मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

**बीते लम्हों की यादें**

 *मैंने सोचा था*

मां अपनी चंद मधुर स्मृतियों को

अपने हृदय की तिजोरी में

बंद कर दूंगी 

जहाँ न कोई कर सकेगा चोरी 

न कोई जाँच होगी।


डर था, पहले 

अगर ज़ब्त हो गईं ये यादें,

*तो क्या शेष रहेगा मेरे पास?*


इसलिए अब हर रोज़

थोड़ा-थोड़ा बाँट देती हूँ

शब्दों में,

कविताओं में,

*कहीं पत्रों में,*

कहीं कहानियों में,

ताकि जब तक मैं हूँ,

तब तक बीते लम्हों का

कोई न कोई हिस्सा

*सांस लेता रहे इस संसार में..*


........ अनिता ✍️

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