सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

*सुनहरे वर्षों का नया श्रृंगार*



बुजुर्ग होते ही सबसे बड़ी समस्या वक्त गुजारने की होती है क्यूंकि घर के सारे सदस्य भी अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं,अब खाली समय खूब रहता है!
मुझे कला और रचनात्मकता, क्रिएटिविटी के साथ गायकी का भी, शुरू से शौक रहा था, परन्तु घर गृहस्थी को संभालने के वक्त, समय नहीं मिला, ये मेरा शौक अब न केवल समय बिताने का जरिया है, बल्कि मन को शांति, सकून के साथ,जीवन को एक नई ऊर्जा सी भरता है।

जीवन की लंबी यात्रा में जब हम 'सीनियर सिटीजन' के पड़ाव पर पहुँचते हैं, तो अक्सर लोग इसे विश्राम का समय मानते हैं। लेकिन असल में, यह समय स्वयं को खोजने और उन सपनों को जीने का है जो जिम्मेदारियों के शोर में कहीं दब गए थे। वास्तव में यह खाली समय नहीं, यह 'अपना' समय (ME TIME)है
काम और परिवार की व्यस्तताओं से मुक्त होने के बाद, वक्त का एक बड़ा हिस्सा हमारे पास होता है। हमारी खोई हुई रचनात्मकता, इस खालीपन को, रंगों, धागों या गायकी के शब्दों से भर देती है। जब हम कुछ नया बनाते हैं चाहे वह पेंटिंग हो, बुनाई हो, या कोई अन्य कला ,तो यह केवल एक वस्तु नहीं होती, बल्कि हमारे अनुभवों का निचोड़ होती है।
 मन की शांति और स्वास्थ्य का संगम,का
कला से, सीधा संबंध ,हमारे मानसिक स्वास्थ्य से है। जब हम किसी रचनात्मक कार्य में डूब जाते हैं, तो तनाव कम होता है! एकाग्रता बढ़ने से मन शांत रहता है साथ ही याददाश्त तेज रहती है! नई चीजें सीखना सिखाना ,और उनकी बारीकियों पर ध्यान देना , हमारे मस्तिष्क को सक्रिय रखता है।
अकेलेपन से मुक्ति मिलती है ,हमारी ये कलायें ही,हमें खुद का सबसे अच्छा दोस्त बना देती है।
सृजन का आनंद लेते हुए ,जब एक कोरे कैनवास या कागज पर रंग बिखेरना, या ऊन के गोलों से एक सुंदर स्वेटर बुनना, पुराने गीतों को गाकर,मुझे एक अलग ही संतुष्टि का अनुभव देता है। एक अहसास सा होता है कि "मैंने कुछ नया सीखा है ,बनाया है", यही मेरे अंदर के आत्मविश्वास को बढ़ाता है।में सोचती हूँ हमारी यही कल्पना शक्ति,आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनमोल विरासत और प्रेरणा बन सकती है।
बढ़ती उम्र का मतलब रुकना नहीं, बल्कि अपनी पसंद के रंगों में, रंग जाना होता है। रचनात्मकता वह खिड़की है जिससे हम दुनिया को, फिर से एक बच्चे की जिज्ञासा की तरह देख सकते हैं। तो चलिए, अपनी रुचि को पहचानें और इस सुनहरे समय को और भी हसीन बनाएँ।कहते हैं कि उम्र केवल अंकों का खेल है, और जब हाथ में ब्रश और सामने एक कोरा कैनवास हो, तो समय जैसे ठहर सा जाता है। मेरे लिए पेंटिंग और गायकी केवल एक शौक नहीं, बल्कि मौन संवाद का, एक खूबसूरत नजरिया सा है। अपनी अनुभूतियों को हम इसी तरह जीवंत रख सकते हैं।
 
