुछ बोलते रहे।  मैं सुन नहीं पाया।

आधे घंटे बाद लौटे।  आँखें लाल थीं।

“आज तीन साल हो गए उसे गए।”


*पाँचवाँ पड़ाव-*

एक बड़ा सरकारी अस्पताल।

गाड़ी पार्क करने को कहा।  फिर मेरी ओर देखा -


*“अब कारण बताता हूँ।  मुझे चौथे स्टेज का कैंसर है। डॉक्टर ने कहा है— कुछ हफ़्ते… शायद कुछ दिन। आज मैं अपनी पूरी ज़िंदगी आख़िरी बार देख लेना चाहता था।”*

मैं स्टीयरिंग पर सिर रखकर रोने लगा।

उन्होंने कहा—

*“वो घर—जहाँ बच्चों को बड़ा किया।*

*वो स्कूल—जहाँ अपना उद्देश्य पाया।*

*वो कॉफ़ी हाउस—जहाँ प्यार हुआ।*

*वो श्मशान—जहाँ आख़िरी विदाई दी।*

*और ये अस्पताल—जहाँ आज भर्ती होऊँगा। अब घर वापसी नहीं होगी।”*

उन्होंने मेरे हाथ में 5000/- रुपये रख दिए।

*“धन्यवाद, तुमने मुझे मेरी ज़िंदगी एक बार फिर घुमा दी।  मेरे आख़िरी अजनबी इंसान...जिसने मेरे साथ कोमल व्यवहार किया।”*

मैंने कहा—

“नहीं, ये मैं नहीं ले सकता ।”

वे बोले—

*“लो,  देने के लिए मेरा कोई नहीं।  बच्चों ने इतनी दूरी बना ली है कि अब वो बात नहीं करते। यार-दोस्त कोई बचा नहीं, एक-एक करके सब विदा हो गये।  तुमने तीन घंटे दिए—तीन घंटे की इंसानियत। उसकी कीमत पैसे से ज़्यादा है।”*

छोटा सूटकेस लेकर वे अंदर चले गए।

*अगले दिन मैं अस्पताल गया। पूछा—“श्री अनिरुद्ध मुखर्जी।  केबिन 412”।*

फूल लेकर अंदर गया।  मुझे देखकर मुस्कुराए —

“तुम आए?”

“आपको ऐसे छोड़ नहीं पाया।”

*दो घंटे बातें हुईं—मिताली देवी की, उनके छात्रों की, उनके रूठे हुए बच्चों की।*

मैं रोज़ जाने लगा। चाय ले जाता। अख़बार पढ़कर सुनाता।  कभी चुपचाप बैठा रहता।

एक दिन बोले—

*“सोचता था अकेला मरूँगा।  लेकिन तुम हो।  आख़री वक़्त में एक अजनबी, परिवार बन गया।  तुम्हें मेरा बहुत-बहुत आशीर्वाद।”*

मैंने उनका हांथ पकड़ा—

*“आप अकेले नहीं हैं।”*

*मंगलवार भोर 3 बजकर 17 मिनट पर वे स्वर्ग चले गए।*

*मैं उनका हांथ पकड़े बैठा था।*

आख़िरी शब्द थे—

*“सबसे कहना… अजनबियों की ओर देखना।  सचमुच देखना।  हम सब कहीं जा रहे हैं—कोई तेज़, कोई धीरे। जाते हुए राह में दया करना। तुमने की।  तुमने मेरे आख़िरी दिनों को जीने लायक बना दिया।”*

मॉनिटर की आवाज़ सीधी रेखा बन गई।

*श्मशान में उनके दाह-संस्कार के समय थे—कुल छः लोग -*

मैं,

तीन नर्स,

एक वकील,

और एक पूर्व छात्र।

*तैंतालीस साल की शिक्षकी।*

*बावन साल का दांपत्य।*

*इक्यासी साल की ज़िंदगी।*

*छह लोग।*

मैंने कहा—

“अनिरुद्ध बाबू ने मुझे सिखाया-

*हर अजनबी किसी का पूरा संसार होता है।*

*हर यात्री एक कहानी है।*

*हर इंसान जी रहा है, मर रहा है, इंतज़ार कर रहा है—कोई उसे देखे।*

उन्होंने मुझे 5000/- रुपये दिए थे जीवन की सड़क पर गाड़ी चलाने के लिए।

*लेकिन जो शिक्षा दी—उसकी कीमत पैसे से कहीं ज़्यादा है।*

"मानवता कोई *अतिरिक्त चीज़ नहीं। यही सब कुछ है।”*

आज भी वो 5000/- रुपये मेरे ग्लव बॉक्स में रखे हैं। खर्च नहीं किए।

*क्योंकि हर यात्री शायद अपनी आख़िरी यात्रा पर हो।  हर अजनबी शायद आख़िरी विदाई दे रहा हो।*

इसलिए अब मैं अलग तरह से गाड़ी चलाता हूँ।

*पूंछता हूँ। सुनता हूँ। लोगों को देखता हूँ।*

क्योंकि एक बुज़ुर्ग शिक्षक ने *एक कोमल रात माँगी थी-और एक अजनबी रुक गया था।*

*निशब्द क्षण, अनकहा सत्य।*

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

**बीते लम्हों की यादें**

 *मैंने सोचा था*

मां अपनी चंद मधुर स्मृतियों को

अपने हृदय की तिजोरी में

बंद कर दूंगी 

जहाँ न कोई कर सकेगा चोरी 

न कोई जाँच होगी।


डर था, पहले 

अगर ज़ब्त हो गईं ये यादें,

*तो क्या शेष रहेगा मेरे पास?*


इसलिए अब हर रोज़

थोड़ा-थोड़ा बाँट देती हूँ

शब्दों में,

कविताओं में,

*कहीं पत्रों में,*

कहीं कहानियों में,

ताकि जब तक मैं हूँ,

तब तक बीते लम्हों का

कोई न कोई हिस्सा

*सांस लेता रहे इस संसार में..*


........ अनिता ✍️

रविवार, 12 अप्रैल 2026

**एक औरत**

 सुनो


एक औरत को क्या चाहिए

और क्या होती है

आज में आपको बताती हूं 

💫💫💫💫💫💫💫

थोड़ा सा समय प्रेम और

आत्मसम्मान वो चाहती है

💫💫💫💫💫💫💫

धीरज रखती हृदय में 

शीतल सा मन रखती है

💫💫💫💫💫💫💫

ये वो नारी है जो नारी के रूप में

स्वरूप देवियों का रखती है

💫💫💫💫💫💫💫

कभी बन के लक्ष्मी धन लुटाए

कभी काली बन के नाश करती!!

