रविवार, 21 दिसंबर 2025

*मैं कौन हूँ*

 *मेरा एक बेटा  

एक बेटा डॉक्टर है और....*

*दूसरा बेटा प्रिन्सिपल है॥*

*💐 पर....मैं कौन हूँ? 💐*

*मेरे जीवन काल का रिटायरमेंट जब आ रहा है उस के बाद का, जब जीवन में ख़ालीपन और अकेलापन आया, तब आत्मचिंतन की एक गहरी अनुभूति हुई।*

*तो बताती हूँ, मैं कौन हूँ?*

*मेरे पति ने एक  बंगला बनाया। एक बड़ा सा फ़ार्म हाउस बनाया।*

*फिर भी आज,हम दोनों  अकेले चार दीवारों में क़ैद हैं।*

* हमने साइकिल से शुरुआत की, फिर मोपेड, बाइक और कारों तक का खूब सफर किया।*

*पर फिर भी आज, कमरे में नंगे पाँव चलते हैं।*ताकी वाकिंग हो जाये

*प्रकृति  थी,मुस्कराई भी और पूछा, “तुम कौन हो, मेरे मित्र?”*

*मैंने गर्व से उत्तर दिया,नहीं “मैं..तो. मैं हूँ।”*

*हमने राज्यों, देशों और विदेशों की यात्राएँ कीं।*

*फिर भी आज उम्र के पड़ाव पर यात्रा, ड्राइंग रूम और रसोई तक सीमित है।*

*हमने अनेक संस्कृतियाँ और परंपराएँ समझीं।*

*फिर भी आज, अपने ही परिवार को समझने की कोशिश करते हैं।

*हमने हमेशा  जन्मदिन, सगाई और शादी को बड़े धूमधाम से, उत्सव जैसा बनाया।*

*फिर भी आज, किराने का बजट तो बनाती ही हूँ।*

*कभी गायों और कुत्तों के लिए रोटियाँ बनवाती थी।*

*फिर भी आज, ख़ुद कुछ निवाले ही खा पाती हूँ।*

*सोना, चांदी, हीरे, मोती—*

*सभी तिजोरी में बंद हैं।*

*महंगे लहंगे सूट और साड़ियां —अलमारी में रखे हैं।*

*फिर भी आज, एक साधारण सूती कपड़े में ही घूमती हूँ।*

*मैंने अंग्रेज़ी, हिन्दी मालवी मेवाड़ी सीखी।*

*फिर भी आज, अपनी मातृभाषा हिंदी में ही समाचार पढ़ती हूँ।*

*कार्य और लाभ के लिए, लगातार यात्रा करती रही।*

*फिर भी आज, भी न जाने क्यूं, उसके लाभ-हानि पर विचार करती हूँ।*

*मैंने प्रेम पूर्वक निष्ठा भाव से, परिवार बसाया, कई रिश्ते बनाए।*

*फिर भी आज, सबसे गहरा रिश्ता दोस्तों ओर पड़ोसियों से है।*

*पढ़ाई में हज़ारों नियमों का पालन किया, किताबों से ज्ञान बटोरा।उसको बाटा भी*

*फिर भी आज, ये जीवन जीने के लिए, व्यवहारिक ज्ञान पर निर्भर हूँ।*

*एक पूरी ज़िंदगी, संघर्ष करते और दुनिया के पीछे भागते हुए बीती।

*परन्तु अब पहली बार, जब हाथों में कभी माला घुमाती हूँ,*

*तब अंतर आत्मा की आवाज़ सुनाई दी है।*

*अब बहुत हो चुका…*

*जागो यात्री!*

*अब अंतिम यात्रा की तैयारी करने का समय है।*

*प्रकृति फिर मुस्कराई और पूछा, “तुम कौन हो, मेरे मित्र?”*

*अब मैंने उत्तर दिया:*

*"हे प्रकृति, मैं तो शायद सदा से तुम्हारा ही अंश हूँ।"*

*किंतु मैं महत्वाकांक्षाओं के आकाश में उड़ती थी।*

*परन्तु अब सत्य के धरातल पर लौट आई हूँ।*

*मुझे क्षमा करो…*

*एक और अवसर दो, जीवन को तुम्हारे नियमों में बांधकर, जीने का।

*एक सच्चे इंसान की तरह जीने का…*

*संस्कारों और मूल्यों के साथ जीने का।*

*परिवार और प्रेम के साथ जीने का।*

मेँ भी तो समझूँ के मैं कौन हूँ? 💐 

  

रविवार, 14 दिसंबर 2025

*आने की खबर*

 छुट्टियों में बच्चों के 

   आने की खबर पाकर

       मां बौरा सी जाती है !

           साफ-सफाई की धुन में

              यहां वहां फर्नीचर से टकरा 

                   घायल हो जाती है

                     सच में मां बौरा सी जाती है! 

चादर, तकिए, रजाई, तौलिए

   तहाकर रखने में मगन

       भूखी-प्यासी, रहकर

            पूरा घर सजाती है

                सच में मां बौरा सी जाती है!    

अचार, मुरब्बे, चटनी, पापड़

   मर्तबान में सहेजती अक्सर       

        धूप-छांव के फेर में पड़कर

              कुछ मुरझा सी जाती है

                  सच में मां बौरा सी जाती है! 

हरदिन नया पकवान बना

    चखकर,  मन ही मन 

        इठला सी जाती है

           सच में मां बौरा सी जाती है! 

तय दिन की बाट जोहती

    घड़ी की धीमी चाल देखकर

        कुछ उकता सी जाती है

            सच में मां बौरा सी जाती है! 

मुहल्ले भर को बच्चों के आने की

      खबर सुनाती ,चलता-फिरता 

            एक अखबार बन जाती है! 

                सच में मां बौरा सी जाती है! 

बाद जाने के उनके फिर, 

  सूने पड़े कमरों में

     बच्चों की गूंजती हंसी और किस्से 

           मन ही मन दोहराती जाती है, 

                 सच में मां बौरा सी जाती है !