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, मन को शांत और केंद्रित रखना एक चुनौती होती है। कार्य एक प्रकार का 'सक्रिय ध्यान' (Active Meditation) है। ब्रश के हर स्ट्रोक और रंगों के मिश्रण पर ध्यान लगाने से मन की उथल-पुथल शांत हो जाती है औरगायकी से एक असीम शांति का अनुभव सा होता है।
 नए रंगों को मिलाना और अलग-अलग तकनीकों को सीखना मन को युवा बनाए रखता है।
 कभी-कभी जो बातें हम कह नहीं पाते, वे पेंटिंग के जरिए रंगों के रूप में बाहर आ जाती हैं।
 इसी तरह गायकी करते समय ,घंटों का पता नहीं चलता, जिससे बोरियत या अकेलेपन की जगह सृजन का आनंद ले लेता है।

जब हम अपनी बनाई हुई पेंटिंग को घर की दीवार पर सजाते हैं या अपने नाती-पोतों को दिखाते हैं, तो उनकी आंखों की चमक हमें एक नई ऊर्जा देती है। यह कला हमें समाज और परिवार से एक नए रूप में जोड़ती है।

जीवन एक जादुई सफर है जहाँ कोई 'गलती' नहीं होती, बस नए प्रयोग होते हैं। हमारे पास अनुभवों का जो खजाना है, उसे कैनवास पर बिखेरने का और माइक हाथ में पकड़के गाने का ,सबसे सही समय यही है। 
"हाथों की लकीरें भले ही धुंधली पड़ जाएं, लेकिन रंगों से बनी यादें हमेशा चमकती रहती हैं।"
 "कलाओं की कोई उम्र नहीं होती, बस एक दिल चाहिए जो धड़कना और बनाना जानता हो।"

अनिता सुखवाल
उदयपुर 


रविवार, 21 दिसंबर 2025

*मैं कौन हूँ*

 *मेरा एक बेटा  

एक बेटा डॉक्टर है और....*

*दूसरा बेटा प्रिन्सिपल है॥*

*💐 पर....मैं कौन हूँ? 💐*

*मेरे जीवन काल का रिटायरमेंट जब आ रहा है उस के बाद का, जब जीवन में ख़ालीपन और अकेलापन आया, तब आत्मचिंतन की एक गहरी अनुभूति हुई।*

