अपने पति की ऐसी बात सुनकर आज पूरी रात सुनीता को नींद नहीं आई, सुनीता सोचती रही, रोती रहीं, और बुदबुदाने लगीं - "सच में मेंने आज तक किया ही क्या है ? अगर मेंने आज तक इस घर के लिए सच में कुछ नहीं किया, तो अब मेरा यहाँ रहने का कोई मतलब नहीं। कहाँ जाना है पता नहीं, मगर बस अब और नहीं। " ये सोचते हुए सुनीता अपने पति विशाल को एक चिठ्ठी लिखने लगीं।
"मैंने आज पूरी रात सोचा कि तुम शायद सही कह रहें थे। आज तक मैंने किया ही क्या है ? कौन हूँ मैं? क्या है मेरी पहचान ? चाहती तो थी मैं भी आसमान में उड़ना, मगर उडने से पहले ही मेरे पंख काट दिए गए। सपना देखने से पहले ही सपना तोड़ दिया गया। बाबा ने कहा, "शादी की उम्र बीती जा रही है, मुझसे पूछे बिना ही मेरी शादी करवा दी गई। बाबा का तो मानो, बहुत बड़ा बोझ उतर गया। ससुराल में मेरे लिए हर कोई अजनबी सा था। मगर माँ ने सिखाया था कि अब यही तुम्हारी दुनिया है, यही तेरे अपने। अब से इन सबको ही तुम अपने माँ, बाबा और भाई, बहन समझना। पति तेरे लिए परमेश्वर है, इनकी कही कोई बात मत टालना । सब को प्यार देके अपना बना लेना। माँ की बात मान के मैंने सबको अपना बनाया। मुझे क्या पसंद था और क्या नापसंद, इसके बारे में कभी सोचा ही नहीं।"
इतना लिखते लिखते उनकी आंख डबडबा उठी, अक्षर झिलमिलाने लगे। चश्मा उतारकर आंखें पोंछी, फिर लिखना शुरु किया।
"सुबह को आपकी कॉफ़ी और नाश्ता, बच्चो का लंच बॉक्स, बाबा की डायबिटीज की अलग से दवाई, नाश्ता, माँ के घुटनो की तेल मालिश, आपका टिफ़िन, मार्केट जाना, शाम की खाने की तैयारी करना, माँ को इलाज के लिए बार बार अस्पताल ले जाना, बच्चो को पढ़ाना, उनकी शैतानी बर्दाश्त करना, आपके दोस्त मेहमान बनकर अचानक से आए तो उनके लिए खाना बनाना। बस इतना ही तो किया मैंने ! और क्या किया ? इस लिए अब मुझे कुछ और करना है। अब मैं जा रही हूँ, ये तो नहीं जानती कि कहां जाऊंगी, मगर मुझे जाना है। पर तुम अपना ख्याल रखना।"
फिर सुनीता चिठ्ठी टेबल पर रख कर चुपचाप घर से बाहर निकल पड़ीं।
सुबह होते ही बाबूजी अपनी दवाई, नाश्ता और अख़बार के लिए बहू को आवाज़ देने लगे। उसके साथ ही माँ भी अपने घुटनो के मालिश के लिए बहू को आवाज़ देने लगी। बच्चे भी 'माँ ! हमारा ब्रेकफास्ट कहां है ? कोई जवाब न पाकर चिंतित हो उठे कि आज माँ कहा चली गई ?'
इतना शोरगुल सुनकर सुनीता के पति की भी ऑंखें खुल गई। 'क्या हो गया' यह सोचते हुए वो बाहर आया। "इतना शोर क्यों मचा रखा है सुबह सुबह?"
"पापा ! देखो ना, माँ कहीं नहीं दिख रही। हमको कॉलेज जाने में देरी हो रही है। अभी तक ब्रेकफास्ट भी नहीं किया। लगता है आज भूखा ही जाना पड़ेगा।" दूसरे ने कहा- "मेरी किताबे भी नहीं मिल रही, माँ तुम कहां हो ?" बाबूजी ने आवाज़ लगाई, "बहू ज़रा देखो तो, मेरा चश्मा किधर है ?" माँ ने आवाज़ लगा रही थी -"बहू ! मेरे मालिश की बोतल और दवाइयाँ कहाँ है ?"
