सोमवार, 18 मई 2026

*गलतफहमी*

 जीन्स और टी शर्ट में आकर उसने हैलो आंटी कहा। मैंने भी प्रत्युत्तर में हैलो ही कहा। तभी उसकी माँ बोली, आंटी के पैर छुओ बेटा। उसको असहज देख कर मैंने कह दिया, रहने दो बेटा, उसकी कोई जरूरत नहीं है। बातों से एकदम बिंदास, खिलखिलाकर हँसने वाली, अपनी माँ से हर बात पर तर्क वितर्क करती "स्निग्धा" मेरे बेटे "सुयश" की पसंद ही नहीं प्यार भी थी ।

सुयश मेरा एकलौता बेटा है, जैसा नाम वैसा गुण । जब जब मैं दूसरा बच्चा न होने के लिए उदास होती तो विशाल कहते, ईश्वर ने दस बेटों के गुण दिए है हमारे सुयश में । लेकिन मेरा मन एक बेटी की चाहत में हमेशा कलपता रहा । सोचती थी बहू को ही बेटी का प्यार दूँगी। अपनी बहू की जो छवि मैंने सोची थी स्निग्धा उसकी बिल्कुल विपरीत थी। उसकी माँ ने ही हँसते हुए कहा, अपने नाम के विपरीत है स्निग्धा ! लड़कों की तरह वेश भूषा, हँसना, बोलना,अक्खड़पना भरा हुआ था उसमें, जाने सुयश को क्या दिखा इसमें !

शादी की रस्मों के बाद स्निग्धा हमारे घर आ गयी, लेकिन मेरा मन उसे लेकर हमेशा सशंकित रहता था। मासूम गुड़िया सी बहू लाना चाहती थी मैं अपने सुयश के लिए पर ये तो ! हमेशा डर लगता था कि अगर मैं उसे अपने घर के तौर तरीके समझाऊँ तो वो मेरे साथ क्या व्यवहार करेगी । मैं इन्हीं सब उधेड़बुन में लगी हुई थी और सुयश स्निग्धा अपना हनीमून मना कर वापस भी आ गए ।

अगले दिन से दोनों को आफिस जाना था। सुबह की नींद मुझे बहुत प्यारी थी, सोचती थी बहू आ जायेगी तो उसके हाथों की चाय पीकर अपने सुबह की शुरुआत करूँगी। लेकिन स्निग्धा को देख कर मैंने अपना ये सपना भुला दिया और सुबह 6 बजे का अलार्म लगा कर सो गई ।

पूजा की घंटियाँ सुन मेरी नींद खुली, अभी छः भी नहीं बजे थे। बाहर निकल कर देखा, स्निग्धा आरती की थाल लिए, पूरे घर में घूम रही थी। मुझे लगा मैं सपना देख रही हूँ, तब तक वो पास आकर बोली मम्मा प्रसाद लीजिये ।

फ्रेश होकर बाथरूम से निकली तो मैडम चाय के दो कप लिए हाजिर थीं। चाय पीने के बाद बोली मम्मा मुझे नाश्ते में बस सैंडविच और चीला बनाना ही आता है। आप लोग नाश्ते में क्या खाते हैं? पीछे से सुयश आकर बोला, जो भी तुम बनाओ हम वही खायेंगे।

सुयश ने मेरा हैरान चेहरा देख कर पूछा," क्या हुआ माँ, चाय पसन्द नहीं आयी !

नहीं रे इतनी अच्छी चाय तो खुद मैंने ही नहीं बनाई कभी !"

फिर मैंने स्निग्धा से कहा,"तुम्हें ऑफिस जाना है बेटा, तैयार हो जाओ। अभी मेड आ रही होगी मैं उसके साथ मिलकर नाश्ता बना लूँगी।"

अरे नहीं मम्मा नाश्ता तो मैं ही बनाऊँगी, फिर तो मैं पूरा दिन आफिस में रहूँगी तो घर पर सब आपको ही देखना पड़ेगा।

स्निग्धा कभी कोई मौका नहीं देती थी कमी निकालने का, लेकिन मैं फिर भी डरी रहती कि यह इसका छ्द्म तो नहीं ! 

