बुढ़ापा वह दरवाज़ा है जहाँ से हर इंसान अकेले गुजरता है…और अंदर सिर्फ़ सन्नाटा रहता है। कहते हैं मौत अचानक आती है…नहीं। मौत धीरे-धीरे आती है। पहले रिश्तों से दूर करती है, फिर आवाज़ों से, फिर यादों से। और एक दिन इंसान अपने ही घर में अनजान बन जाता है।
सबसे खतरनाक क्षण वह नहीं जब दिल धड़कना बंद हो…
सबसे भयानक वह है जब कमरा भरा हो फिर भी आवाज़ सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक की आए।
बाहर लोग कहते हैं — दादी जीआराम कर रहे होंगे…
अंदर दिल चीख रहा होता है — कोई मुझे याद भी करता है या नहीं?
बुढ़ापे में शरीर नहीं टूटता,
उम्मीदें टूटती हैं।
और उम्मीद टूट जाए,
तो इंसान सांस लेता हुआ भी मर चुका होता है।
आज जो बुज़ुर्ग आपके घर में हैं,
यही कल आपके भविष्य का आईना हैं।
उन्हें अनदेखा मत कीजिए…
वरना कल आपकी भी आवाज़ कोई नहीं सुनेगा।
अकेलापन मौत नहीं देता,
अकेलापन पहले इंसान की आत्मा मारता है
और शरीर बाद में गिरता है।
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