हमें भी हरबार 

घर जाने पर मिलती 

बौराती सी मां 

हरबार पुराने किस्से 

दोहराती सी मां।


*आराम दायक बुढ़ापा*

 अब तो बुढ़ापा पहाड़ सा लगने लगा है:उम्र जब बढ़ती है, तो शरीर ही नहीं, मन भी थकने लगता है। पहले जो रास्ते आसान लगते थे, वही उम्र ढलने पर पहाड़ जैसे ऊँचे दिखाई देने लगते हैं। बुढ़ापा सच में कोई बीमारी नहीं, न ही कोई अभिशाप है—लेकिन यह एक ऐसा सफ़र है जहाँ इंसान को अपने ही कदम भारी महसूस होने लगते हैं।

पहले हम दुनिया को अपने इशारों पर नचाते थे, आज अपने ही जूते के फीते बांधने में साँस फूला करती है। यही उम्र का नियम है, और यही जीवन का सबसे सच्चा चेहरा।धीरे-धीरे सब बदलने लगता है।रात को देर तक जागना मुश्किल, सुबह जल्दी उठना मजबूरी।पहले काम करने की इच्छा रहती थी, अब आराम करने का मन करता है, लेकिन आराम भी कहाँ मिलता है?मन में एक अजीब बेचैनी, एक खालीपन—जैसे कोई अदृश्य बोझ कंधों पर रख दिया हो।पहाड़ का भार शरीर पर नहीं पड़ता, मन पर पड़ता है। यही बुढ़ापा है।बुढ़ापे में सबसे बड़ी तकलीफ़ यह नहीं कि शरीर कमजोर हो गया, बल्कि यह है कि लोग भावनाओं को कमजोर समझने लगते हैं।पहले हमारे सुझावों में वजन था, आज वही शब्द किसी को पसंद नहीं आते। बच्चे बड़े हो गए, अपनी दुनिया बना ली; दोस्त अपनी-अपनी ज़िंदगी में खो गए। रिश्तों की गर्मी धूप सी थी, जो धीरे-धीरे परछाईं बन गई।कभी-कभी लगता है कि हम सबके लिए ज़रूरी थे, पर अब सिर्फ औपचारिकता भर रह गए हैं।यही है बुढ़ापे का पहाड़—शरीर नहीं, मन ढहता है।एक समय था जब घर में हर चाहिए-वाले काम में हमारी पूछ होती थी।आज घर में बैठकर भी ऐसा लगता है जैसे मेहमान हों।पहले घर में हमसे पूछे बिना कोई फ़ैसला नहीं होता था।आज फैसला बताने की भी ज़रूरत नहीं समझते।ये बदलाव चुभते हैं, कचोटते हैं और अंदर ही अंदर इंसान को तोड़ते हैं।और सबसे बड़ा बोझ है अकेलापन।ये अकेलापन धीरे से, चुपके से, बिना आवाज़ किए दिल के अंदर घुसता है।कभी रात को करवट बदलने पर एहसास होता है कि बात करने वाला कोई नहीं है।कोई यह पूछने वाला नहीं कि खाना खाया या नहीं।कई बार तो मन करता है बस कोई आकर थोड़ी देर बात कर ले, हाथ पकड़ ले या पीठ पर हल्का सा हाथ रख दे।पर ज़िंदगी में ऐसा किस्मत से ही मिलता है।बुढ़ापा कठिन इसलिए नहीं है कि हम बूढ़े हो गए, बल्कि इसलिए है कि दुनिया जवान रहना चाहती है।हम जब जवान थे, हमें भी ऐसा ही लगता था।उम्र ढलते-ढलते समझ आता है कि असली खुशी किसी चीज़ में नहीं, बस अपनेपन में होती है।लेकिन यह अपनेपन की तलाश हर बूढ़े इंसान को पहाड़ जैसी लगती है।फिर भी बुढ़ापा सिर्फ दर्द नहीं, सीख भी है।यही उम्र बताती है कि जो चीजें हम पूरी ज़िंदगी समझ नहीं पाए, अब धीरे-धीरे साफ होने लगती हैं।इंसान को यह एहसास होता है कि असली ताकत शरीर नहीं, मन में होती है।और अगर मन मजबूत रहे, तो पहाड़ भी टुकड़ों में बँटने लगता है।बात सिर्फ सोच की है—उम्र नहीं तोड़ती, अकेलापन तोड़ता है; और अकेलापन सिर्फ तभी जीतता है, जब हम अंदर से हार मान लेते हैं।इसलिए बुढ़ापे को पहाड़ समझने के बजाय, उसे यात्रा समझिए।धीमी सही, कठिन सही, लेकिन यह भी एक चरण है जिसमें मन को नए तरीके से जीवित रखना पड़ता है।सुबह उठकर अपनी एक वजह ढूँढना—चाहे वो पौधे हों, पूजा हो, पढ़ना हो, किसी से बात करना हो और अब अब तो मीडिया में  ढेरों ऑप्शन आ गए हैं जिससे आप अपना समय, आराम से पास कर सकते हैं ,और इस के साथ अपना ज्ञान भी बढ़ा सकते हैं —यही उम्र की असली ताकत है।

जिंदगी अभी भी है, और जीने की हिम्मत अभी भी बाकी है।


*भविष्य का आईना*

 बुढ़ापा वह दरवाज़ा है जहाँ से हर इंसान अकेले गुजरता है…और अंदर सिर्फ़ सन्नाटा रहता है। कहते हैं मौत अचानक आती है…नहीं। मौत धीरे-धीरे आती है। पहले रिश्तों से दूर करती है, फिर आवाज़ों से, फिर यादों से। और एक  दिन इंसान अपने ही घर में अनजान बन जाता है।

सबसे खतरनाक क्षण वह नहीं जब दिल धड़कना बंद हो…

सबसे भयानक वह है जब कमरा भरा हो फिर भी आवाज़ सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक की आए।

बाहर लोग कहते हैं — दादी जीआराम कर रहे होंगे…

अंदर दिल चीख रहा होता है — कोई मुझे याद भी करता है या नहीं?