💫💫💫💫💫💫💫💫

एक औरत को सिर्फ प्रेम और सम्मान चाहिए 

जो घर परिवार को मजबूत बना सके😊🙏

अनिता ✍️

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

**कभी तुम**

 कभी तुम 

अकेले में देखना 

*तारों को ,_____*


जो कोई तारा

 तुम्हे देखकर 

टिमटिमाया

*समझ लेना*

*वो मैं हूँ.......*


कभी तुम 

खामोश हो

 यूँ ही टहलना,

चली जो भीनी हवा

 तुमसे लिपटकर

*समझ लेना*

 *वो मैं हूँ..____*


कभी तुम 

उदास होके 

अकेले खड़े हो,

उस पल 

जो आंसू गिरे 

तुम्हारे गालो को छूकर

*समझ लेना*

 *वो मैं हूँ..______*


कभी तुम 

जो यूँ ही

 अकेले में सोच के 

कुछ मुस्कुराओ 

उस पल जो

 सुकून मिले 

तुम्हारे मन को

*समझ लेना* 

*वो मैं हूँ..*

अनिता

......... ✍️


गुरुवार, 5 मार्च 2026

*नया जीवन

 यूं तो वृद्ध आश्रम में, उन दोनों को साथ साथ रहते ,दोनों को करीबन आठ माह से ऊपर हो गए थे, थोड़ी जान पहचान हो ही गई थी!

एक दिन, शाम 68 वर्षीय गजेंद्र जी ने, कुछ सोच विचार के बाद सामने बैठी 63 वर्ष की गीता बाली से कहा—

“क्यों न हम अपने बचे हुए जीवन की एक नई शुरुआत करें?”

क्या आप मुझसे शादी करेंगी...

अचानक से आए प्रस्ताव को सुनकर 

गीता जी कुछ पल तो चुप रहीं।

उनकी आँखों  में डर था लेकिन उससे ज़्यादा थकान थी

उन्होंने धीरे से कहा—

“मेरी अपनी कोई संतान नहीं है उनका

थोड़ा गला भर आया 

फिर वो बोलीं—

“मेरे पति प्राइवेट नौकरी में थे।

दस साल पहले गुजर गए।मेरे अपने बच्चे तो नहीं थे पर ज्वाइंट फैमिली थी, धीरे धीरे सबके रहते भी उस घर में, मेरी आवाज़ ,को सबने दबा सा दिया था,ऐसा लगने लगा था कि मैं सबके ऊपर बोझ सी बनती जा रही हूं ।”

जेठ जेठानी,देवर देवरानी ,उनके सबके बच्चे है ,

लेकिन किसी को मेरी ज़रूरत नहीं रही ..जबकि . उन सबके कहे अनुसार, मेने अपनी,सारी प्रॉपर्टी उनके सब बच्चों, के नाम से कर दी और कुछ समय के बाद वो ही लोग मुझे यहां छोड़ गए।”इतना कहते हुए वो सिसकने लगीं,तब गजेन्द्रजी

बोले—

“मेरे पास अपना घर है,पेंशन है,इलाज की सारी सुविधा भी है…

बस किसी का भी साथ नहीं है,मेरी पत्नी को गुजरे 2 साल हो गया .एक ही बेटा हे जो बहू के साथ विदेश में हमेशा के लिए बस गया है ,कहते हुए उनका गला भर गया

फिर बहुत धीमे स्वर में वो बोले—बस इसी

“मुझे मजबूरी में मुझे यहाँ रहना पड़ रहा है। यहां हमउम्र लोगों का साथ, एक सकुन देता है,

अगर आप मेरा साथ दें तो हम इस वृद्ध आश्रम से निकलकर,मेरे अपने घर में आराम से रह सकते हैं।

मैं आपका सहारा बनूँगा और आप मेरा।”

गीता देवी की आँखों से आँसू गिर पड़े।

वह बोलीं—

“लेकिन ये समाज…क्या कहेंगा? लोग हमें क्या बोलेंगे?

इस उम्र में विवाह !!! 

 गजेंद्र जी की आवाज़ में पहली बार कठोरता थी—

“कौन_सा_समाज?

वही समाज जिसने कभी यह किसी से नहीं पूछा

कि परिवार के रहते भी एक पिता आश्रम में क्यों गया?

वही_समाज?

आपके परिवार वालों से जाकर ,यह कभी,किसी ने नहीं पूछा कि अपनों ने ही, आपके साथ, इतना बड़ा धोखा क्यों किया ?

कौन से समाज ने हमें अपने घर रखा?

किस समाज ने आकर ,हमारे आँसू पोंछे?

तो अब हम , समाज से इजाज़त क्यों माँगें?”

उस दिन गीता देवी ने पहली बार

खुद को बेकार नहीं, ज़रूरी सा, महसूस किया।

मन ही मन प्रण करने का सोचा और उन्होंने गजेन्द्रजी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया,

कुछ दिनों बाद दोनों ने विवाह कर लिया।

कोई शोर नहीं था कोई रिश्तेदार नहीं था।

बस दो टूटे जीवन थे—

जो एक-दूसरे के सहारे फिर से जुड़ रहे थे।


 ✍🏼 अनिता सुखवाल

         उदयपुर 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

*सुनहरे वर्षों का नया श्रृंगार*



बुजुर्ग होते ही सबसे बड़ी समस्या वक्त गुजारने की होती है क्यूंकि घर के सारे सदस्य भी अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं,अब खाली समय खूब रहता है!
मुझे कला और रचनात्मकता, क्रिएटिविटी के साथ गायकी का भी, शुरू से शौक रहा था, परन्तु घर गृहस्थी को संभालने के वक्त, समय नहीं मिला, ये मेरा शौक अब न केवल समय बिताने का जरिया है, बल्कि मन को शांति, सकून के साथ,जीवन को एक नई ऊर्जा सी भरता है।