मन ही मन भले ही डर रही थी लेकिन उसके जैसी बहू पाकर बहुत खुश थी मैं, पर खुशियों को भी कभी-कभी नजर लग जाती है ! सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था कि विशाल को हार्ट अटैक आ गया, ऐसा लगा जैसे मेरा जीवन ही उजड़ गया ! मैं उन्हें आई सी यू के बाहर से देख घंटों रोती रहती, उस समय मेरी स्निग्धा ने मुझे सास से बेटी बना दिया। मुझे अपनी बाहों में भरकर चुप कराती, जबरदस्ती अपने हाथों से खाना खिलाती। हर वक़्त यही कहती पापा बिल्कुल ठीक हो जायेंगे। हॉस्पिटल के बिल, दवाइयों का खर्चा इस तरह से देती जैसे उसके अपने पापा का इलाज हो रहा हो ।

मैंने आई सी यू के बाहर खड़ी होकर विशाल को देखती उसकी नम आँखों को भी देख लिया था । सुयश और मेरे सामने मजबूत चट्टान बनी मेरी स्निग्धा वास्तव में बहुत कोमल थी। घर आने के बाद भी विशाल का ख्याल हम दोनों से ज्यादा रखती । अपनी नई नवेली शादी के बावजूद देर रात तक हमारे साथ बैठी रहती ।

मासूम गुड़िया सी बहू का सपना देखने वाली सास को एक मजबूत बेटी मिल गयी थी। जिसका चोला पाश्चात्य था पर दिल एकदम देशी था ।

आज मेरे जन्मदिन पर सुयश ने कहा,"माँ, तैयार हो जाइए,आपकी पसन्द की साड़ी खरीदने चलते हैं। "मुझे कुछ नहीं चाहिए सुयश ! तूने स्निग्धा के रूप में मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा दे दिया ! मेरी भीगी आँखे पोछ कर सुयश ने पूछा, वैसे है कहाँ आपकी दबंग बहू? जिसने अपनी दबंगई से आपका भी दिल जीत लिया ! तब तक स्निग्धा ने मेरे गले में अपनी बाहें डाल कर कहा, हैप्पी बर्थडे मम्मा और एक पैकेट पकड़ाते हुए कहा, ये दुनिया की बेस्ट मम्मा के लिए, पैकेट खोल कर देखा, तो उसमें कांजीवरम साड़ी थी, बिल्कुल वैसी ही जैसी मैं हमेशा से लेना चाहती थी ! मेरे आश्चर्य चकित चेहरे को देखकर बोली, वो जब आप रेखा की तस्वीर गूगल पर सर्च करके घंटों देखती थीं तभी मुझे समझ आ गया कि आप उनकी तस्वीरों में देखती क्या हैं ! अपनी जोरदार हँसी के साथ उसने फिर से मुझे गले लगा लिया। खुशी में बहते आँसुओं को पोछकर उसने कहा, “एक माँ के दिल की बात एक बेटी तो समझ ही जाती है ना मम्मा"! हाँ मेरी स्निग्धा, साड़ी सूट बहुत कम पहनती है, वो हर रोज हमारे पैर भी नहीं छूती, उसकी आवाज भी धीमी नहीं है, उसे घर के काम भी नहीं आते, रोटी तो भारत के नक्शे जैसी बनाती है,और जब गुस्साती है तो....उफ्फ पूछिये ही मत ! वो एक आदर्श बहू की छवि से बिल्कुल जुदा है लेकिन मेरे लिए सबसे खास है। 