*तो बताती हूँ, मैं कौन हूँ?*

*मेरे पति ने एक  बंगला बनाया। एक बड़ा सा फ़ार्म हाउस बनाया।*

*फिर भी आज,हम दोनों  अकेले चार दीवारों में क़ैद हैं।*

* हमने साइकिल से शुरुआत की, फिर मोपेड, बाइक और कारों तक का खूब सफर किया।*

*पर फिर भी आज, कमरे में नंगे पाँव चलते हैं।*ताकी वाकिंग हो जाये

*प्रकृति  थी,मुस्कराई भी और पूछा, “तुम कौन हो, मेरे मित्र?”*

*मैंने गर्व से उत्तर दिया,नहीं “मैं..तो. मैं हूँ।”*

*हमने राज्यों, देशों और विदेशों की यात्राएँ कीं।*

*फिर भी आज उम्र के पड़ाव पर यात्रा, ड्राइंग रूम और रसोई तक सीमित है।*

*हमने अनेक संस्कृतियाँ और परंपराएँ समझीं।*

*फिर भी आज, अपने ही परिवार को समझने की कोशिश करते हैं।

*हमने हमेशा  जन्मदिन, सगाई और शादी को बड़े धूमधाम से, उत्सव जैसा बनाया।*

*फिर भी आज, किराने का बजट तो बनाती ही हूँ।*

*कभी गायों और कुत्तों के लिए रोटियाँ बनवाती थी।*

*फिर भी आज, ख़ुद कुछ निवाले ही खा पाती हूँ।*

*सोना, चांदी, हीरे, मोती—*

*सभी तिजोरी में बंद हैं।*

*महंगे लहंगे सूट और साड़ियां —अलमारी में रखे हैं।*

*फिर भी आज, एक साधारण सूती कपड़े में ही घूमती हूँ।*

*मैंने अंग्रेज़ी, हिन्दी मालवी मेवाड़ी सीखी।*

*फिर भी आज, अपनी मातृभाषा हिंदी में ही समाचार पढ़ती हूँ।*

*कार्य और लाभ के लिए, लगातार यात्रा करती रही।*

*फिर भी आज, भी न जाने क्यूं, उसके लाभ-हानि पर विचार करती हूँ।*

*मैंने प्रेम पूर्वक निष्ठा भाव से, परिवार बसाया, कई रिश्ते बनाए।*

*फिर भी आज, सबसे गहरा रिश्ता दोस्तों ओर पड़ोसियों से है।*

*पढ़ाई में हज़ारों नियमों का पालन किया, किताबों से ज्ञान बटोरा।उसको बाटा भी*

*फिर भी आज, ये जीवन जीने के लिए, व्यवहारिक ज्ञान पर निर्भर हूँ।*

*एक पूरी ज़िंदगी, संघर्ष करते और दुनिया के पीछे भागते हुए बीती।

*परन्तु अब पहली बार, जब हाथों में कभी माला घुमाती हूँ,*

*तब अंतर आत्मा की आवाज़ सुनाई दी है।*

*अब बहुत हो चुका…*

*जागो यात्री!*

*अब अंतिम यात्रा की तैयारी करने का समय है।*

*प्रकृति फिर मुस्कराई और पूछा, “तुम कौन हो, मेरे मित्र?”*

*अब मैंने उत्तर दिया:*

*"हे प्रकृति, मैं तो शायद सदा से तुम्हारा ही अंश हूँ।"*

*किंतु मैं महत्वाकांक्षाओं के आकाश में उड़ती थी।*

*परन्तु अब सत्य के धरातल पर लौट आई हूँ।*

*मुझे क्षमा करो…*

*एक और अवसर दो, जीवन को तुम्हारे नियमों में बांधकर, जीने का।

*एक सच्चे इंसान की तरह जीने का…*

*संस्कारों और मूल्यों के साथ जीने का।*

*परिवार और प्रेम के साथ जीने का।*

मेँ भी तो समझूँ के मैं कौन हूँ? 💐 

  

रविवार, 14 दिसंबर 2025

*आने की खबर*

 छुट्टियों में बच्चों के 

   आने की खबर पाकर

       मां बौरा सी जाती है !

           साफ-सफाई की धुन में

              यहां वहां फर्नीचर से टकरा 

                   घायल हो जाती है

                     सच में मां बौरा सी जाती है! 

चादर, तकिए, रजाई, तौलिए

   तहाकर रखने में मगन

       भूखी-प्यासी, रहकर

            पूरा घर सजाती है

                सच में मां बौरा सी जाती है!    

अचार, मुरब्बे, चटनी, पापड़

   मर्तबान में सहेजती अक्सर       

        धूप-छांव के फेर में पड़कर

              कुछ मुरझा सी जाती है

                  सच में मां बौरा सी जाती है! 

हरदिन नया पकवान बना

    चखकर,  मन ही मन 

        इठला सी जाती है

           सच में मां बौरा सी जाती है! 

तय दिन की बाट जोहती

    घड़ी की धीमी चाल देखकर

        कुछ उकता सी जाती है

            सच में मां बौरा सी जाती है! 

मुहल्ले भर को बच्चों के आने की

      खबर सुनाती ,चलता-फिरता 

            एक अखबार बन जाती है! 

                सच में मां बौरा सी जाती है! 

बाद जाने के उनके फिर, 

  सूने पड़े कमरों में

     बच्चों की गूंजती हंसी और किस्से 

           मन ही मन दोहराती जाती है, 

                 सच में मां बौरा सी जाती है !