बुढ़ापे में शरीर नहीं टूटता,

उम्मीदें टूटती हैं।

और उम्मीद टूट जाए,

तो इंसान सांस लेता हुआ भी मर चुका होता है।

आज जो बुज़ुर्ग आपके घर में हैं,

यही कल आपके भविष्य का आईना हैं।

उन्हें अनदेखा मत कीजिए…

वरना कल आपकी भी आवाज़ कोई नहीं सुनेगा।

अकेलापन मौत नहीं देता,

अकेलापन पहले इंसान की आत्मा मारता है

और शरीर बाद में गिरता है।


बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

*अद्वितीय*अद्भुत बुज़ुर्ग का जीवन जीवन

 वे हमें*बुज़ुर्ग* कहते हैं, क्योंकि 

हमारा जन्म40, 50, 60 के दशक में हुआ था...हम50, 60, 70 के दशक में पले-बढ़े...हमने60, 70, 80 के दशक में पढ़ाई की...हम70, 80, 90 के दशक में डेटिंग कर रहे थे...हमने70, 80, 90 के दशक में शादी कीऔर दुनिया की खोज की...हम80, 90 के दशक में कदम रखते हैं।करीबन  2000 के दशक में हम स्थिर हुए...2010 के दशक में हम समझदार हुए...और हम 2020 में और उससे भी आगे मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं...पता चला कि हम आठ अलग-अलग दशकों से गुज़रे हैं...दो अलग-अलग सदियों से...दो अलग-अलग सहस्राब्दियों से...हम लंबी दूरी की कॉल के लिए ऑपरेटर वाले टेलीफोन से दुनिया में कहीं भी वीडियो कॉल तक पहुँच गए हैं...हम स्लाइड्स से यूट्यूब तक,विनाइल रिकॉर्ड से ऑनलाइन संगीत तक, हस्तलिखित पत्र से ईमेल और व्हाट्सएप  telegram ,तक पहुँच गए हैं...रेडियो पर लाइव मैचों सेब्लैक एंड व्हाइट टीवी, रंगीन टीवी तक और फिर 3D HDTV तक...हम वीडियो स्टोर गए और अब हम    टनेफ्लिक्स देखते हैं...हमेंपहले कंप्यूटर,पंच कार्ड, फ्लॉपी डिस्क के बारे में पता चला, और अब हमारे पास गीगाबाइट हैं और हमारे स्मार्टफ़ोन पर मेगाबाइट...हमने बचपन में शॉर्ट्स पहने और फिर लंबी पतलून,और ऑक्सफ़ोर्ड, फ़्लेयर,शेल सूट और नीली जींस....हमने शिशु पक्षाघात, मेनिन्जाइटिस, पोलियो, तपेदिक, स्वाइन फ्लू और अब कोविड_90...हमने स्केट्स, ट्राइसाइकिल, साइकिल, मोपेड, पेट्रोल या डीज़ल कारें चलाईं और अब हाइब्रिड या इलेक्ट्रिक चला रहे हैं...हाँ, हमनेबहुत कुछ देखा हैलेकिन हमारा जीवन कितना शानदार रहा है!वे हमें "एक्सेनियल्स" कह सकते हैं,वे लोग जोपचास के दशक की दुनिया में पैदा हुए थे, जिनकाएक एनालॉग बचपनऔर

डिजिटल वयस्कता....हमने सब कुछ देखा है*!हमारी पीढ़ी ने सचमुच जीवन के हर आयाम में किसी भी अन्य पीढ़ी की तुलना में अधिक अनुभव और अनुभव किया है।यह हमारी पीढ़ी है जिसने सचमुच "बदलावों" को अपना लिया है।इस बेहद खास पीढ़ी के सभी सदस्यों को बहुत-बहुत बधाई,जो कि*अद्वितीय* होगी! ईश्वर हमें इस अद्भुत जीवन के लिए आशीर्वाद दे



मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

*वक्त के पन्ने*

घर में कई जन हैं
सब सोफे पर बैठते
और कवर हैं कि बार-बार अकड़ में आ 
टेढ़े हुए जाते हैं
गृहिणी अकेली
और सबको घर साफ़ पसंद
फिर कवर ठीक करना, 
फिर संभालना, फिर जचाना....
धत्! यह भी कोई काम है।

बर्तन कोई नहीं उठाता
कोई जूते व्यवस्थित नहीं रखता
कपड़े पहन कर निकाल फेंक दिए जाते हैं
मैले कपड़ों के भी ठिकाने होते हैं
जानते सब हैं पर रखता कौन है
गृहिणी उठाएंगी, धोएँगी, सुखाएंगी,समेटेंगी 
सब ठिकाने मिलेगा 
यही रोज के क्रम हैं।

सुबह के नाश्ते के बाद फिर रोटी
फिर बर्तन, 
जन एक-एक कर आएँगे जीमने
फिर रोटी, फिर थाली, फिर चक्करी
गृहणियाँ बस घूमती हैं घर भीतर।

उन्हें काम के रोने नहीं हैं
दुःख है अपनी ढलती काया का।

वे भी थकने लगती हैं
रोज के वही गीले तौलिए सुखाती हुई
वही तीन वक्त का खाना
और उस बीच बच्चों का कहना
क्या मम्मी! कभी कुछ ढंग का भी बना दिया करो।

बच्चे तेज रफ्तार में होते हैं
माँ धीमी
घर के बुजुर्ग अलग ठहराव में
उन्हें एक आवाज में हाजिर चाहिए सब।

एक दिन होने लगती है हर काम से उकताहट
झुंझलाहट घर में पसरती है
पर कोई नहीं समझता यह बात
गृहिणियां काम से नहीं अपनी उम्र और शरीर से भी झल्लाती हैं

"वक्त के पन्ने पलटकर देखती है तो, 
फ़िर वो हसीं लम्हे जीने को दिल चाहता है, 
कभी मुस्कराते थे सभी के साथ मिलकर हमारे साथ सभी
, 'अब उन्हें लम्हे, देखने को दिल तरस जाता है.

शनिवार, 11 अक्टूबर 2025

*क्या किया है*

शादी के तीस साल बाद आज उन्होंने बातों ही बातों में किसी बात से नाराज़ होकर सब के सामने कहा, "तूने आज तक किया ही क्या है ? सिर्फ घर पे खाना बनाना और बच्चों को संभालना और वह भी ठीक से नहीं कर सकी। बच्चे भी तुम्हारी सुनते कब हैं ? वो अपने मन की ही तो करते हैं। इतने सालो में तूने उनको कुछ नहीं सिखाया, तभी इतने बिगड़ गए है दोनों बच्चे।"

अपने पति की ऐसी बात सुनकर आज पूरी रात सुनीता को नींद नहीं आई, सुनीता सोचती रही, रोती रहीं, और बुदबुदाने लगीं - "सच में मेंने आज तक किया ही क्या है ? अगर मेंने आज तक इस घर के लिए सच में कुछ नहीं किया, तो अब मेरा यहाँ रहने का कोई मतलब नहीं। कहाँ जाना है पता नहीं, मगर बस अब और नहीं। " ये सोचते हुए सुनीता अपने पति विशाल को एक चिठ्ठी लिखने लगीं।  