जीवन की लंबी यात्रा में जब हम 'सीनियर सिटीजन' के पड़ाव पर पहुँचते हैं, तो अक्सर लोग इसे विश्राम का समय मानते हैं। लेकिन असल में, यह समय स्वयं को खोजने और उन सपनों को जीने का है जो जिम्मेदारियों के शोर में कहीं दब गए थे। वास्तव में यह खाली समय नहीं, यह 'अपना' समय (ME TIME)है
काम और परिवार की व्यस्तताओं से मुक्त होने के बाद, वक्त का एक बड़ा हिस्सा हमारे पास होता है। हमारी खोई हुई रचनात्मकता, इस खालीपन को, रंगों, धागों या गायकी के शब्दों से भर देती है। जब हम कुछ नया बनाते हैं चाहे वह पेंटिंग हो, बुनाई हो, या कोई अन्य कला ,तो यह केवल एक वस्तु नहीं होती, बल्कि हमारे अनुभवों का निचोड़ होती है।
 मन की शांति और स्वास्थ्य का संगम,का
कला से, सीधा संबंध ,हमारे मानसिक स्वास्थ्य से है। जब हम किसी रचनात्मक कार्य में डूब जाते हैं, तो तनाव कम होता है! एकाग्रता बढ़ने से मन शांत रहता है साथ ही याददाश्त तेज रहती है! नई चीजें सीखना सिखाना ,और उनकी बारीकियों पर ध्यान देना , हमारे मस्तिष्क को सक्रिय रखता है।
अकेलेपन से मुक्ति मिलती है ,हमारी ये कलायें ही,हमें खुद का सबसे अच्छा दोस्त बना देती है।
सृजन का आनंद लेते हुए ,जब एक कोरे कैनवास या कागज पर रंग बिखेरना, या ऊन के गोलों से एक सुंदर स्वेटर बुनना, पुराने गीतों को गाकर,मुझे एक अलग ही संतुष्टि का अनुभव देता है। एक अहसास सा होता है कि "मैंने कुछ नया सीखा है ,बनाया है", यही मेरे अंदर के आत्मविश्वास को बढ़ाता है।में सोचती हूँ हमारी यही कल्पना शक्ति,आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनमोल विरासत और प्रेरणा बन सकती है।
बढ़ती उम्र का मतलब रुकना नहीं, बल्कि अपनी पसंद के रंगों में, रंग जाना होता है। रचनात्मकता वह खिड़की है जिससे हम दुनिया को, फिर से एक बच्चे की जिज्ञासा की तरह देख सकते हैं। तो चलिए, अपनी रुचि को पहचानें और इस सुनहरे समय को और भी हसीन बनाएँ।कहते हैं कि उम्र केवल अंकों का खेल है, और जब हाथ में ब्रश और सामने एक कोरा कैनवास हो, तो समय जैसे ठहर सा जाता है। मेरे लिए पेंटिंग और गायकी केवल एक शौक नहीं, बल्कि मौन संवाद का, एक खूबसूरत नजरिया सा है। अपनी अनुभूतियों को हम इसी तरह जीवंत रख सकते हैं।
 
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, मन को शांत और केंद्रित रखना एक चुनौती होती है। कार्य एक प्रकार का 'सक्रिय ध्यान' (Active Meditation) है। ब्रश के हर स्ट्रोक और रंगों के मिश्रण पर ध्यान लगाने से मन की उथल-पुथल शांत हो जाती है औरगायकी से एक असीम शांति का अनुभव सा होता है।
 नए रंगों को मिलाना और अलग-अलग तकनीकों को सीखना मन को युवा बनाए रखता है।
 कभी-कभी जो बातें हम कह नहीं पाते, वे पेंटिंग के जरिए रंगों के रूप में बाहर आ जाती हैं।
 इसी तरह गायकी करते समय ,घंटों का पता नहीं चलता, जिससे बोरियत या अकेलेपन की जगह सृजन का आनंद ले लेता है।

जब हम अपनी बनाई हुई पेंटिंग को घर की दीवार पर सजाते हैं या अपने नाती-पोतों को दिखाते हैं, तो उनकी आंखों की चमक हमें एक नई ऊर्जा देती है। यह कला हमें समाज और परिवार से एक नए रूप में जोड़ती है।

जीवन एक जादुई सफर है जहाँ कोई 'गलती' नहीं होती, बस नए प्रयोग होते हैं। हमारे पास अनुभवों का जो खजाना है, उसे कैनवास पर बिखेरने का और माइक हाथ में पकड़के गाने का ,सबसे सही समय यही है। 
"हाथों की लकीरें भले ही धुंधली पड़ जाएं, लेकिन रंगों से बनी यादें हमेशा चमकती रहती हैं।"
 "कलाओं की कोई उम्र नहीं होती, बस एक दिल चाहिए जो धड़कना और बनाना जानता हो।"

अनिता सुखवाल
उदयपुर 


रविवार, 21 दिसंबर 2025

*मैं कौन हूँ*

 *मेरा एक बेटा  

एक बेटा डॉक्टर है और....*

*दूसरा बेटा प्रिन्सिपल है॥*

*💐 पर....मैं कौन हूँ? 💐*

*मेरे जीवन काल का रिटायरमेंट जब आ रहा है उस के बाद का, जब जीवन में ख़ालीपन और अकेलापन आया, तब आत्मचिंतन की एक गहरी अनुभूति हुई।*