हमें भी हरबार 

घर जाने पर मिलती 

बौराती सी मां 

हरबार पुराने किस्से 

दोहराती सी मां।


*आराम दायक बुढ़ापा*

 अब तो बुढ़ापा पहाड़ सा लगने लगा है:उम्र जब बढ़ती है, तो शरीर ही नहीं, मन भी थकने लगता है। पहले जो रास्ते आसान लगते थे, वही उम्र ढलने पर पहाड़ जैसे ऊँचे दिखाई देने लगते हैं। बुढ़ापा सच में कोई बीमारी नहीं, न ही कोई अभिशाप है—लेकिन यह एक ऐसा सफ़र है जहाँ इंसान को अपने ही कदम भारी महसूस होने लगते हैं।

पहले हम दुनिया को अपने इशारों पर नचाते थे, आज अपने ही जूते के फीते बांधने में साँस फूला करती है। यही उम्र का नियम है, और यही जीवन का सबसे सच्चा चेहरा।धीरे-धीरे सब बदलने लगता है।रात को देर तक जागना मुश्किल, सुबह जल्दी उठना मजबूरी।पहले काम करने की इच्छा रहती थी, अब आराम करने का मन करता है, लेकिन आराम भी कहाँ मिलता है?मन में एक अजीब बेचैनी, एक खालीपन—जैसे कोई अदृश्य बोझ कंधों पर रख दिया हो।पहाड़ का भार शरीर पर नहीं पड़ता, मन पर पड़ता है। यही बुढ़ापा है।बुढ़ापे में सबसे बड़ी तकलीफ़ यह नहीं कि शरीर कमजोर हो गया, बल्कि यह है कि लोग भावनाओं को कमजोर समझने लगते हैं।पहले हमारे सुझावों में वजन था, आज वही शब्द किसी को पसंद नहीं आते। बच्चे बड़े हो गए, अपनी दुनिया बना ली; दोस्त अपनी-अपनी ज़िंदगी में खो गए। रिश्तों की गर्मी धूप सी थी, जो धीरे-धीरे परछाईं बन गई।कभी-कभी लगता है कि हम सबके लिए ज़रूरी थे, पर अब सिर्फ औपचारिकता भर रह गए हैं।यही है बुढ़ापे का पहाड़—शरीर नहीं, मन ढहता है।एक समय था जब घर में हर चाहिए-वाले काम में हमारी पूछ होती थी।आज घर में बैठकर भी ऐसा लगता है जैसे मेहमान हों।पहले घर में हमसे पूछे बिना कोई फ़ैसला नहीं होता था।आज फैसला बताने की भी ज़रूरत नहीं समझते।ये बदलाव चुभते हैं, कचोटते हैं और अंदर ही अंदर इंसान को तोड़ते हैं।और सबसे बड़ा बोझ है अकेलापन।ये अकेलापन धीरे से, चुपके से, बिना आवाज़ किए दिल के अंदर घुसता है।कभी रात को करवट बदलने पर एहसास होता है कि बात करने वाला कोई नहीं है।कोई यह पूछने वाला नहीं कि खाना खाया या नहीं।कई बार तो मन करता है बस कोई आकर थोड़ी देर बात कर ले, हाथ पकड़ ले या पीठ पर हल्का सा हाथ रख दे।पर ज़िंदगी में ऐसा किस्मत से ही मिलता है।बुढ़ापा कठिन इसलिए नहीं है कि हम बूढ़े हो गए, बल्कि इसलिए है कि दुनिया जवान रहना चाहती है।हम जब जवान थे, हमें भी ऐसा ही लगता था।उम्र ढलते-ढलते समझ आता है कि असली खुशी किसी चीज़ में नहीं, बस अपनेपन में होती है।लेकिन यह अपनेपन की तलाश हर बूढ़े इंसान को पहाड़ जैसी लगती है।फिर भी बुढ़ापा सिर्फ दर्द नहीं, सीख भी है।यही उम्र बताती है कि जो चीजें हम पूरी ज़िंदगी समझ नहीं पाए, अब धीरे-धीरे साफ होने लगती हैं।इंसान को यह एहसास होता है कि असली ताकत शरीर नहीं, मन में होती है।और अगर मन मजबूत रहे, तो पहाड़ भी टुकड़ों में बँटने लगता है।बात सिर्फ सोच की है—उम्र नहीं तोड़ती, अकेलापन तोड़ता है; और अकेलापन सिर्फ तभी जीतता है, जब हम अंदर से हार मान लेते हैं।इसलिए बुढ़ापे को पहाड़ समझने के बजाय, उसे यात्रा समझिए।धीमी सही, कठिन सही, लेकिन यह भी एक चरण है जिसमें मन को नए तरीके से जीवित रखना पड़ता है।सुबह उठकर अपनी एक वजह ढूँढना—चाहे वो पौधे हों, पूजा हो, पढ़ना हो, किसी से बात करना हो और अब अब तो मीडिया में  ढेरों ऑप्शन आ गए हैं जिससे आप अपना समय, आराम से पास कर सकते हैं ,और इस के साथ अपना ज्ञान भी बढ़ा सकते हैं —यही उम्र की असली ताकत है।