"मैंने आज पूरी रात सोचा कि तुम शायद सही कह रहें थे। आज तक मैंने किया ही क्या है ? कौन हूँ मैं? क्या है मेरी पहचान ? चाहती तो थी मैं भी आसमान में उड़ना, मगर उडने से पहले ही मेरे पंख काट दिए गए। सपना देखने से पहले ही सपना तोड़ दिया गया। बाबा ने कहा, "शादी की उम्र बीती जा रही है, मुझसे पूछे बिना ही मेरी शादी करवा दी गई। बाबा का तो मानो, बहुत बड़ा बोझ उतर गया। ससुराल में मेरे लिए हर कोई अजनबी सा था। मगर माँ ने सिखाया था कि अब यही तुम्हारी दुनिया है, यही तेरे अपने। अब से इन सबको ही तुम अपने माँ, बाबा और भाई, बहन समझना। पति तेरे लिए परमेश्वर है, इनकी कही कोई बात मत टालना । सब को प्यार देके अपना बना लेना। माँ की बात मान के मैंने सबको अपना बनाया। मुझे क्या पसंद था और क्या नापसंद, इसके बारे में कभी सोचा ही नहीं।"

इतना लिखते लिखते उनकी आंख डबडबा उठी, अक्षर झिलमिलाने लगे। चश्मा उतारकर आंखें पोंछी, फिर लिखना शुरु किया।

"सुबह को आपकी कॉफ़ी और नाश्ता, बच्चो का लंच बॉक्स, बाबा की डायबिटीज की अलग से दवाई, नाश्ता, माँ के घुटनो की तेल मालिश, आपका टिफ़िन, मार्केट जाना, शाम की खाने की तैयारी करना, माँ को इलाज के लिए बार बार अस्पताल ले जाना, बच्चो को पढ़ाना, उनकी शैतानी बर्दाश्त करना, आपके दोस्त मेहमान बनकर अचानक से आए तो उनके लिए खाना बनाना। बस इतना ही तो किया मैंने ! और क्या किया ? इस लिए अब मुझे कुछ और करना है। अब मैं जा रही हूँ, ये तो नहीं जानती कि कहां जाऊंगी, मगर मुझे जाना है। पर तुम अपना ख्याल रखना।"

          फिर सुनीता चिठ्ठी टेबल पर रख कर चुपचाप घर से बाहर निकल पड़ीं।

          सुबह होते ही बाबूजी अपनी दवाई, नाश्ता और अख़बार के लिए बहू को आवाज़ देने लगे। उसके साथ ही माँ भी अपने घुटनो के मालिश के लिए बहू को आवाज़ देने लगी। बच्चे भी 'माँ ! हमारा ब्रेकफास्ट कहां है ? कोई जवाब न पाकर चिंतित हो उठे कि आज माँ कहा चली गई ?' 

           इतना शोरगुल सुनकर सुनीता के पति की भी ऑंखें खुल गई। 'क्या हो गया' यह सोचते हुए वो बाहर आया। "इतना शोर क्यों मचा रखा है सुबह सुबह?" 
 "पापा ! देखो ना, माँ कहीं नहीं दिख रही। हमको कॉलेज जाने में देरी हो रही है। अभी तक ब्रेकफास्ट भी नहीं किया। लगता है आज भूखा ही जाना पड़ेगा।" दूसरे ने कहा- "मेरी किताबे भी नहीं मिल रही, माँ तुम कहां हो ?" बाबूजी ने आवाज़ लगाई, "बहू ज़रा देखो तो, मेरा चश्मा किधर है ?" माँ ने आवाज़ लगा रही थी -"बहू ! मेरे मालिश की बोतल और दवाइयाँ कहाँ है ?"

           सारा घर जैसे बिख़रा हुआ था। सुनीता का पति ज़ोर से चिल्लाया। "सब लोग चुप हो जाओ। में देखता हूँ वो कहां है, यही कहीं होगी, कहाँ जाएगी ?" वो सुनीता को फ़ोन करने लगा, मगर उसका फ़ोन तो कमरें में टेबल पर ही पड़ा हुआ था। उसने देखा फ़ोन के पास एक चिठ्ठी भी थी। उसे आश्चर्य के साथ बेचैनी भी होने लगी, उसने जल्दी से चिठ्ठी खोल के पढ़ी। चिठ्ठी पढ़कर ही उसे याद आया कि उसने कल शाम अपनी पत्नी का कैसे अपमान किया था, वो भी सब के सामने। ओह!! उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वो उस से माफ़ी मांँगना चाहता था, मगर कैसे ? उसका कोई अता पता नहीं था। उसने उसके मायके और उसकी सहेलियाँ, सबको फ़ोन करके पूछा, मगर किसी को नहीं पता था कि वो कहां है ? किस हाल में है ?
 
           घर में कोहराम सा मच गया था। बाबू जी और मां तो जैसे अचानक ही और बूढ़े हो गए थे। उनकी दवाएं, उनका तेल, उनका चश्मा सब कुछ जैसे भूल गया था। उनकी भूख प्यास भी बंद सी हो रही थीं। बच्चे घर से बाहर ही नहीं निकल रहे थे। बच्चे अचानक जैसे बड़े हो गए थे। मजबूरी में वे घर का काम संभालने में लगे थे, मगर बहुत सारी चीज़ें उनको मिल ही नहीं रही थीं। सुनीता के पति का दिमाग ही काम नहीं कर रहा था। वह करे तो क्या करे और जाए तो कहां जाए। पुलिस में रिपोर्ट करने में भी बात फैलने से बदनामी का डर था। मगर रिपोर्ट तो करना ही होगा। उसने सोचा कि एक बार ससुराल वालों से बात करने के बाद ही पुलिस में सुनीता के गायब होने की रिपोर्ट देगा।
           बिना नहाए धोए, बिना सेव किए, भूखा प्यासा वह बदहवाश सा अपनी ससुराल जा पहुंचा। ससुराल वालों ने उसकी हालत देखकर उसकी बात को गंभीरता से सुना। उसे बात करते करते आंखों से आंसू बहते देख सुनीता से नहीं रहा गया और वह सामने आकर खड़ी हो गई। सुनीता का पति जैसे नई जिंदगी पा गया हो और उठकर उसका हाथ पकड़ कर उसे भरी आंखों से देखने लगा। ससुराल के लोग हंसने लगे। 