तभी तो विशाल कहते हैं, आदर्शों नियमों पर पड़ गयी भारी, सबसे प्यारी बहू हमारी |

Credit for unknown

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

*एक अजनबी*

 *एक अजनबी*


मैं ओला चलाता हूँ।

ज़्यादातर नाइट शिफ्ट करता हूँ। पिछले हफ्ते रात ग्यारह बजे एक बुज़ुर्ग सज्जन को उठाया।  सफ़ेद पंजाबी धोती, आँखों में थकान—लेकिन आवाज़ में अजीब-सी दृढ़ता।*


गाड़ी में बैठते ही बोले,

*“आज रात मुझे पाँच जगहों पर ले चलना होगा । मैं तुम्हें 5000 रुपये दूँगा। नकद, लेकिन अंत तक कारण मत पूंछना।”*

   यह कहकर एक कागज़ आगे बढ़ाया।  उस पर पाँच पते लिखे थे ।


*पहला पड़ाव-*

दक्षिण कोलकाता का एक पुराना घर।

मैंने गाड़ी रोकी।  वे उतरे नहीं। सिर्फ़ खिड़की का शीशा नीचे करके देखते रहे। दस मिनट तक।

आँखों से निरंतर आँसू बह रहे थे, लेकिन कोई आवाज़ नहीं।

“चलो… अगला।”


*दूसरा पड़ाव-*

एक प्राथमिक विद्यालय।  गेट बंद। अंदर अँधेरा मैदान।

वे उतरकर धीरे-धीरे झूले तक गए।  एक झूले पर बैठकर हल्के-हल्के झूलने लगे।

बीस मिनट बाद लौटे।  बोले -

“यहीं पढ़ाता था। तैंतालीस साल।  ज़िंदगी का सबसे अच्छा समय यही था।”


*तीसरा पड़ाव-*

एक छोटा पुराना कॉफ़ी हाउस।

अंदर जाकर एक कप चाय मँगाई।  कोने की मेज़ पर अकेले बैठे रहे। चाय को छुआ तक नहीं।  बस चारों ओर देखते रहे।

पंद्रह मिनट बाद लौटकर हल्के से मुस्कुराए -

“यहीं, मेरी और मिताली (उनकी पत्नी) की पहली मुलाक़ात हुई थी। 1969 में।”


*चौथा पड़ाव-*

निमतला श्मशान घाट।

वे उतरे।  चिताभस्म के पास एक फ़लक के सामने खड़े होकर धीमे-धीमे कुछ बोलते रहे।  मैं सुन नहीं पाया।

आधे घंटे बाद लौटे।  आँखें लाल थीं।

“आज तीन साल हो गए उसे गए।”


*पाँचवाँ पड़ाव-*

एक बड़ा सरकारी अस्पताल।

गाड़ी पार्क करने को कहा।  फिर मेरी ओर देखा -


*“अब कारण बताता हूँ।  मुझे चौथे स्टेज का कैंसर है। डॉक्टर ने कहा है— कुछ हफ़्ते… शायद कुछ दिन। आज मैं अपनी पूरी ज़िंदगी आख़िरी बार देख लेना चाहता था।”*

मैं स्टीयरिंग पर सिर रखकर रोने लगा।

उन्होंने कहा—

*“वो घर—जहाँ बच्चों को बड़ा किया।*

*वो स्कूल—जहाँ अपना उद्देश्य पाया।*

*वो कॉफ़ी हाउस—जहाँ प्यार हुआ।*

*वो श्मशान—जहाँ आख़िरी विदाई दी।*

*और ये अस्पताल—जहाँ आज भर्ती होऊँगा। अब घर वापसी नहीं होगी।”*

उन्होंने मेरे हाथ में 5000/- रुपये रख दिए।

*“धन्यवाद, तुमने मुझे मेरी ज़िंदगी एक बार फिर घुमा दी।  मेरे आख़िरी अजनबी इंसान...जिसने मेरे साथ कोमल व्यवहार किया।”*

मैंने कहा—

“नहीं, ये मैं नहीं ले सकता ।”

वे बोले—

*“लो,  देने के लिए मेरा कोई नहीं।  बच्चों ने इतनी दूरी बना ली है कि अब वो बात नहीं करते। यार-दोस्त कोई बचा नहीं, एक-एक करके सब विदा हो गये।  तुमने तीन घंटे दिए—तीन घंटे की इंसानियत। उसकी कीमत पैसे से ज़्यादा है।”*

छोटा सूटकेस लेकर वे अंदर चले गए।

*अगले दिन मैं अस्पताल गया। पूछा—“श्री अनिरुद्ध मुखर्जी।  केबिन 412”।*

फूल लेकर अंदर गया।  मुझे देखकर मुस्कुराए —

“तुम आए?”

