मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

*वक्त के पन्ने*

घर में कई जन हैं
सब सोफे पर बैठते
और कवर हैं कि बार-बार अकड़ में आ 
टेढ़े हुए जाते हैं
गृहिणी अकेली
और सबको घर साफ़ पसंद
फिर कवर ठीक करना, 
फिर संभालना, फिर जचाना....
धत्! यह भी कोई काम है।

बर्तन कोई नहीं उठाता
कोई जूते व्यवस्थित नहीं रखता
कपड़े पहन कर निकाल फेंक दिए जाते हैं
मैले कपड़ों के भी ठिकाने होते हैं
जानते सब हैं पर रखता कौन है
गृहिणी उठाएंगी, धोएँगी, सुखाएंगी,समेटेंगी 
सब ठिकाने मिलेगा 
यही रोज के क्रम हैं।

सुबह के नाश्ते के बाद फिर रोटी
फिर बर्तन, 
जन एक-एक कर आएँगे जीमने
फिर रोटी, फिर थाली, फिर चक्करी
गृहणियाँ बस घूमती हैं घर भीतर।

उन्हें काम के रोने नहीं हैं
दुःख है अपनी ढलती काया का।

वे भी थकने लगती हैं
रोज के वही गीले तौलिए सुखाती हुई
वही तीन वक्त का खाना
और उस बीच बच्चों का कहना
क्या मम्मी! कभी कुछ ढंग का भी बना दिया करो।

बच्चे तेज रफ्तार में होते हैं
माँ धीमी
घर के बुजुर्ग अलग ठहराव में
उन्हें एक आवाज में हाजिर चाहिए सब।

एक दिन होने लगती है हर काम से उकताहट
झुंझलाहट घर में पसरती है
पर कोई नहीं समझता यह बात
गृहिणियां काम से नहीं अपनी उम्र और शरीर से भी झल्लाती हैं

"वक्त के पन्ने पलटकर देखती है तो, 
फ़िर वो हसीं लम्हे जीने को दिल चाहता है, 
कभी मुस्कराते थे सभी के साथ मिलकर हमारे साथ सभी
, 'अब उन्हें लम्हे, देखने को दिल तरस जाता है.

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