विशाल ने सब के सामने सुनीता से अपनी गलती की माफ़ी माँगी और वापिस घर चलने को कहा। औरत का दिल तो वैसे भी बड़ा होता है, इसलिए वह अपने परिवार को कैसे अकेला छोड़ देती ? सुनीता ने विशाल को आंखों आंखों में ही माफ़ कर दिया और पति के साथ घर चली आई। 

घर में सब लोग बहुत खुश हुए, सबको सुनीता की कीमत का पता भी चल चुका था। अब सभी सुनीता को काम में मदद भी करने लगे थे। अब सारे काम का बोझ सिर्फ सुनीता पर नहीं था । बच्चे अपनी माँ को काम में मदद करने के साथ ही अपनी माँ का सम्मान भी करने लगे थे। सुनीता के पति विशाल ने अब जान लिया था कि सुनीता ने आज तक जो किया था, उसे कोई और कर पाने में सक्षम भी नहीं था।  


शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

*दर्द*

 मैं भी इंसान हूँ..." 🌧️🕊️


हर रोज़ मुस्कुराती हूँ, पर कभी-कभी में भी अंदर से रोती हूँ,

भीड़ में सबसे मिलती हूँ, पर अंदर से अपने आप को खोती भी हूँ।


हर चेहरे पे हँसी बाँटती हूँ,कोशिश यही होती है मेरी

पर अपने ग़म किसी से नहीं कहती,आदत है मेरी, 

क्योंकि मैंने सीखा है —

हर सवाल का जवाब देना

हर बार ज़रूरी नहीं होता।


मैं पत्थर नहीं…

जो ठोकरें खा के भी ,आवाज़ न करे,

मैं भी एक इंसान हूँ…

फिर भी कभी-कभी ,टूटकर, खुद से ही माफ़ी माँग लेती हूँ।


कभी किसी की जीत में तालियाँ बजाईं,

तो कभी खुद की हार पे चुपचाप सिर भी झुकाया है मैने।

मैंने रिश्तों को बचाने में खुद को खोया,

पर कभी किसी को ये एहसास तक नहीं होने दिया।


कई लोग कहते भी हैं —

"तू तो मजबूत है ..."

पर कोई नहीं जानता —

मजबूती की इस, दीवार के पीछे, 

एक थका हुआ दिल, हर रात बिखरता भी है।


मैं दिखती हूँ शांत समंदर सी,

पर अंदर ज्वार मेरे भी उठते हैं — 

रोज़… हर लम्हा उठते हैं।


कभी-कभी जी चाहता है —

कि कोई तो पूछे...

"तू ठीक तो है ना?" 



मंगलवार, 2 सितंबर 2025

*कभी नहीं सोचा*

 कभी सोचा है…हम कौन हैं 

क्या हैं, किधर हैं, क्यूँ हैं 


हर वक़्त भाग रहे हैं हम 

किसी और के जैसा बनने के लिए 


अपने जैसा बनने में 

अपने दिल की सुनने में 

पता नहीं कौन सा डर है हमें 


जिसके साथ ख़ुश हैं 

उसके साथ होते नहीं 

जो पाना चाहते हैं 

वो मिलता नहीं 

हर वक़्त ख़ुद से जाने 

कितने समझौते 

करते हुए जिये जा रहे हैं 


अपने ही भीतर की 

आवाज़ को 

अनसुनी कर 

बाहर के शोर में 

ख़ुद को 

खोते चले जा रहे हम 

सबके लिए और 

सबके हिसाब से जीते जी

सबके जैसे बनने की 

होड़ में ख़ुद को ही 

मारते जा रहे हम 


कौन है हम वास्तव में 

क्या चाहते हैं हम ?

क्या ये सवाल ख़ुद से 

कभी करते हैं हम ?


शायद नहीं… 

क्यूँकि ख़ुद के भीतर 

झांक कर देखना ही 

नहीं चाहते हम

अपनी ही सच्चाई से डरते हैं हम

दुनिया के इस बने बनाए ढाँचे में 

ख़ुद को कैसे भी करके फ़िट करते हम ll


अनिता ✍️





शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

*अनपढ़*

  बेटे का जॉइनिंग लेटर आया है और पिता-पुत्र खोल कर पढ़ रहे है मां दौड़ी दौड़ी आती है और बोलती है मुझे भी दिखाइए ..




बेटा तपाक से बोलता है पढ़ पाओगी आप तो अनपढ़ हो!!!!! 


बेटे का यह शब्द पिता को चुभ गया...


सही बोल रहा है बेटा!!!




वह अनपढ़ है।


इसलिए तुम्हारे कॉपी-किताबों में गलतियाँ सुधार नहीं पाती थी, पर रात-रात भर तुम्हें पढ़ते हुए देखती रहती थी।




वह अनपढ़ है।


इसलिए गणित के सवाल तुम्हें नहीं समझा पाई, पर तुम्हारे पास बैठकर दीपक की लौ तेज करती रही ताकि तुम अंधेरे में भी पढ़ सको।




वह अनपढ़ है।


पर नौ महीने तुम्हें अपने पेट में ढोया, जब डॉक्टर ने कहा था कि यह सफर मुश्किल है, तब भी उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।




वह अनपढ़ है।


इसलिए बड़े-बड़े सपनों का मतलब नहीं समझती थी, लेकिन चाहती थी कि उसका बेटा आसमान से भी ऊँचा उड़ जाए।




वह अनपढ़ है।


तुम्हारे स्कूल जाने से दो घंटे पहले उठ जाती, टिफिन बनाती, जूते पॉलिश करती, और दरवाजे पर खड़े होकर तुम्हें आशीर्वाद देती—“पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना।”




वह अनपढ़ है।


इसलिए तुम्हें कभी होमवर्क में मदद न कर सकी, पर तुम्हारे आँसुओं को पोंछकर यह जरूर कहती—“बेटा, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।”




वह अनपढ़ है।


इसलिए तुम्हारे रिजल्ट कार्ड के नंबर नहीं पढ़ पाती थी, लेकिन तुम्हारे चेहरे की खुशी देखकर समझ जाती थी कि तुम पास हो गए हो।




वह अनपढ़ है।


इसलिए तुम्हारे नाम की स्पेलिंग नहीं जानती थी, पर तुम्हारे नाम से ही उसकी दुनिया रोशन थी।




वह अनपढ़ है।


लेकिन उसका त्याग, उसका संघर्ष, उसका प्यार—दुनिया की किसी किताब से कम नहीं था।




आज तुम पढ़-लिखकर दुनिया जीत रहे हो, लेकिन याद रखना—तुम्हारी पहली गुरु वही थी।


वह अनपढ़ थी… पर उसी ने तुम्हें जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान दिया।

अनिता✍🏼










बुधवार, 13 अगस्त 2025

*आत्मिक संतुष्ष्टि *

 वो समझदार बहु **

😇😇😇😇

शाम को गरमी थोड़ी थमी तो मैं पड़ोस में जाकर निशा के पास बैठ गई। 

आखिर ,उसकी सासू माँ भी तो कई दिनों से बीमार है..... सोचा ख़बर भी ले आऊँ और निशा के पास बैठ भी आऊँ। मेरे बैठे-बैठे पड़ोस में रहने वाली उसकी तीनों देवरानियाँ भी आ गईं। निशा से पूछा ‘‘अम्मा जी, कैसी हैं?’’ 