“आपको ऐसे छोड़ नहीं पाया।”

*दो घंटे बातें हुईं—मिताली देवी की, उनके छात्रों की, उनके रूठे हुए बच्चों की।*

मैं रोज़ जाने लगा। चाय ले जाता। अख़बार पढ़कर सुनाता।  कभी चुपचाप बैठा रहता।

एक दिन बोले—

*“सोचता था अकेला मरूँगा।  लेकिन तुम हो।  आख़री वक़्त में एक अजनबी, परिवार बन गया।  तुम्हें मेरा बहुत-बहुत आशीर्वाद।”*

मैंने उनका हांथ पकड़ा—

*“आप अकेले नहीं हैं।”*

*मंगलवार भोर 3 बजकर 17 मिनट पर वे स्वर्ग चले गए।*

*मैं उनका हांथ पकड़े बैठा था।*

आख़िरी शब्द थे—

*“सबसे कहना… अजनबियों की ओर देखना।  सचमुच देखना।  हम सब कहीं जा रहे हैं—कोई तेज़, कोई धीरे। जाते हुए राह में दया करना। तुमने की।  तुमने मेरे आख़िरी दिनों को जीने लायक बना दिया।”*

मॉनिटर की आवाज़ सीधी रेखा बन गई।

*श्मशान में उनके दाह-संस्कार के समय थे—कुल छः लोग -*

मैं,

तीन नर्स,

एक वकील,

और एक पूर्व छात्र।

*तैंतालीस साल की शिक्षकी।*

*बावन साल का दांपत्य।*

*इक्यासी साल की ज़िंदगी।*

*छह लोग।*

मैंने कहा—

“अनिरुद्ध बाबू ने मुझे सिखाया-

*हर अजनबी किसी का पूरा संसार होता है।*

*हर यात्री एक कहानी है।*

*हर इंसान जी रहा है, मर रहा है, इंतज़ार कर रहा है—कोई उसे देखे।*

उन्होंने मुझे 5000/- रुपये दिए थे जीवन की सड़क पर गाड़ी चलाने के लिए।

*लेकिन जो शिक्षा दी—उसकी कीमत पैसे से कहीं ज़्यादा है।*

"मानवता कोई *अतिरिक्त चीज़ नहीं। यही सब कुछ है।”*

आज भी वो 5000/- रुपये मेरे ग्लव बॉक्स में रखे हैं। खर्च नहीं किए।

*क्योंकि हर यात्री शायद अपनी आख़िरी यात्रा पर हो।  हर अजनबी शायद आख़िरी विदाई दे रहा हो।*

