रविवार, 21 दिसंबर 2025

*मैं कौन हूँ*

 *मेरा एक बेटा  

एक बेटा डॉक्टर है और....*

*दूसरा बेटा प्रिन्सिपल है॥*

*💐 पर....मैं कौन हूँ? 💐*

*मेरे जीवन काल का रिटायरमेंट जब आ रहा है उस के बाद का, जब जीवन में ख़ालीपन और अकेलापन आया, तब आत्मचिंतन की एक गहरी अनुभूति हुई।*

*तो बताती हूँ, मैं कौन हूँ?*

*मेरे पति ने एक  बंगला बनाया। एक बड़ा सा फ़ार्म हाउस बनाया।*

*फिर भी आज,हम दोनों  अकेले चार दीवारों में क़ैद हैं।*

* हमने साइकिल से शुरुआत की, फिर मोपेड, बाइक और कारों तक का खूब सफर किया।*

*पर फिर भी आज, कमरे में नंगे पाँव चलते हैं।*ताकी वाकिंग हो जाये

*प्रकृति  थी,मुस्कराई भी और पूछा, “तुम कौन हो, मेरे मित्र?”*

*मैंने गर्व से उत्तर दिया,नहीं “मैं..तो. मैं हूँ।”*

*हमने राज्यों, देशों और विदेशों की यात्राएँ कीं।*

*फिर भी आज उम्र के पड़ाव पर यात्रा, ड्राइंग रूम और रसोई तक सीमित है।*

*हमने अनेक संस्कृतियाँ और परंपराएँ समझीं।*

*फिर भी आज, अपने ही परिवार को समझने की कोशिश करते हैं।

*हमने हमेशा  जन्मदिन, सगाई और शादी को बड़े धूमधाम से, उत्सव जैसा बनाया।*

*फिर भी आज, किराने का बजट तो बनाती ही हूँ।*

*कभी गायों और कुत्तों के लिए रोटियाँ बनवाती थी।*

*फिर भी आज, ख़ुद कुछ निवाले ही खा पाती हूँ।*

*सोना, चांदी, हीरे, मोती—*

*सभी तिजोरी में बंद हैं।*

*महंगे लहंगे सूट और साड़ियां —अलमारी में रखे हैं।*

*फिर भी आज, एक साधारण सूती कपड़े में ही घूमती हूँ।*

*मैंने अंग्रेज़ी, हिन्दी मालवी मेवाड़ी सीखी।*

*फिर भी आज, अपनी मातृभाषा हिंदी में ही समाचार पढ़ती हूँ।*

*कार्य और लाभ के लिए, लगातार यात्रा करती रही।*

*फिर भी आज, भी न जाने क्यूं, उसके लाभ-हानि पर विचार करती हूँ।*

*मैंने प्रेम पूर्वक निष्ठा भाव से, परिवार बसाया, कई रिश्ते बनाए।*

*फिर भी आज, सबसे गहरा रिश्ता दोस्तों ओर पड़ोसियों से है।*

*पढ़ाई में हज़ारों नियमों का पालन किया, किताबों से ज्ञान बटोरा।उसको बाटा भी*

*फिर भी आज, ये जीवन जीने के लिए, व्यवहारिक ज्ञान पर निर्भर हूँ।*

*एक पूरी ज़िंदगी, संघर्ष करते और दुनिया के पीछे भागते हुए बीती।

*परन्तु अब पहली बार, जब हाथों में कभी माला घुमाती हूँ,*

*तब अंतर आत्मा की आवाज़ सुनाई दी है।*

*अब बहुत हो चुका…*

*जागो यात्री!*

*अब अंतिम यात्रा की तैयारी करने का समय है।*

*प्रकृति फिर मुस्कराई और पूछा, “तुम कौन हो, मेरे मित्र?”*

*अब मैंने उत्तर दिया:*

*"हे प्रकृति, मैं तो शायद सदा से तुम्हारा ही अंश हूँ।"*

*किंतु मैं महत्वाकांक्षाओं के आकाश में उड़ती थी।*

*परन्तु अब सत्य के धरातल पर लौट आई हूँ।*

*मुझे क्षमा करो…*

*एक और अवसर दो, जीवन को तुम्हारे नियमों में बांधकर, जीने का।

*एक सच्चे इंसान की तरह जीने का…*

*संस्कारों और मूल्यों के साथ जीने का।*

*परिवार और प्रेम के साथ जीने का।*

मेँ भी तो समझूँ के मैं कौन हूँ? 💐 

  

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