और पूछ कर इतमीनान से चाय-पानी पीने लगी।.......फिर एक-एक करके अम्माजी की बातें होने लगी। सिर्फ़ शिकायतें.......... ‘‘जब मैं आई तो अम्माजी ने ऐसा कहा, वैसा कहा, ये किया, वो किया।’’

आधे घंटे तक शिकायते करने के बाद सब ये कहकर चली गईं....... कि उनको शाम का खाना बनाना है....बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। 

उनके जाने के बाद मैं निशा से पूछ बैठी,

निशा अम्माजी, आज एक साल से बीमार हैं और तेरे ही पास हैं। तेरे मन में नहीं आता कि कोई और भी रखे या इनका काम करे, माँ तो सबकी है।’’

उसका उत्तर सुनकर मैं तो जड़-सी हो गई। 

वह बोली, ‘‘बहनजी, मेरी सास सात बच्चों की माँ है। अपने बच्चो को पालने में उनको अच्छी जिंदगी देने में कभी भी अपने सुख की परवाह नही की.... सबकी अच्छी तरह से परवरिश की ......ये जो आप देख रही हैं न मेरा घर, पति, बेटा....बेटी , शानो-शौकत सब मेरी सासुजी की ही देन है।......

अपनी-अपनी समझ है बहनजी । मैं तो सोचती हूँ इन्हें क्या-क्या खिला-पिला दूँ, कितना सुख दूँ, मेरे दोनों बेटे बेटी अपनी दादी मां के पास सुबह-शाम बैठते हैं..... उन्हे देखकर वो मुस्कराती हैं, अपने कमजोर हाथो से वो उन दोनों का माथा चेहरा ओर शरीर सहलाकर उन्हे जी भरकर दुआएँ देती हैँ।

जब मैं सासु माँ को नहलाती, खिलाती-पिलाती हूँ, ओर इनकी सेवा करती हूँ तो जो संतुष्टि के भाव मेरे पति के चेहरे पर आते है उसे देखकर मैं धन्य हो जाती हूँ၊ मन में ऐसा अहसास होता है जैसे दुनिया का सबसे बड़ा सुख मिल गया हो.......

मेरी सासु माँ तो मेरा तीसरा बच्चा बन चुकी हैं.........

और ये कहकर वो सुबकसुबक कर रो पड़ी।

मैं इस ज़माने में उसकी यह समझदारी देखकर हैरान थी, मैने उसे अपनी छाती से लगाया और मन ही मन उसे नमन किया और उसकी सराहना की .......

कि कैसे कुछ निहित स्वार्थी ओर अपने ही लोग तरह-तरह के बहाने बना लेते है तथा अपनी आज़ादी और ऐशो अय्याशी के लिए,अपनी प्यार एवं ममता की मूरत को ठुकरा देते हैं

 😇😇😇😇

मंगलवार, 5 अगस्त 2025

*बस इतना*

 मुझको रखना बंद,

लिफाफे की तरह,

अपने दिल में 

छुपाकर कहीं,

न दिखने देना ,

न किसी तक पहुंचने देना,

तुम आहट मेरी,

तुम इस तरह रखना सहेजकर मुझको,

जैसे होती है नाजुक सी,

पंखुड़ियां गुलाब की,

मेरी अठखेलियां,

मेरा बचपना सहेज लेना तुम,

तुम मेरी सांसों की,

महक को भी खुद में समाए रखना,

नन्ही चिड़िया सा देना हमेशा,

तुम लाड़ मुझे,

अपनी हथेलियों की ,

गर्माहट मेरे गालों पर बरकरार रखना,

ज्यादा उम्मीदें तो नही रखता

मैं किसी से कभी,

बस तुम अपने एहसासों में ,

मुझको बसाए रखना..!




रविवार, 4 मई 2025

*accept & enjoy*

सुबह से लेकर शाम तक, शाम से लेके रात तक, रात से फिर सुबह तक........


*सच में ऐसा लगता है, किचन और खाना के अलावा ज़िन्दगी में कुछ और है ही नही*। 


हर औरत की दुविधा, कब और क्या बनाना है। *कभी कभी लगता हैं खुद को ही पका डालू*।


सॉरी !ऐसा बोलना नही चाहती पर ऐसा ही लगता है।


ऐसा नही की मुझे खाना बनाना पसंद नही। 


*मुझे खाना बनाना बहुत पसंद है, और लोग कहते है कि मै बहुत टेस्टी खाना बनाती हूँ*। 


*पर हर चीज़ की हद होती है*। अगर 24 घंटे में 8 घंटे भी किचन में रहना पड़े तो कैसा लगेगा?


हमारे यहाँ तोरी- परवल कोई नही खाता। बैगन -गोभी  पसंद नही। करेले से तो एलर्जी है। 


तो क्या रहा? 