*तो बताती हूँ, मैं कौन हूँ?*

*मेरे पति ने एक  बंगला बनाया। एक बड़ा सा फ़ार्म हाउस बनाया।*

*फिर भी आज,हम दोनों  अकेले चार दीवारों में क़ैद हैं।*

* हमने साइकिल से शुरुआत की, फिर मोपेड, बाइक और कारों तक का खूब सफर किया।*

*पर फिर भी आज, कमरे में नंगे पाँव चलते हैं।*ताकी वाकिंग हो जाये

*प्रकृति  थी,मुस्कराई भी और पूछा, “तुम कौन हो, मेरे मित्र?”*

*मैंने गर्व से उत्तर दिया,नहीं “मैं..तो. मैं हूँ।”*

*हमने राज्यों, देशों और विदेशों की यात्राएँ कीं।*

*फिर भी आज उम्र के पड़ाव पर यात्रा, ड्राइंग रूम और रसोई तक सीमित है।*

*हमने अनेक संस्कृतियाँ और परंपराएँ समझीं।*

*फिर भी आज, अपने ही परिवार को समझने की कोशिश करते हैं।

*हमने हमेशा  जन्मदिन, सगाई और शादी को बड़े धूमधाम से, उत्सव जैसा बनाया।*

*फिर भी आज, किराने का बजट तो बनाती ही हूँ।*

*कभी गायों और कुत्तों के लिए रोटियाँ बनवाती थी।*

*फिर भी आज, ख़ुद कुछ निवाले ही खा पाती हूँ।*

*सोना, चांदी, हीरे, मोती—*

*सभी तिजोरी में बंद हैं।*

*महंगे लहंगे सूट और साड़ियां —अलमारी में रखे हैं।*

*फिर भी आज, एक साधारण सूती कपड़े में ही घूमती हूँ।*

*मैंने अंग्रेज़ी, हिन्दी मालवी मेवाड़ी सीखी।*

*फिर भी आज, अपनी मातृभाषा हिंदी में ही समाचार पढ़ती हूँ।*

*कार्य और लाभ के लिए, लगातार यात्रा करती रही।*

*फिर भी आज, भी न जाने क्यूं, उसके लाभ-हानि पर विचार करती हूँ।*

*मैंने प्रेम पूर्वक निष्ठा भाव से, परिवार बसाया, कई रिश्ते बनाए।*

*फिर भी आज, सबसे गहरा रिश्ता दोस्तों ओर पड़ोसियों से है।*

*पढ़ाई में हज़ारों नियमों का पालन किया, किताबों से ज्ञान बटोरा।उसको बाटा भी*

*फिर भी आज, ये जीवन जीने के लिए, व्यवहारिक ज्ञान पर निर्भर हूँ।*

*एक पूरी ज़िंदगी, संघर्ष करते और दुनिया के पीछे भागते हुए बीती।

*परन्तु अब पहली बार, जब हाथों में कभी माला घुमाती हूँ,*

*तब अंतर आत्मा की आवाज़ सुनाई दी है।*

*अब बहुत हो चुका…*

*जागो यात्री!*

*अब अंतिम यात्रा की तैयारी करने का समय है।*

*प्रकृति फिर मुस्कराई और पूछा, “तुम कौन हो, मेरे मित्र?”*

*अब मैंने उत्तर दिया:*

*"हे प्रकृति, मैं तो शायद सदा से तुम्हारा ही अंश हूँ।"*

*किंतु मैं महत्वाकांक्षाओं के आकाश में उड़ती थी।*

*परन्तु अब सत्य के धरातल पर लौट आई हूँ।*

*मुझे क्षमा करो…*

*एक और अवसर दो, जीवन को तुम्हारे नियमों में बांधकर, जीने का।

*एक सच्चे इंसान की तरह जीने का…*

*संस्कारों और मूल्यों के साथ जीने का।*

*परिवार और प्रेम के साथ जीने का।*

मेँ भी तो समझूँ के मैं कौन हूँ? 💐 

  

रविवार, 14 दिसंबर 2025

*आने की खबर*

 छुट्टियों में बच्चों के 

   आने की खबर पाकर

       मां बौरा सी जाती है !

           साफ-सफाई की धुन में

              यहां वहां फर्नीचर से टकरा 

                   घायल हो जाती है

                     सच में मां बौरा सी जाती है! 

चादर, तकिए, रजाई, तौलिए

   तहाकर रखने में मगन

       भूखी-प्यासी, रहकर

            पूरा घर सजाती है

                सच में मां बौरा सी जाती है!    

अचार, मुरब्बे, चटनी, पापड़

   मर्तबान में सहेजती अक्सर       

        धूप-छांव के फेर में पड़कर

              कुछ मुरझा सी जाती है

                  सच में मां बौरा सी जाती है! 

हरदिन नया पकवान बना

    चखकर,  मन ही मन 

        इठला सी जाती है

           सच में मां बौरा सी जाती है! 

तय दिन की बाट जोहती

    घड़ी की धीमी चाल देखकर

        कुछ उकता सी जाती है

            सच में मां बौरा सी जाती है! 

मुहल्ले भर को बच्चों के आने की

      खबर सुनाती ,चलता-फिरता 

            एक अखबार बन जाती है! 

                सच में मां बौरा सी जाती है! 

बाद जाने के उनके फिर, 

  सूने पड़े कमरों में

     बच्चों की गूंजती हंसी और किस्से 

           मन ही मन दोहराती जाती है, 

                 सच में मां बौरा सी जाती है !


हमें भी हरबार 

घर जाने पर मिलती 

बौराती सी मां 

हरबार पुराने किस्से 

दोहराती सी मां।


*आराम दायक बुढ़ापा*

 अब तो बुढ़ापा पहाड़ सा लगने लगा है:उम्र जब बढ़ती है, तो शरीर ही नहीं, मन भी थकने लगता है। पहले जो रास्ते आसान लगते थे, वही उम्र ढलने पर पहाड़ जैसे ऊँचे दिखाई देने लगते हैं। बुढ़ापा सच में कोई बीमारी नहीं, न ही कोई अभिशाप है—लेकिन यह एक ऐसा सफ़र है जहाँ इंसान को अपने ही कदम भारी महसूस होने लगते हैं।

पहले हम दुनिया को अपने इशारों पर नचाते थे, आज अपने ही जूते के फीते बांधने में साँस फूला करती है। यही उम्र का नियम है, और यही जीवन का सबसे सच्चा चेहरा।धीरे-धीरे सब बदलने लगता है।रात को देर तक जागना मुश्किल, सुबह जल्दी उठना मजबूरी।पहले काम करने की इच्छा रहती थी, अब आराम करने का मन करता है, लेकिन आराम भी कहाँ मिलता है?मन में एक अजीब बेचैनी, एक खालीपन—जैसे कोई अदृश्य बोझ कंधों पर रख दिया हो।पहाड़ का भार शरीर पर नहीं पड़ता, मन पर पड़ता है। यही बुढ़ापा है।बुढ़ापे में सबसे बड़ी तकलीफ़ यह नहीं कि शरीर कमजोर हो गया, बल्कि यह है कि लोग भावनाओं को कमजोर समझने लगते हैं।पहले हमारे सुझावों में वजन था, आज वही शब्द किसी को पसंद नहीं आते। बच्चे बड़े हो गए, अपनी दुनिया बना ली; दोस्त अपनी-अपनी ज़िंदगी में खो गए। रिश्तों की गर्मी धूप सी थी, जो धीरे-धीरे परछाईं बन गई।कभी-कभी लगता है कि हम सबके लिए ज़रूरी थे, पर अब सिर्फ औपचारिकता भर रह गए हैं।यही है बुढ़ापे । का पहाड़—शरीर नहीं, मन ढहता है।एक समय था जब घर में हर चाहिए-वाले काम में हमारी पूछ होती थी।आज घर में बैठकर भी ऐसा लगता है जैसे मेहमान हों।पहले घर में हमसे पूछे बिना कोई फ़ैसला नहीं होता था।आज फैसला बताने की भी ज़रूरत नहीं समझते।ये बदलाव चुभते हैं, कचोटते हैं और अंदर ही अंदर इंसान को तोड़ते हैं।और सबसे बड़ा बोझ है अकेलापन।ये अकेलापन धीरे से, चुए पके से, बिना आवाज़ किए दिल के अंदर घुसता है।कभी रात को करवट बदलने पर एहसास होता है कि बात करने वाला कोई नहीं है।कोई यह पूछने वाला नहीं कि खाना खाया या नहीं।कई बार तो मन करता है बस कोई आकर थोड़ी देर बात कर ले, हाथ पकड़ ले या पीठ पर हल्का सा हाथ रख दे।पर ज़िंदगी में ऐसा किस्मत से ही मिलता है।बुढ़ापा कठिन इसलिए नहीं है कि हम बूढ़े हो गए, बल्कि इसलिए है कि दुनिया जवान रहना चाहती है।हम जब जवान थे, हमें भी ऐसा ही लगता था।उम्र ढलते-ढलते समझ आता है कि असली खुशी किसी चीज़ में नहीं, बस अपनेपन में होती है।लेकिन यह अपनेपन की तलाश हर बूढ़े इंसान को पहाड़ जैसी लगती है।फिर भी बुढ़ापा सिर्फ दर्द नहीं, सीख भी है।यही उम्र बताती है कि जो चीजें हम पूरी ज़िंदगी समझ नहीं पाए, अब धीरे-धीरे साफ होने लगती हैं।इंसान को यह एहसास होता है कि असली ताकत शरीर नहीं, मन में होती है।और अगर मन मजबूत रहे, तो पहाड़ भी टुकड़ों में बँटने लगता है।बात सिर्फ सोच की है—उम्र नहीं तोड़ती, अकेलापन तोड़ता है; और अकेलापन सिर्फ तभी जीतता है, जब हम अंदर से हार मान लेते हैं।इसलिए बुढ़ापे को पहाड़ समझने के बजाय, उसे यात्रा समझिए।धीमी सही, कठिन सही, लेकिन यह भी एक चरण है जिसमें मन को नए तरीके से जीवित रखना पड़ता है।सुबह उठकर अपनी एक वजह ढूँढना—चाहे वो पौधे हों, पूजा हो, पढ़ना हो, किसी से बात करना हो और अब अब तो मीडिया में  ढेरों ऑप्शन आ गए हैं जिससे आप अपना समय, आराम से पास कर सकते हैं ,और इस के साथ अपना ज्ञान भी बढ़ा सकते हैं —यही उम्र की असली ताकत है।

