यूं तो वृद्ध आश्रम में, उन दोनों को साथ साथ रहते ,दोनों को करीबन आठ माह से ऊपर हो गए थे, थोड़ी जान पहचान हो ही गई थी!
एक दिन, शाम 68 वर्षीय गजेंद्र जी ने, कुछ सोच विचार के बाद सामने बैठी 63 वर्ष की गीता बाली से कहा—
“क्यों न हम अपने बचे हुए जीवन की एक नई शुरुआत करें?”
क्या आप मुझसे शादी करेंगी...
अचानक से आए प्रस्ताव को सुनकर
गीता जी कुछ पल तो चुप रहीं।
उनकी आँखों में डर था लेकिन उससे ज़्यादा थकान थी
उन्होंने धीरे से कहा—
“मेरी अपनी कोई संतान नहीं है उनका
थोड़ा गला भर आया
फिर वो बोलीं—
“मेरे पति प्राइवेट नौकरी में थे।
दस साल पहले गुजर गए।मेरे अपने बच्चे तो नहीं थे पर ज्वाइंट फैमिली थी, धीरे धीरे सबके रहते भी उस घर में, मेरी आवाज़ ,को सबने दबा सा दिया था,ऐसा लगने लगा था कि मैं सबके ऊपर बोझ सी बनती जा रही हूं ।”
जेठ जेठानी,देवर देवरानी ,उनके सबके बच्चे है ,
लेकिन किसी को मेरी ज़रूरत नहीं रही ..जबकि . उन सबके कहे अनुसार, मेने अपनी,सारी प्रॉपर्टी उनके सब बच्चों, के नाम से कर दी और कुछ समय के बाद वो ही लोग मुझे यहां छोड़ गए।”इतना कहते हुए वो सिसकने लगीं,तब गजेन्द्रजी
बोले—
“मेरे पास अपना घर है,पेंशन है,इलाज की सारी सुविधा भी है…
बस किसी का भी साथ नहीं है,मेरी पत्नी को गुजरे 2 साल हो गया .एक ही बेटा हे जो बहू के साथ विदेश में हमेशा के लिए बस गया है ,कहते हुए उनका गला भर गया
फिर बहुत धीमे स्वर में वो बोले—बस इसी
“मुझे मजबूरी में मुझे यहाँ रहना पड़ रहा है। यहां हमउम्र लोगों का साथ, एक सकुन देता है,
अगर आप मेरा साथ दें तो हम इस वृद्ध आश्रम से निकलकर,मेरे अपने घर में आराम से रह सकते हैं।
मैं आपका सहारा बनूँगा और आप मेरा।”
गीता देवी की आँखों से आँसू गिर पड़े।
वह बोलीं—
“लेकिन ये समाज…क्या कहेंगा? लोग हमें क्या बोलेंगे?
इस उम्र में विवाह !!!
गजेंद्र जी की आवाज़ में पहली बार कठोरता थी—
“कौन_सा_समाज?
वही समाज जिसने कभी यह किसी से नहीं पूछा
कि परिवार के रहते भी एक पिता आश्रम में क्यों गया?
वही_समाज?
आपके परिवार वालों से जाकर ,यह कभी,किसी ने नहीं पूछा कि अपनों ने ही, आपके साथ, इतना बड़ा धोखा क्यों किया ?
कौन से समाज ने हमें अपने घर रखा?
किस समाज ने आकर ,हमारे आँसू पोंछे?
तो अब हम , समाज से इजाज़त क्यों माँगें?”
उस दिन गीता देवी ने पहली बार
खुद को बेकार नहीं, ज़रूरी सा, महसूस किया।
मन ही मन प्रण करने का सोचा और उन्होंने गजेन्द्रजी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया,
कुछ दिनों बाद दोनों ने विवाह कर लिया।
कोई शोर नहीं था कोई रिश्तेदार नहीं था।
बस दो टूटे जीवन थे—
जो एक-दूसरे के सहारे फिर से जुड़ रहे थे।
✍🏼 अनिता सुखवाल
उदयपुर