आलू और भिंडी।पापा डाईबेटिक पेशेंट है, इसलिए आलू अवॉयड करते हैं।


पति को छोले पनीर पसंद है, पापा को भाती नही। पापा को मंगोड़ी पापड़ पसंद हैं, पति ने आज तक चखा नही।


अब हमारी प्यारी माताजी।दांतों का इलाज चल रहा हैं। चावल खिचड़ी उपमा, उनको भाता नही। 


बचा बिचारा दलिया। उसके साथ भी कढ़ी और आलू।


अब सुनो ये रात से सुबह तक के किस्से। 


कभी रात 12 बजे दही ज़माना याद आता हैं। 


कभी रात के 1 बजे चने भिगोने।


कभी 2 बजे लगता है कहीं किचन की मोटर तो ओंन नही। 


कभी 3 बजे फ्रीजर से बोतल निकालना। 


4 बज गए तो दही अंदर रख दू नही तो खट्टा हो जाएगा।


*क्या करूँ मैं और मेरे जैसी बिचारियाँ ये किचन कॉलिंग यही खत्म नही होता*। 


बच्चे 7 बजे दूध पीते है, माँ पापा 8 बजे चाय। पति देव 9 बजे कॉफ़ी।बच्चे 10 बजे नाश्ता करते है, पति 11 और माँ 12।


सासु माँ 2 बजे लंच करती हैं । बच्चे 3 बजे। थैंक्स गॉड, इनका और पापा का लंच पैक होता हैं।


*डिनर की तो पूछो मत*..

बच्चे 8 बजे। पापा 9 बजे। माँ 10 बजे और पति देव 11 बजे।


12 से 4 की कहानी तो मैं पहले ही सुना चुकी हूँ।


*सच बोलू तो ये कोई व्यंग्य नही है। मेरी ज़िंदगी की हकीकत हैं*। 


पहले पहले तो रोती थीं, ये सब अखरता था, सारा दिन चिड़चिड़ी रहती थी। 


फिर किसी ने मुझे समझाया, *जो चीज़ हम बदल नही सकते, उसे accept करो और enjoy करो*।


इसलिए अब इसे व्यंग्य के रूप में बता कर हँस लेती हूँ , हँसा देती हूँ।




शनिवार, 3 मई 2025

*प्रतिक्रिया*

 मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...

मुझे हर उस बात पर प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए जो मुझे चिंतित करती है।

 मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...

जिन्होंने मुझे चोट दी है मुझे उन्हें चोट नहीं देनी है।

 मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...

शायद सबसे बड़ी समझदारी का लक्षण भिड़ जाने के बजाय अलग हट जाने में है।

 मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...

अपने साथ हुए प्रत्येक बुरे बर्ताव पर प्रतिक्रिया करने में आपकी जो ऊर्जा खर्च होती है

 वह आपको खाली कर देती है और आपको दूसरी अच्छी चीजों को देखने से रोकती है |


 मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...

मैं हर आदमी से वैसा व्यवहार नहीं पा सकूंगी जिसकी मैं अपेक्षा करती हूँ।

 मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...

किसी का दिल जीतने के लिए बहुत कठोर प्रयास करना समय और ऊर्जा की बर्बादी है और यह आपको कुछ नहीं देता, केवल खालीपन से भर देता है।

 मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...

जवाब नहीं देने का अर्थ यह कदापि नहीं कि यह सब मुझे स्वीकार्य है, बल्कि यह कि मैं इससे ऊपर उठ जाना बेहतर समझती हूँ।

 मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...

कभी-कभी कुछ नहीं कहना सब कुछ बोल देता है।

 मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...

किसी परेशान करने वाली बात पर प्रतिक्रिया देकर आप अपनी भावनाओं पर नियंत्रण की शक्ति किसी दूसरे को दे बैठते हैं।

 मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...

मैं कोई प्रतिक्रिया दे दूँ तो भी कुछ बदलने वाला नहीं है। इससे लोग अचानक मुझे प्यार और सम्मान नहीं देने लगेंगे। यह उनकी सोच में कोई जादुई बदलाव नहीं ला पायेगा।

 मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...

जिंदगी तब बेहतर हो जाती है जब आप इसे अपने आसपास की घटनाओं पर केंद्रित करने के बजाय उसपर केंद्रित कर देते हैं जो आपके अंतर्मन में घटित हो रहा है। 

आप अपने आप पर और अपनी आंतरिक शांति के लिए काम करिए और आपको बोध होगा कि चिंतित करने वाली हर छोटी-छोटी बात पर प्रतिक्रिया 'नहीं' देना एक स्वस्थ और प्रसन्न जीवन का 'प्रथम अवयव' है




सोमवार, 21 अप्रैल 2025

*औरत का दर्द*

 शादी के 40 साल बाद आज उन्होंने बातो बातों में किसी बात से नाराज़ होकर सब के सामने कहा की, " तूने आज तक किया ही क्या है ? सिर्फ घर पे खाना बनाना और बच्चो को संभालना और वैसे भी आज कल बच्चे भी तुम्हारी बात कहा सुनते है ? वो अपने मन की ही तो करते है, इतने सालो में तूने उनको कुछ नहीं सिखाया, तभी इतने बिगड़ गए है दोनों बच्चे।"


          अपने पति की ऐसी बात सुनकर आज पूरी रात सुनीता को नींद नहीं आई, सुनीता सोचती रही, रोती रहीं, की " सच में मेंने आज तक किया ही क्या है ? अगर मेंने आज तक इस घर के लिए सच में कुछ नहीं किया, तो अब मेरा यहाँ रहने का कोई मतलब नहीं। कहाँ जाना है पता नहीं, मगर बस अब और नहीं। " ये सोचते हुए,


सुनीता ने अपने पति विशाल को एक चिठ्ठी लिखी, उसमे उसने लिखा था, की  


       " मेंने आज पूरी रात सोचा की, तुम शायद सही कह रहें थे। आज तक मैंने किया ही क्या है ? कौन हूँ में ? क्या है मेरी पहचान ? चाहती थी में आसमान में उड़ना, मगर उड्ने से पेहले ही मेरे पंख काट दिए गए। सपना देखने से पहले ही सपना तोड़ दिया गया। बाबा ने कहा, "शादी की उम्र बीती जा रही है, मुझसे पूछे बिना ही मेरी शादी करवा दी गई। बाबा का तो मानो, बहोत बड़ा बोझ उतर गया। ससुराल में मेरे लिए हर कोई अजनबी सा था। मगर माँ ने सिखाया था की, अब यही तुम्हारी दुनिया है, यही तेरे अपने। अब से इन सबको ही तुम अपने माँ, बाबा और भाई, बहन समझना। पति तेरे लिए परमेश्वर है, इनकी कही कोई बात को मत टालना । सब को प्यार देके अपना बना लेना। माँ की बात मान के मैंने सबको अपना बनाया। मुझे क्या पसंद था और क्या नापसंद, इसके बारे में कभी सोचा ही नहीं।