जिंदगी अभी भी है, और जीने की हिम्मत अभी भी बाकी है।


*भविष्य का आईना*

 बुढ़ापा वह दरवाज़ा है जहाँ से हर इंसान अकेले गुजरता है…और अंदर सिर्फ़ सन्नाटा रहता है। कहते हैं मौत अचानक आती है…नहीं। मौत धीरे-धीरे आती है। पहले रिश्तों से दूर करती है, फिर आवाज़ों से, फिर यादों से। और एक  दिन इंसान अपने ही घर में अनजान बन जाता है।

सबसे खतरनाक क्षण वह नहीं जब दिल धड़कना बंद हो…

सबसे भयानक वह है जब कमरा भरा हो फिर भी आवाज़ सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक की आए।

बाहर लोग कहते हैं — दादी जीआराम कर रहे होंगे…

अंदर दिल चीख रहा होता है — कोई मुझे याद भी करता है या नहीं?

बुढ़ापे में शरीर नहीं टूटता,

उम्मीदें टूटती हैं।

और उम्मीद टूट जाए,

तो इंसान सांस लेता हुआ भी मर चुका होता है।

आज जो बुज़ुर्ग आपके घर में हैं,

यही कल आपके भविष्य का आईना हैं।

उन्हें अनदेखा मत कीजिए…

वरना कल आपकी भी आवाज़ कोई नहीं सुनेगा।

अकेलापन मौत नहीं देता,

अकेलापन पहले इंसान की आत्मा मारता है

और शरीर बाद में गिरता है।


बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

*अद्वितीय*अद्भुत बुज़ुर्ग का जीवन जीवन

 वे हमें*बुज़ुर्ग* कहते हैं, क्योंकि 

हमारा जन्म40, 50, 60 के दशक में हुआ था...हम50, 60, 70 के दशक में पले-बढ़े...हमने60, 70, 80 के दशक में पढ़ाई की...हम70, 80, 90 के दशक में डेटिंग कर रहे थे...हमने70, 80, 90 के दशक में शादी कीऔर दुनिया की खोज की...हम80, 90 के दशक में कदम रखते हैं।करीबन  2000 के दशक में हम स्थिर हुए...2010 के दशक में हम समझदार हुए...और हम 2020 में और उससे भी आगे मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं...पता चला कि हम आठ अलग-अलग दशकों से गुज़रे हैं...दो अलग-अलग सदियों से...दो अलग-अलग सहस्राब्दियों से...हम लंबी दूरी की कॉल के लिए ऑपरेटर वाले टेलीफोन से दुनिया में कहीं भी वीडियो कॉल तक पहुँच गए हैं...हम स्लाइड्स से यूट्यूब तक,विनाइल रिकॉर्ड से ऑनलाइन संगीत तक, हस्तलिखित पत्र से ईमेल और व्हाट्सएप  telegram ,तक पहुँच गए हैं...रेडियो पर लाइव मैचों सेब्लैक एंड व्हाइट टीवी, रंगीन टीवी तक और फिर 3D HDTV तक...हम वीडियो स्टोर गए और अब हम    टनेफ्लिक्स देखते हैं...हमेंपहले कंप्यूटर,पंच कार्ड, फ्लॉपी डिस्क के बारे में पता चला, और अब हमारे पास गीगाबाइट हैं और हमारे स्मार्टफ़ोन पर मेगाबाइट...हमने बचपन में शॉर्ट्स पहने और फिर लंबी पतलून,और ऑक्सफ़ोर्ड, फ़्लेयर,शेल सूट और नीली जींस....हमने शिशु पक्षाघात, मेनिन्जाइटिस, पोलियो, तपेदिक, स्वाइन फ्लू और अब कोविड_90...हमने स्केट्स, ट्राइसाइकिल, साइकिल, मोपेड, पेट्रोल या डीज़ल कारें चलाईं और अब हाइब्रिड या इलेक्ट्रिक चला रहे हैं...हाँ, हमनेबहुत कुछ देखा हैलेकिन हमारा जीवन कितना शानदार रहा है!वे हमें "एक्सेनियल्स" कह सकते हैं,वे लोग जोपचास के दशक की दुनिया में पैदा हुए थे, जिनकाएक एनालॉग बचपनऔर

डिजिटल वयस्कता....हमने सब कुछ देखा है*!हमारी पीढ़ी ने सचमुच जीवन के हर आयाम में किसी भी अन्य पीढ़ी की तुलना में अधिक अनुभव और अनुभव किया है।यह हमारी पीढ़ी है जिसने सचमुच "बदलावों" को अपना लिया है।इस बेहद खास पीढ़ी के सभी सदस्यों को बहुत-बहुत बधाई,जो कि*अद्वितीय* होगी! ईश्वर हमें इस अद्भुत जीवन के लिए आशीर्वाद दे



मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

*वक्त के पन्ने*

घर में कई जन हैं
सब सोफे पर बैठते
और कवर हैं कि बार-बार अकड़ में आ 
टेढ़े हुए जाते हैं
गृहिणी अकेली
और सबको घर साफ़ पसंद
फिर कवर ठीक करना, 
फिर संभालना, फिर जचाना....
धत्! यह भी कोई काम है।