जिंदगी अभी भी है, और जीने की हिम्मत अभी भी बाकी है।


*भविष्य का आईना*

 बुढ़ापा वह दरवाज़ा है जहाँ से हर इंसान अकेले गुजरता है…और अंदर सिर्फ़ सन्नाटा रहता है। कहते हैं मौत अचानक आती है…नहीं। मौत धीरे-धीरे आती है। पहले रिश्तों से दूर करती है, फिर आवाज़ों से, फिर यादों से। और एक  दिन इंसान अपने ही घर में अनजान बन जाता है।

सबसे खतरनाक क्षण वह नहीं जब दिल धड़कना बंद हो…

सबसे भयानक वह है जब कमरा भरा हो फिर भी आवाज़ सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक की आए।

बाहर लोग कहते हैं — दादी जीआराम कर रहे होंगे…

अंदर दिल चीख रहा होता है — कोई मुझे याद भी करता है या नहीं?

बुढ़ापे में शरीर नहीं टूटता,

उम्मीदें टूटती हैं।

और उम्मीद टूट जाए,

तो इंसान सांस लेता हुआ भी मर चुका होता है।

आज जो बुज़ुर्ग आपके घर में हैं,

यही कल आपके भविष्य का आईना हैं।

उन्हें अनदेखा मत कीजिए…

वरना कल आपकी भी आवाज़ कोई नहीं सुनेगा।

अकेलापन मौत नहीं देता,

अकेलापन पहले इंसान की आत्मा मारता है

और शरीर बाद में गिरता है।


बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

*अद्वितीय*अद्भुत बुज़ुर्ग का जीवन जीवन

 वे हमें*बुज़ुर्ग* कहते हैं, क्योंकि 

हमारा जन्म40, 50, 60 के दशक में हुआ था...हम50, 60, 70 के दशक में पले-बढ़े...हमने60, 70, 80 के दशक में पढ़ाई की...हम70, 80, 90 के दशक में डेटिंग कर रहे थे...हमने70, 80, 90 के दशक में शादी कीऔर दुनिया की खोज की...हम80, 90 के दशक में कदम रखते हैं।करीबन  2000 के दशक में हम स्थिर हुए...2010 के दशक में हम समझदार हुए...और हम 2020 में और उससे भी आगे मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं...पता चला कि हम आठ अलग-अलग दशकों से गुज़रे हैं...दो अलग-अलग सदियों से...दो अलग-अलग सहस्राब्दियों से...हम लंबी दूरी की कॉल के लिए ऑपरेटर वाले टेलीफोन से दुनिया में कहीं भी वीडियो कॉल तक पहुँच गए हैं...हम स्लाइड्स से यूट्यूब तक,विनाइल रिकॉर्ड से ऑनलाइन संगीत तक, हस्तलिखित पत्र से ईमेल और व्हाट्सएप  telegram ,तक पहुँच गए हैं...रेडियो पर लाइव मैचों सेब्लैक एंड व्हाइट टीवी, रंगीन टीवी तक और फिर 3D HDTV तक...हम वीडियो स्टोर गए और अब हम    टनेफ्लिक्स देखते हैं...हमेंपहले कंप्यूटर,पंच कार्ड, फ्लॉपी डिस्क के बारे में पता चला, और अब हमारे पास गीगाबाइट हैं और हमारे स्मार्टफ़ोन पर मेगाबाइट...हमने बचपन में शॉर्ट्स पहने और फिर लंबी पतलून,और ऑक्सफ़ोर्ड, फ़्लेयर,शेल सूट और नीली जींस....हमने शिशु पक्षाघात, मेनिन्जाइटिस, पोलियो, तपेदिक, स्वाइन फ्लू और अब कोविड_90...हमने स्केट्स, ट्राइसाइकिल, साइकिल, मोपेड, पेट्रोल या डीज़ल कारें चलाईं और अब हाइब्रिड या इलेक्ट्रिक चला रहे हैं...हाँ, हमनेबहुत कुछ देखा हैलेकिन हमारा जीवन कितना शानदार रहा है!वे हमें "एक्सेनियल्स" कह सकते हैं,वे लोग जोपचास के दशक की दुनिया में पैदा हुए थे, जिनकाएक एनालॉग बचपनऔर