सारा घर जैसे बिख़रा हुआ था। सुनीता का पति ज़ोर से चिल्लाया। "सब लोग चुप हो जाओ। में देखता हूँ वो कहां है, यही कहीं होगी, कहाँ जाएगी ?" वो सुनीता को फ़ोन करने लगा, मगर उसका फ़ोन तो कमरें में टेबल पर ही पड़ा हुआ था। उसने देखा फ़ोन के पास एक चिठ्ठी भी थी। उसे आश्चर्य के साथ बेचैनी भी होने लगी, उसने जल्दी से चिठ्ठी खोल के पढ़ी। चिठ्ठी पढ़कर ही उसे याद आया कि उसने कल शाम अपनी पत्नी का कैसे अपमान किया था, वो भी सब के सामने। ओह!! उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वो उस से माफ़ी मांँगना चाहता था, मगर कैसे ? उसका कोई अता पता नहीं था। उसने उसके मायके और उसकी सहेलियाँ, सबको फ़ोन करके पूछा, मगर किसी को नहीं पता था कि वो कहां है ? किस हाल में है ?
घर में कोहराम सा मच गया था। बाबू जी और मां तो जैसे अचानक ही और बूढ़े हो गए थे। उनकी दवाएं, उनका तेल, उनका चश्मा सब कुछ जैसे भूल गया था। उनकी भूख प्यास भी बंद सी हो रही थीं। बच्चे घर से बाहर ही नहीं निकल रहे थे। बच्चे अचानक जैसे बड़े हो गए थे। मजबूरी में वे घर का काम संभालने में लगे थे, मगर बहुत सारी चीज़ें उनको मिल ही नहीं रही थीं। सुनीता के पति का दिमाग ही काम नहीं कर रहा था। वह करे तो क्या करे और जाए तो कहां जाए। पुलिस में रिपोर्ट करने में भी बात फैलने से बदनामी का डर था। मगर रिपोर्ट तो करना ही होगा। उसने सोचा कि एक बार ससुराल वालों से बात करने के बाद ही पुलिस में सुनीता के गायब होने की रिपोर्ट देगा।
बिना नहाए धोए, बिना सेव किए, भूखा प्यासा वह बदहवाश सा अपनी ससुराल जा पहुंचा। ससुराल वालों ने उसकी हालत देखकर उसकी बात को गंभीरता से सुना। उसे बात करते करते आंखों से आंसू बहते देख सुनीता से नहीं रहा गया और वह सामने आकर खड़ी हो गई। सुनीता का पति जैसे नई जिंदगी पा गया हो और उठकर उसका हाथ पकड़ कर उसे भरी आंखों से देखने लगा। ससुराल के लोग हंसने लगे।
विशाल ने सब के सामने सुनीता से अपनी गलती की माफ़ी माँगी और वापिस घर चलने को कहा। औरत का दिल तो वैसे भी बड़ा होता है, इसलिए वह अपने परिवार को कैसे अकेला छोड़ देती ? सुनीता ने विशाल को आंखों आंखों में ही माफ़ कर दिया और पति के साथ घर चली आई।
घर में सब लोग बहुत खुश हुए, सबको सुनीता की कीमत का पता भी चल चुका था। अब सभी सुनीता को काम में मदद भी करने लगे थे। अब सारे काम का बोझ सिर्फ सुनीता पर नहीं था । बच्चे अपनी माँ को काम में मदद करने के साथ ही अपनी माँ का सम्मान भी करने लगे थे। सुनीता के पति विशाल ने अब जान लिया था कि सुनीता ने आज तक जो किया था, उसे कोई और कर पाने में सक्षम भी नहीं था।
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