बर्तन कोई नहीं उठाता
कोई जूते व्यवस्थित नहीं रखता
कपड़े पहन कर निकाल फेंक दिए जाते हैं
मैले कपड़ों के भी ठिकाने होते हैं
जानते सब हैं पर रखता कौन है
गृहिणी उठाएंगी, धोएँगी, सुखाएंगी,समेटेंगी 
सब ठिकाने मिलेगा 
यही रोज के क्रम हैं।

सुबह के नाश्ते के बाद फिर रोटी
फिर बर्तन, 
जन एक-एक कर आएँगे जीमने
फिर रोटी, फिर थाली, फिर चक्करी
गृहणियाँ बस घूमती हैं घर भीतर।

उन्हें काम के रोने नहीं हैं
दुःख है अपनी ढलती काया का।

वे भी थकने लगती हैं
रोज के वही गीले तौलिए सुखाती हुई
वही तीन वक्त का खाना
और उस बीच बच्चों का कहना
क्या मम्मी! कभी कुछ ढंग का भी बना दिया करो।

बच्चे तेज रफ्तार में होते हैं
माँ धीमी
घर के बुजुर्ग अलग ठहराव में
उन्हें एक आवाज में हाजिर चाहिए सब।

एक दिन होने लगती है हर काम से उकताहट
झुंझलाहट घर में पसरती है
पर कोई नहीं समझता यह बात
गृहिणियां काम से नहीं अपनी उम्र और शरीर से भी झल्लाती हैं

"वक्त के पन्ने पलटकर देखती है तो, 
फ़िर वो हसीं लम्हे जीने को दिल चाहता है, 
कभी मुस्कराते थे सभी के साथ मिलकर हमारे साथ सभी
, 'अब उन्हें लम्हे, देखने को दिल तरस जाता है.

शनिवार, 11 अक्टूबर 2025

*क्या किया है*

शादी के तीस साल बाद आज उन्होंने बातों ही बातों में किसी बात से नाराज़ होकर सब के सामने कहा, "तूने आज तक किया ही क्या है ? सिर्फ घर पे खाना बनाना और बच्चों को संभालना और वह भी ठीक से नहीं कर सकी। बच्चे भी तुम्हारी सुनते कब हैं ? वो अपने मन की ही तो करते हैं। इतने सालो में तूने उनको कुछ नहीं सिखाया, तभी इतने बिगड़ गए है दोनों बच्चे।"

अपने पति की ऐसी बात सुनकर आज पूरी रात सुनीता को नींद नहीं आई, सुनीता सोचती रही, रोती रहीं, और बुदबुदाने लगीं - "सच में मेंने आज तक किया ही क्या है ? अगर मेंने आज तक इस घर के लिए सच में कुछ नहीं किया, तो अब मेरा यहाँ रहने का कोई मतलब नहीं। कहाँ जाना है पता नहीं, मगर बस अब और नहीं। " ये सोचते हुए सुनीता अपने पति विशाल को एक चिठ्ठी लिखने लगीं।  

"मैंने आज पूरी रात सोचा कि तुम शायद सही कह रहें थे। आज तक मैंने किया ही क्या है ? कौन हूँ मैं? क्या है मेरी पहचान ? चाहती तो थी मैं भी आसमान में उड़ना, मगर उडने से पहले ही मेरे पंख काट दिए गए। सपना देखने से पहले ही सपना तोड़ दिया गया। बाबा ने कहा, "शादी की उम्र बीती जा रही है, मुझसे पूछे बिना ही मेरी शादी करवा दी गई। बाबा का तो मानो, बहुत बड़ा बोझ उतर गया। ससुराल में मेरे लिए हर कोई अजनबी सा था। मगर माँ ने सिखाया था कि अब यही तुम्हारी दुनिया है, यही तेरे अपने। अब से इन सबको ही तुम अपने माँ, बाबा और भाई, बहन समझना। पति तेरे लिए परमेश्वर है, इनकी कही कोई बात मत टालना । सब को प्यार देके अपना बना लेना। माँ की बात मान के मैंने सबको अपना बनाया। मुझे क्या पसंद था और क्या नापसंद, इसके बारे में कभी सोचा ही नहीं।"

इतना लिखते लिखते उनकी आंख डबडबा उठी, अक्षर झिलमिलाने लगे। चश्मा उतारकर आंखें पोंछी, फिर लिखना शुरु किया।

"सुबह को आपकी कॉफ़ी और नाश्ता, बच्चो का लंच बॉक्स, बाबा की डायबिटीज की अलग से दवाई, नाश्ता, माँ के घुटनो की तेल मालिश, आपका टिफ़िन, मार्केट जाना, शाम की खाने की तैयारी करना, माँ को इलाज के लिए बार बार अस्पताल ले जाना, बच्चो को पढ़ाना, उनकी शैतानी बर्दाश्त करना, आपके दोस्त मेहमान बनकर अचानक से आए तो उनके लिए खाना बनाना। बस इतना ही तो किया मैंने ! और क्या किया ? इस लिए अब मुझे कुछ और करना है। अब मैं जा रही हूँ, ये तो नहीं जानती कि कहां जाऊंगी, मगर मुझे जाना है। पर तुम अपना ख्याल रखना।"

          फिर सुनीता चिठ्ठी टेबल पर रख कर चुपचाप घर से बाहर निकल पड़ीं।

          सुबह होते ही बाबूजी अपनी दवाई, नाश्ता और अख़बार के लिए बहू को आवाज़ देने लगे। उसके साथ ही माँ भी अपने घुटनो के मालिश के लिए बहू को आवाज़ देने लगी। बच्चे भी 'माँ ! हमारा ब्रेकफास्ट कहां है ? कोई जवाब न पाकर चिंतित हो उठे कि आज माँ कहा चली गई ?' 

           इतना शोरगुल सुनकर सुनीता के पति की भी ऑंखें खुल गई। 'क्या हो गया' यह सोचते हुए वो बाहर आया। "इतना शोर क्यों मचा रखा है सुबह सुबह?" 
 "पापा ! देखो ना, माँ कहीं नहीं दिख रही। हमको कॉलेज जाने में देरी हो रही है। अभी तक ब्रेकफास्ट भी नहीं किया। लगता है आज भूखा ही जाना पड़ेगा।" दूसरे ने कहा- "मेरी किताबे भी नहीं मिल रही, माँ तुम कहां हो ?" बाबूजी ने आवाज़ लगाई, "बहू ज़रा देखो तो, मेरा चश्मा किधर है ?" माँ ने आवाज़ लगा रही थी -"बहू ! मेरे मालिश की बोतल और दवाइयाँ कहाँ है ?"