डिजिटल वयस्कता....हमने सब कुछ देखा है*!हमारी पीढ़ी ने सचमुच जीवन के हर आयाम में किसी भी अन्य पीढ़ी की तुलना में अधिक अनुभव और अनुभव किया है।यह हमारी पीढ़ी है जिसने सचमुच "बदलावों" को अपना लिया है।इस बेहद खास पीढ़ी के सभी सदस्यों को बहुत-बहुत बधाई,जो कि*अद्वितीय* होगी! ईश्वर हमें इस अद्भुत जीवन के लिए आशीर्वाद दे



मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

*वक्त के पन्ने*

घर में कई जन हैं
सब सोफे पर बैठते
और कवर हैं कि बार-बार अकड़ में आ 
टेढ़े हुए जाते हैं
गृहिणी अकेली
और सबको घर साफ़ पसंद
फिर कवर ठीक करना, 
फिर संभालना, फिर जचाना....
धत्! यह भी कोई काम है।

बर्तन कोई नहीं उठाता
कोई जूते व्यवस्थित नहीं रखता
कपड़े पहन कर निकाल फेंक दिए जाते हैं
मैले कपड़ों के भी ठिकाने होते हैं
जानते सब हैं पर रखता कौन है
गृहिणी उठाएंगी, धोएँगी, सुखाएंगी,समेटेंगी 
सब ठिकाने मिलेगा 
यही रोज के क्रम हैं।

सुबह के नाश्ते के बाद फिर रोटी
फिर बर्तन, 
जन एक-एक कर आएँगे जीमने
फिर रोटी, फिर थाली, फिर चक्करी
गृहणियाँ बस घूमती हैं घर भीतर।

उन्हें काम के रोने नहीं हैं
दुःख है अपनी ढलती काया का।

वे भी थकने लगती हैं
रोज के वही गीले तौलिए सुखाती हुई
वही तीन वक्त का खाना
और उस बीच बच्चों का कहना
क्या मम्मी! कभी कुछ ढंग का भी बना दिया करो।

बच्चे तेज रफ्तार में होते हैं
माँ धीमी
घर के बुजुर्ग अलग ठहराव में
उन्हें एक आवाज में हाजिर चाहिए सब।

एक दिन होने लगती है हर काम से उकताहट
झुंझलाहट घर में पसरती है
पर कोई नहीं समझता यह बात
गृहिणियां काम से नहीं अपनी उम्र और शरीर से भी झल्लाती हैं

"वक्त के पन्ने पलटकर देखती है तो, 
फ़िर वो हसीं लम्हे जीने को दिल चाहता है, 
कभी मुस्कराते थे सभी के साथ मिलकर हमारे साथ सभी
, 'अब उन्हें लम्हे, देखने को दिल तरस जाता है.