इसलिए अब मैं अलग तरह से गाड़ी चलाता हूँ।

*पूंछता हूँ। सुनता हूँ। लोगों को देखता हूँ।*

क्योंकि एक बुज़ुर्ग शिक्षक ने *एक कोमल रात माँगी थी-और एक अजनबी रुक गया था।*

*निशब्द क्षण, अनकहा सत्य।*

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

**बीते लम्हों की यादें**

 *मैंने सोचा था*

मां अपनी चंद मधुर स्मृतियों को

अपने हृदय की तिजोरी में

बंद कर दूंगी 

जहाँ न कोई कर सकेगा चोरी 

न कोई जाँच होगी।


डर था, पहले 

अगर ज़ब्त हो गईं ये यादें,

*तो क्या शेष रहेगा मेरे पास?*


इसलिए अब हर रोज़

थोड़ा-थोड़ा बाँट देती हूँ

शब्दों में,

कविताओं में,

*कहीं पत्रों में,*

कहीं कहानियों में,

ताकि जब तक मैं हूँ,

तब तक बीते लम्हों का

कोई न कोई हिस्सा

*सांस लेता रहे इस संसार में..*


........ अनिता ✍️

रविवार, 12 अप्रैल 2026

**एक औरत**

 सुनो


एक औरत को क्या चाहिए

और क्या होती है

आज में आपको बताती हूं 

💫💫💫💫💫💫💫

थोड़ा सा समय प्रेम और

आत्मसम्मान वो चाहती है

💫💫💫💫💫💫💫

धीरज रखती हृदय में 

शीतल सा मन रखती है

💫💫💫💫💫💫💫

ये वो नारी है जो नारी के रूप में

स्वरूप देवियों का रखती है

💫💫💫💫💫💫💫

कभी बन के लक्ष्मी धन लुटाए

कभी काली बन के नाश करती!!

💫💫💫💫💫💫💫💫

एक औरत को सिर्फ प्रेम और सम्मान चाहिए 

जो घर परिवार को मजबूत बना सके😊🙏

अनिता ✍️

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

**कभी तुम**

 कभी तुम 

अकेले में देखना 

*तारों को ,_____*


जो कोई तारा

 तुम्हे देखकर 

टिमटिमाया

*समझ लेना*

*वो मैं हूँ.......*


कभी तुम 

खामोश हो

 यूँ ही टहलना,

चली जो भीनी हवा

 तुमसे लिपटकर

*समझ लेना*

 *वो मैं हूँ..____*


कभी तुम 

उदास होके 

अकेले खड़े हो,

उस पल 

जो आंसू गिरे 

तुम्हारे गालो को छूकर

*समझ लेना*

 *वो मैं हूँ..______*


कभी तुम 

जो यूँ ही

 अकेले में सोच के 

कुछ मुस्कुराओ 

उस पल जो

 सुकून मिले 

तुम्हारे मन को

*समझ लेना* 

*वो मैं हूँ..*

अनिता

......... ✍️


गुरुवार, 5 मार्च 2026

*नया जीवन

 यूं तो वृद्ध आश्रम में, उन दोनों को साथ साथ रहते ,दोनों को करीबन आठ माह से ऊपर हो गए थे, थोड़ी जान पहचान हो ही गई थी!

एक दिन, शाम 68 वर्षीय गजेंद्र जी ने, कुछ सोच विचार के बाद सामने बैठी 63 वर्ष की गीता बाली से कहा—

“क्यों न हम अपने बचे हुए जीवन की एक नई शुरुआत करें?”

क्या आप मुझसे शादी करेंगी...

अचानक से आए प्रस्ताव को सुनकर 

गीता जी कुछ पल तो चुप रहीं।

उनकी आँखों  में डर था लेकिन उससे ज़्यादा थकान थी

उन्होंने धीरे से कहा—

“मेरी अपनी कोई संतान नहीं है उनका

थोड़ा गला भर आया 

फिर वो बोलीं—

“मेरे पति प्राइवेट नौकरी में थे।

दस साल पहले गुजर गए।मेरे अपने बच्चे तो नहीं थे पर ज्वाइंट फैमिली थी, धीरे धीरे सबके रहते भी उस घर में, मेरी आवाज़ ,को सबने दबा सा दिया था,ऐसा लगने लगा था कि मैं सबके ऊपर बोझ सी बनती जा रही हूं ।”

जेठ जेठानी,देवर देवरानी ,उनके सबके बच्चे है ,

लेकिन किसी को मेरी ज़रूरत नहीं रही ..जबकि . उन सबके कहे अनुसार, मेने अपनी,सारी प्रॉपर्टी उनके सब बच्चों, के नाम से कर दी और कुछ समय के बाद वो ही लोग मुझे यहां छोड़ गए।”इतना कहते हुए वो सिसकने लगीं,तब गजेन्द्रजी