           सारा घर जैसे बिख़रा हुआ था। सुनीता का पति ज़ोर से चिल्लाया। "सब लोग चुप हो जाओ। में देखता हूँ वो कहां है, यही कहीं होगी, कहाँ जाएगी ?" वो सुनीता को फ़ोन करने लगा, मगर उसका फ़ोन तो कमरें में टेबल पर ही पड़ा हुआ था। उसने देखा फ़ोन के पास एक चिठ्ठी भी थी। उसे आश्चर्य के साथ बेचैनी भी होने लगी, उसने जल्दी से चिठ्ठी खोल के पढ़ी। चिठ्ठी पढ़कर ही उसे याद आया कि उसने कल शाम अपनी पत्नी का कैसे अपमान किया था, वो भी सब के सामने। ओह!! उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वो उस से माफ़ी मांँगना चाहता था, मगर कैसे ? उसका कोई अता पता नहीं था। उसने उसके मायके और उसकी सहेलियाँ, सबको फ़ोन करके पूछा, मगर किसी को नहीं पता था कि वो कहां है ? किस हाल में है ?
 
           घर में कोहराम सा मच गया था। बाबू जी और मां तो जैसे अचानक ही और बूढ़े हो गए थे। उनकी दवाएं, उनका तेल, उनका चश्मा सब कुछ जैसे भूल गया था। उनकी भूख प्यास भी बंद सी हो रही थीं। बच्चे घर से बाहर ही नहीं निकल रहे थे। बच्चे अचानक जैसे बड़े हो गए थे। मजबूरी में वे घर का काम संभालने में लगे थे, मगर बहुत सारी चीज़ें उनको मिल ही नहीं रही थीं। सुनीता के पति का दिमाग ही काम नहीं कर रहा था। वह करे तो क्या करे और जाए तो कहां जाए। पुलिस में रिपोर्ट करने में भी बात फैलने से बदनामी का डर था। मगर रिपोर्ट तो करना ही होगा। उसने सोचा कि एक बार ससुराल वालों से बात करने के बाद ही पुलिस में सुनीता के गायब होने की रिपोर्ट देगा।
           बिना नहाए धोए, बिना सेव किए, भूखा प्यासा वह बदहवाश सा अपनी ससुराल जा पहुंचा। ससुराल वालों ने उसकी हालत देखकर उसकी बात को गंभीरता से सुना। उसे बात करते करते आंखों से आंसू बहते देख सुनीता से नहीं रहा गया और वह सामने आकर खड़ी हो गई। सुनीता का पति जैसे नई जिंदगी पा गया हो और उठकर उसका हाथ पकड़ कर उसे भरी आंखों से देखने लगा। ससुराल के लोग हंसने लगे। 

विशाल ने सब के सामने सुनीता से अपनी गलती की माफ़ी माँगी और वापिस घर चलने को कहा। औरत का दिल तो वैसे भी बड़ा होता है, इसलिए वह अपने परिवार को कैसे अकेला छोड़ देती ? सुनीता ने विशाल को आंखों आंखों में ही माफ़ कर दिया और पति के साथ घर चली आई। 

घर में सब लोग बहुत खुश हुए, सबको सुनीता की कीमत का पता भी चल चुका था। अब सभी सुनीता को काम में मदद भी करने लगे थे। अब सारे काम का बोझ सिर्फ सुनीता पर नहीं था । बच्चे अपनी माँ को काम में मदद करने के साथ ही अपनी माँ का सम्मान भी करने लगे थे। सुनीता के पति विशाल ने अब जान लिया था कि सुनीता ने आज तक जो किया था, उसे कोई और कर पाने में सक्षम भी नहीं था।  


शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

*दर्द*

 मैं भी इंसान हूँ..." 🌧️🕊️


हर रोज़ मुस्कुराती हूँ, पर कभी-कभी में भी अंदर से रोती हूँ,

भीड़ में सबसे मिलती हूँ, पर अंदर से अपने आप को खोती भी हूँ।


हर चेहरे पे हँसी बाँटती हूँ,कोशिश यही होती है मेरी

पर अपने ग़म किसी से नहीं कहती,आदत है मेरी, 

क्योंकि मैंने सीखा है —

हर सवाल का जवाब देना

हर बार ज़रूरी नहीं होता।


मैं पत्थर नहीं…

जो ठोकरें खा के भी ,आवाज़ न करे,

मैं भी एक इंसान हूँ…

फिर भी कभी-कभी ,टूटकर, खुद से ही माफ़ी माँग लेती हूँ।


कभी किसी की जीत में तालियाँ बजाईं,

तो कभी खुद की हार पे चुपचाप सिर भी झुकाया है मैने।

मैंने रिश्तों को बचाने में खुद को खोया,

पर कभी किसी को ये एहसास तक नहीं होने दिया।


कई लोग कहते भी हैं —

"तू तो मजबूत है ..."

पर कोई नहीं जानता —

मजबूती की इस, दीवार के पीछे, 

एक थका हुआ दिल, हर रात बिखरता भी है।


मैं दिखती हूँ शांत समंदर सी,

पर अंदर ज्वार मेरे भी उठते हैं — 

रोज़… हर लम्हा उठते हैं।


कभी-कभी जी चाहता है —

कि कोई तो पूछे...

"तू ठीक तो है ना?" 



मंगलवार, 2 सितंबर 2025

*कभी नहीं सोचा*

 कभी सोचा है…हम कौन हैं 

क्या हैं, किधर हैं, क्यूँ हैं 


हर वक़्त भाग रहे हैं हम 

किसी और के जैसा बनने के लिए 


अपने जैसा बनने में 

अपने दिल की सुनने में 

पता नहीं कौन सा डर है हमें 


जिसके साथ ख़ुश हैं 

उसके साथ होते नहीं 

जो पाना चाहते हैं 

वो मिलता नहीं 

हर वक़्त ख़ुद से जाने 

कितने समझौते 

करते हुए जिये जा रहे हैं 


अपने ही भीतर की 

आवाज़ को 

अनसुनी कर 

बाहर के शोर में 

ख़ुद को 

खोते चले जा रहे हम 

सबके लिए और 

सबके हिसाब से जीते जी

सबके जैसे बनने की 

होड़ में ख़ुद को ही 

मारते जा रहे हम 


कौन है हम वास्तव में 

क्या चाहते हैं हम ?

क्या ये सवाल ख़ुद से 

कभी करते हैं हम ?


शायद नहीं… 

क्यूँकि ख़ुद के भीतर 

झांक कर देखना ही 

नहीं चाहते हम

अपनी ही सच्चाई से डरते हैं हम

दुनिया के इस बने बनाए ढाँचे में 

ख़ुद को कैसे भी करके फ़िट करते हम ll


अनिता ✍️





शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

*अनपढ़*

  बेटे का जॉइनिंग लेटर आया है और पिता-पुत्र खोल कर पढ़ रहे है मां दौड़ी दौड़ी आती है और बोलती है मुझे भी दिखाइए ..




