*मेरा एक बेटा
एक बेटा डॉक्टर है और....*
*दूसरा बेटा प्रिन्सिपल है॥*
*💐 पर....मैं कौन हूँ? 💐*
*मेरे जीवन काल का रिटायरमेंट जब आ रहा है उस के बाद का, जब जीवन में ख़ालीपन और अकेलापन आया, तब आत्मचिंतन की एक गहरी अनुभूति हुई।*
*तो बताती हूँ, मैं कौन हूँ?*
*मेरे पति ने एक बंगला बनाया। एक बड़ा सा फ़ार्म हाउस बनाया।*
*फिर भी आज,हम दोनों अकेले चार दीवारों में क़ैद हैं।*
* हमने साइकिल से शुरुआत की, फिर मोपेड, बाइक और कारों तक का खूब सफर किया।*
*पर फिर भी आज, कमरे में नंगे पाँव चलते हैं।*ताकी वाकिंग हो जाये
*प्रकृति थी,मुस्कराई भी और पूछा, “तुम कौन हो, मेरे मित्र?”*
*मैंने गर्व से उत्तर दिया,नहीं “मैं..तो. मैं हूँ।”*
*हमने राज्यों, देशों और विदेशों की यात्राएँ कीं।*
*फिर भी आज उम्र के पड़ाव पर यात्रा, ड्राइंग रूम और रसोई तक सीमित है।*
*हमने अनेक संस्कृतियाँ और परंपराएँ समझीं।*
*फिर भी आज, अपने ही परिवार को समझने की कोशिश करते हैं।
*हमने हमेशा जन्मदिन, सगाई और शादी को बड़े धूमधाम से, उत्सव जैसा बनाया।*
*फिर भी आज, किराने का बजट तो बनाती ही हूँ।*
*कभी गायों और कुत्तों के लिए रोटियाँ बनवाती थी।*
*फिर भी आज, ख़ुद कुछ निवाले ही खा पाती हूँ।*
*सोना, चांदी, हीरे, मोती—*
*सभी तिजोरी में बंद हैं।*
*महंगे लहंगे सूट और साड़ियां —अलमारी में रखे हैं।*
*फिर भी आज, एक साधारण सूती कपड़े में ही घूमती हूँ।*
*मैंने अंग्रेज़ी, हिन्दी मालवी मेवाड़ी सीखी।*
*फिर भी आज, अपनी मातृभाषा हिंदी में ही समाचार पढ़ती हूँ।*
*कार्य और लाभ के लिए, लगातार यात्रा करती रही।*
*फिर भी आज, भी न जाने क्यूं, उसके लाभ-हानि पर विचार करती हूँ।*
*मैंने प्रेम पूर्वक निष्ठा भाव से, परिवार बसाया, कई रिश्ते बनाए।*
*फिर भी आज, सबसे गहरा रिश्ता दोस्तों ओर पड़ोसियों से है।*
*पढ़ाई में हज़ारों नियमों का पालन किया, किताबों से ज्ञान बटोरा।उसको बाटा भी*
*फिर भी आज, ये जीवन जीने के लिए, व्यवहारिक ज्ञान पर निर्भर हूँ।*
*एक पूरी ज़िंदगी, संघर्ष करते और दुनिया के पीछे भागते हुए बीती।
*परन्तु अब पहली बार, जब हाथों में कभी माला घुमाती हूँ,*
*तब अंतर आत्मा की आवाज़ सुनाई दी है।*
*अब बहुत हो चुका…*
*जागो यात्री!*
*अब अंतिम यात्रा की तैयारी करने का समय है।*
*प्रकृति फिर मुस्कराई और पूछा, “तुम कौन हो, मेरे मित्र?”*
*अब मैंने उत्तर दिया:*
*"हे प्रकृति, मैं तो शायद सदा से तुम्हारा ही अंश हूँ।"*
*किंतु मैं महत्वाकांक्षाओं के आकाश में उड़ती थी।*
*परन्तु अब सत्य के धरातल पर लौट आई हूँ।*
*मुझे क्षमा करो…*
*एक और अवसर दो, जीवन को तुम्हारे नियमों में बांधकर, जीने का।
*एक सच्चे इंसान की तरह जीने का…*
*संस्कारों और मूल्यों के साथ जीने का।*
*परिवार और प्रेम के साथ जीने का।*
मेँ भी तो समझूँ के मैं कौन हूँ? 💐