बोले—

“मेरे पास अपना घर है,पेंशन है,इलाज की सारी सुविधा भी है…

बस किसी का भी साथ नहीं है,मेरी पत्नी को गुजरे 2 साल हो गया .एक ही बेटा हे जो बहू के साथ विदेश में हमेशा के लिए बस गया है ,कहते हुए उनका गला भर गया

फिर बहुत धीमे स्वर में वो बोले—बस इसी

“मुझे मजबूरी में मुझे यहाँ रहना पड़ रहा है। यहां हमउम्र लोगों का साथ, एक सकुन देता है,

अगर आप मेरा साथ दें तो हम इस वृद्ध आश्रम से निकलकर,मेरे अपने घर में आराम से रह सकते हैं।

मैं आपका सहारा बनूँगा और आप मेरा।”

गीता देवी की आँखों से आँसू गिर पड़े।

वह बोलीं—

“लेकिन ये समाज…क्या कहेंगा? लोग हमें क्या बोलेंगे?

इस उम्र में विवाह !!! 

 गजेंद्र जी की आवाज़ में पहली बार कठोरता थी—

“कौन_सा_समाज?

वही समाज जिसने कभी यह किसी से नहीं पूछा

कि परिवार के रहते भी एक पिता आश्रम में क्यों गया?

वही_समाज?

आपके परिवार वालों से जाकर ,यह कभी,किसी ने नहीं पूछा कि अपनों ने ही, आपके साथ, इतना बड़ा धोखा क्यों किया ?

कौन से समाज ने हमें अपने घर रखा?

किस समाज ने आकर ,हमारे आँसू पोंछे?

तो अब हम , समाज से इजाज़त क्यों माँगें?”

उस दिन गीता देवी ने पहली बार

खुद को बेकार नहीं, ज़रूरी सा, महसूस किया।

मन ही मन प्रण करने का सोचा और उन्होंने गजेन्द्रजी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया,

कुछ दिनों बाद दोनों ने विवाह कर लिया।

कोई शोर नहीं था कोई रिश्तेदार नहीं था।

बस दो टूटे जीवन थे—

जो एक-दूसरे के सहारे फिर से जुड़ रहे थे।


 ✍🏼 अनिता सुखवाल

         उदयपुर 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

*सुनहरे वर्षों का नया श्रृंगार*



बुजुर्ग होते ही सबसे बड़ी समस्या वक्त गुजारने की होती है क्यूंकि घर के सारे सदस्य भी अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं,अब खाली समय खूब रहता है!
मुझे कला और रचनात्मकता, क्रिएटिविटी के साथ गायकी का भी, शुरू से शौक रहा था, परन्तु घर गृहस्थी को संभालने के वक्त, समय नहीं मिला, ये मेरा शौक अब न केवल समय बिताने का जरिया है, बल्कि मन को शांति, सकून के साथ,जीवन को एक नई ऊर्जा सी भरता है।

