*मैंने सोचा था*
मां अपनी चंद मधुर स्मृतियों को
अपने हृदय की तिजोरी में
बंद कर दूंगी
जहाँ न कोई कर सकेगा चोरी
न कोई जाँच होगी।
डर था, पहले
अगर ज़ब्त हो गईं ये यादें,
*तो क्या शेष रहेगा मेरे पास?*
इसलिए अब हर रोज़
थोड़ा-थोड़ा बाँट देती हूँ
शब्दों में,
कविताओं में,
*कहीं पत्रों में,*
कहीं कहानियों में,
ताकि जब तक मैं हूँ,
तब तक बीते लम्हों का
कोई न कोई हिस्सा
*सांस लेता रहे इस संसार में..*
........ अनिता ✍️
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