बेटा तपाक से बोलता है पढ़ पाओगी आप तो अनपढ़ हो!!!!! 


बेटे का यह शब्द पिता को चुभ गया...


सही बोल रहा है बेटा!!!




वह अनपढ़ है।


इसलिए तुम्हारे कॉपी-किताबों में गलतियाँ सुधार नहीं पाती थी, पर रात-रात भर तुम्हें पढ़ते हुए देखती रहती थी।




वह अनपढ़ है।


इसलिए गणित के सवाल तुम्हें नहीं समझा पाई, पर तुम्हारे पास बैठकर दीपक की लौ तेज करती रही ताकि तुम अंधेरे में भी पढ़ सको।




वह अनपढ़ है।


पर नौ महीने तुम्हें अपने पेट में ढोया, जब डॉक्टर ने कहा था कि यह सफर मुश्किल है, तब भी उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।




वह अनपढ़ है।


इसलिए बड़े-बड़े सपनों का मतलब नहीं समझती थी, लेकिन चाहती थी कि उसका बेटा आसमान से भी ऊँचा उड़ जाए।




वह अनपढ़ है।


तुम्हारे स्कूल जाने से दो घंटे पहले उठ जाती, टिफिन बनाती, जूते पॉलिश करती, और दरवाजे पर खड़े होकर तुम्हें आशीर्वाद देती—“पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना।”




वह अनपढ़ है।


इसलिए तुम्हें कभी होमवर्क में मदद न कर सकी, पर तुम्हारे आँसुओं को पोंछकर यह जरूर कहती—“बेटा, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।”




वह अनपढ़ है।


इसलिए तुम्हारे रिजल्ट कार्ड के नंबर नहीं पढ़ पाती थी, लेकिन तुम्हारे चेहरे की खुशी देखकर समझ जाती थी कि तुम पास हो गए हो।




वह अनपढ़ है।


इसलिए तुम्हारे नाम की स्पेलिंग नहीं जानती थी, पर तुम्हारे नाम से ही उसकी दुनिया रोशन थी।




वह अनपढ़ है।


लेकिन उसका त्याग, उसका संघर्ष, उसका प्यार—दुनिया की किसी किताब से कम नहीं था।




आज तुम पढ़-लिखकर दुनिया जीत रहे हो, लेकिन याद रखना—तुम्हारी पहली गुरु वही थी।


वह अनपढ़ थी… पर उसी ने तुम्हें जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान दिया।

अनिता✍🏼










बुधवार, 13 अगस्त 2025

*आत्मिक संतुष्ष्टि *

 वो समझदार बहु **

😇😇😇😇

शाम को गरमी थोड़ी थमी तो मैं पड़ोस में जाकर निशा के पास बैठ गई। 

आखिर ,उसकी सासू माँ भी तो कई दिनों से बीमार है..... सोचा ख़बर भी ले आऊँ और निशा के पास बैठ भी आऊँ। मेरे बैठे-बैठे पड़ोस में रहने वाली उसकी तीनों देवरानियाँ भी आ गईं। निशा से पूछा ‘‘अम्मा जी, कैसी हैं?’’ 

और पूछ कर इतमीनान से चाय-पानी पीने लगी।.......फिर एक-एक करके अम्माजी की बातें होने लगी। सिर्फ़ शिकायतें.......... ‘‘जब मैं आई तो अम्माजी ने ऐसा कहा, वैसा कहा, ये किया, वो किया।’’

आधे घंटे तक शिकायते करने के बाद सब ये कहकर चली गईं....... कि उनको शाम का खाना बनाना है....बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। 

उनके जाने के बाद मैं निशा से पूछ बैठी,

निशा अम्माजी, आज एक साल से बीमार हैं और तेरे ही पास हैं। तेरे मन में नहीं आता कि कोई और भी रखे या इनका काम करे, माँ तो सबकी है।’’

उसका उत्तर सुनकर मैं तो जड़-सी हो गई। 

वह बोली, ‘‘बहनजी, मेरी सास सात बच्चों की माँ है। अपने बच्चो को पालने में उनको अच्छी जिंदगी देने में कभी भी अपने सुख की परवाह नही की.... सबकी अच्छी तरह से परवरिश की ......ये जो आप देख रही हैं न मेरा घर, पति, बेटा....बेटी , शानो-शौकत सब मेरी सासुजी की ही देन है।......

अपनी-अपनी समझ है बहनजी । मैं तो सोचती हूँ इन्हें क्या-क्या खिला-पिला दूँ, कितना सुख दूँ, मेरे दोनों बेटे बेटी अपनी दादी मां के पास सुबह-शाम बैठते हैं..... उन्हे देखकर वो मुस्कराती हैं, अपने कमजोर हाथो से वो उन दोनों का माथा चेहरा ओर शरीर सहलाकर उन्हे जी भरकर दुआएँ देती हैँ।

जब मैं सासु माँ को नहलाती, खिलाती-पिलाती हूँ, ओर इनकी सेवा करती हूँ तो जो संतुष्टि के भाव मेरे पति के चेहरे पर आते है उसे देखकर मैं धन्य हो जाती हूँ၊ मन में ऐसा अहसास होता है जैसे दुनिया का सबसे बड़ा सुख मिल गया हो.......

मेरी सासु माँ तो मेरा तीसरा बच्चा बन चुकी हैं.........

और ये कहकर वो सुबकसुबक कर रो पड़ी।

मैं इस ज़माने में उसकी यह समझदारी देखकर हैरान थी, मैने उसे अपनी छाती से लगाया और मन ही मन उसे नमन किया और उसकी सराहना की .......

कि कैसे कुछ निहित स्वार्थी ओर अपने ही लोग तरह-तरह के बहाने बना लेते है तथा अपनी आज़ादी और ऐशो अय्याशी के लिए,अपनी प्यार एवं ममता की मूरत को ठुकरा देते हैं

 😇😇😇😇

मंगलवार, 5 अगस्त 2025

*बस इतना*

 मुझको रखना बंद,

लिफाफे की तरह,

अपने दिल में 

छुपाकर कहीं,

न दिखने देना ,

न किसी तक पहुंचने देना,

तुम आहट मेरी,

तुम इस तरह रखना सहेजकर मुझको,

जैसे होती है नाजुक सी,

पंखुड़ियां गुलाब की,

मेरी अठखेलियां,

मेरा बचपना सहेज लेना तुम,

तुम मेरी सांसों की,

महक को भी खुद में समाए रखना,

नन्ही चिड़िया सा देना हमेशा,

तुम लाड़ मुझे,

अपनी हथेलियों की ,

गर्माहट मेरे गालों पर बरकरार रखना,

ज्यादा उम्मीदें तो नही रखता

मैं किसी से कभी,

बस तुम अपने एहसासों में ,

मुझको बसाए रखना..!