जीवन की लंबी यात्रा में जब हम 'सीनियर सिटीजन' के पड़ाव पर पहुँचते हैं, तो अक्सर लोग इसे विश्राम का समय मानते हैं। लेकिन असल में, यह समय स्वयं को खोजने और उन सपनों को जीने का है जो जिम्मेदारियों के शोर में कहीं दब गए थे। वास्तव में यह खाली समय नहीं, यह 'अपना' समय (ME TIME)है
काम और परिवार की व्यस्तताओं से मुक्त होने के बाद, वक्त का एक बड़ा हिस्सा हमारे पास होता है। हमारी खोई हुई रचनात्मकता, इस खालीपन को, रंगों, धागों या गायकी के शब्दों से भर देती है। जब हम कुछ नया बनाते हैं चाहे वह पेंटिंग हो, बुनाई हो, या कोई अन्य कला ,तो यह केवल एक वस्तु नहीं होती, बल्कि हमारे अनुभवों का निचोड़ होती है।
 मन की शांति और स्वास्थ्य का संगम,का
कला से, सीधा संबंध ,हमारे मानसिक स्वास्थ्य से है। जब हम किसी रचनात्मक कार्य में डूब जाते हैं, तो तनाव कम होता है! एकाग्रता बढ़ने से मन शांत रहता है साथ ही याददाश्त तेज रहती है! नई चीजें सीखना सिखाना ,और उनकी बारीकियों पर ध्यान देना , हमारे मस्तिष्क को सक्रिय रखता है।
अकेलेपन से मुक्ति मिलती है ,हमारी ये कलायें ही,हमें खुद का सबसे अच्छा दोस्त बना देती है।
सृजन का आनंद लेते हुए ,जब एक कोरे कैनवास या कागज पर रंग बिखेरना, या ऊन के गोलों से एक सुंदर स्वेटर बुनना, पुराने गीतों को गाकर,मुझे एक अलग ही संतुष्टि का अनुभव देता है। एक अहसास सा होता है कि "मैंने कुछ नया सीखा है ,बनाया है", यही मेरे अंदर के आत्मविश्वास को बढ़ाता है।में सोचती हूँ हमारी यही कल्पना शक्ति,आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनमोल विरासत और प्रेरणा बन सकती है।
बढ़ती उम्र का मतलब रुकना नहीं, बल्कि अपनी पसंद के रंगों में, रंग जाना होता है। रचनात्मकता वह खिड़की है जिससे हम दुनिया को, फिर से एक बच्चे की जिज्ञासा की तरह देख सकते हैं। तो चलिए, अपनी रुचि को पहचानें और इस सुनहरे समय को और भी हसीन बनाएँ।कहते हैं कि उम्र केवल अंकों का खेल है, और जब हाथ में ब्रश और सामने एक कोरा कैनवास हो, तो समय जैसे ठहर सा जाता है। मेरे लिए पेंटिंग और गायकी केवल एक शौक नहीं, बल्कि मौन संवाद का, एक खूबसूरत नजरिया सा है। अपनी अनुभूतियों को हम इसी तरह जीवंत रख सकते हैं।
 
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, मन को शांत और केंद्रित रखना एक चुनौती होती है। कार्य एक प्रकार का 'सक्रिय ध्यान' (Active Meditation) है। ब्रश के हर स्ट्रोक और रंगों के मिश्रण पर ध्यान लगाने से मन की उथल-पुथल शांत हो जाती है औरगायकी से एक असीम शांति का अनुभव सा होता है।
 नए रंगों को मिलाना और अलग-अलग तकनीकों को सीखना मन को युवा बनाए रखता है।
 कभी-कभी जो बातें हम कह नहीं पाते, वे पेंटिंग के जरिए रंगों के रूप में बाहर आ जाती हैं।
 इसी तरह गायकी करते समय ,घंटों का पता नहीं चलता, जिससे बोरियत या अकेलेपन की जगह सृजन का आनंद ले लेता है।

जब हम अपनी बनाई हुई पेंटिंग को घर की दीवार पर सजाते हैं या अपने नाती-पोतों को दिखाते हैं, तो उनकी आंखों की चमक हमें एक नई ऊर्जा देती है। यह कला हमें समाज और परिवार से एक नए रूप में जोड़ती है।

जीवन एक जादुई सफर है जहाँ कोई 'गलती' नहीं होती, बस नए प्रयोग होते हैं। हमारे पास अनुभवों का जो खजाना है, उसे कैनवास पर बिखेरने का और माइक हाथ में पकड़के गाने का ,सबसे सही समय यही है। 
"हाथों की लकीरें भले ही धुंधली पड़ जाएं, लेकिन रंगों से बनी यादें हमेशा चमकती रहती हैं।"
 "कलाओं की कोई उम्र नहीं होती, बस एक दिल चाहिए जो धड़कना और बनाना जानता हो।"

अनिता सुखवाल
उदयपुर