       सुबह को आपकी कॉफ़ी और नास्ता, बच्चो का लंच बॉक्स, बाबा की डायबिटीज की अलग से दवाई, नाश्ता, माँ के घुटनो की तेल मालिश, आपका टिफ़िन, मार्केट जाना, शाम की खाने की तैयारी करना, माँ को इलाज के लिए बार बार अस्पताल ले जाना, बच्चो को पढ़ाना, उनकी शैतानी बर्दाश्त करना, आपके दोस्त मेहमान बनकर अचानक से आए तो उनके लिए खाना बनाना। बस इतना ही तो किया मैंने ! और तो क्या किया ? इस लिए अब मुझे कुछ ओर करना है। अब में जा रही हूँ, ये तो नहीं जानती कहा ? मगर मुझे जाना है। पर तुम अपना ख्याल रखना।" 


      फिर सुनीता वो चिठ्ठी टेबल पे रख कर चुपचाप वहांँ से चली गई।


        सुबह होते ही बाबूजी अपनी दवाई, नास्ता और अख़बार के लिए बहू को आवाज़ देने लगे। उसके साथ माँ भी अपने घुटनेा के मालिश के लिए बहू को आवाज़ देने लगी। बच्चे भी माँ हमारा टिफ़िन, हमारा ब्रेकफास्ट कहा है ? आज माँ कहा चली गई ? बहार इतना शोरगुल सुनकर उसके पति की भी ऑंखें खुल गई। क्या हुआ पूछता हुआ वो बहार आया। इतना शोर क्यों मचा रखा है सुबह सुबह। पापा देखो ना, माँ कहीं नहीं दिख रही। हमको कॉलेज जाने में देरी हो रही है। अभी तक ब्रेकफास्ट भी नहीं किया। लगता है आज भूखा ही जाना पड़ेगा, दूसूरे ने कहा मेरी किताबे भी नहीं मिल रही, माँ तुम कहा हो ? बाबूजी ने आवाज़ लगाई, बहू ज़रा देखो तो, मेरा चश्मा किधर है ? माँ ने आवाज़ लगाई, बहू मेरे मालिश की बोतल और दवाइयाँ कहाँ है ? सारा घर जैसे बिख़रा था। उसका पति ज़ोर से चिल्लाया। सब चुप हो जाओ, में देखता हूँ वो कहा है, यही कही होगी, कहाँ जाएगी ? वो उसे फ़ोन करने लगा मगर उसका फ़ोन तो कमरें में टेबल पे ही था। उसने देखा फ़ोन के पास एक चिठ्ठी भी थी। उसे बड़ी अचरज हुई, उसने वो चिठ्ठी खोल के पढ़ी। चिठ्ठी पढ़कर ही, उसे याद आया की उसने कल शाम अपनी बीवी का कैसे अपमान किया था, वो भी सब के सामने। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वो उस से माफ़ी मांँगना चाहता था, मगर कैसे ? उसका कोई अतापता नहीं था। उसने उसके मायके और उसकी सहेलियाँ सबको फ़ोन करके पूछा, मगर किसी को नहीं पता वो कहा है ? किस हाल में है ? 

        मगर सुनीता अपने मायके में ही थी, जानबूझकर उन लोगो ने विशाल से झूठ बोला की वो घर पे नहीं है ताकि उसे अपनी गलती का एहसास हो। 

फ़िर ५ दिन बाद विशाल सुनीता के मायके गया, तो वहाँ सुनीता को देख कर वो खुश हो गया, और सब से पहले विशाल ने सब के सामने सुनीता से अपनी गलती की माफ़ी माँगी, और वापिस घर चलने को कहाँ। औरत का दिल तो वैसे भी बड़ा होता है, इसलिए वो अपने परिवार को कैसे अकेला छोड़ देती ? सुनीता ने विशाल को माफ़ कर दिया और वो अपने पति के साथ घर चली गई। घर में सब लोग भी बहोत खुश हो गए, अब सब सुनीता को काम में मदद भी करने लगे थे, अब सारे काम का बोझ सिर्फ सुनीता पर नहीं था, तो उसे भी थोड़ा आराम मिल रहा था, बच्चे भी अपनी माँ को काम में मदद करने लगे थे और अपनी माँ का सम्मान भी करने लगे।



मंगलवार, 15 अप्रैल 2025

*खूबसूरत*

 एक बहुत ही सुंदर कविता

जो कह दिया वह *शब्द* थे ;

जो नहीं कह सके

वो *अनुभूति* थी ।।

और,

जो कहना है मगर ;

कह नहीं सकते,

वो *मर्यादा* है ।।


*जिंदगी* का क्या है ?

आ कर *नहाया*,

और,

*नहाकर* चल दिए ।।


*बात पर गौर करना*- ----


*पत्तों* सी होती है

कई *रिश्तों की उम्र*,

आज *हरे*-------!

कल *सूखे* -------!


क्यों न हम,

*जड़ों* से;

रिश्ते निभाना सीखें ।।


रिश्तों को निभाने के लिए,

कभी *अंधा*,

कभी *गूँगा*,

और कभी *बहरा* ;

होना ही पड़ता है ।।


*बरसात* गिरी

और *कानों* में इतना कह गई कि---------!

 *गर्मी* हमेशा किसी की भी नहीं रहती।। 


*नसीहत*,

*नर्म लहजे* में ही

अच्छी लगती है ।

क्योंकि,


*दस्तक का मकसद*,

*दरवाजा* खुलवाना होता है;

तोड़ना नहीं ।।


*घमंड*-----------!

किसी का भी नहीं रहा,

*टूटने से पहले* ,

*गुल्लक* को भी लगता है कि ;

*सारे पैसे उसी के हैं* ।


जिस बात पर ,

कोई *मुस्कुरा* दे;

बात --------!

बस वही *खूबसूरत* है ।।


थमती नहीं,

*जिंदगी* कभी,

किसी के बिना ।।

मगर,

यह *गुजरती* भी नहीं,

अपनों के बिना ।।

🌷🙏🌷🙏🌷

बुधवार, 9 अप्रैल 2025

स्त्री मन

 अब मैं वो नहीं रही जो पहले हुआ करती थी।

मैंने बहुत कुछ सीखा है, बढी हूं, और समय और अनुभव के द्वारा जिन बदलाओं का मैं हिस्सा बनी हूं, वही मेरी पहचान बन गए हैं।

अब मुझे खुद को किसी के सामने समझाने की जरूरत नहीं महसूस होती। अगर कोई मेरे बारे में राय रखता है—चाहे वह अच्छी हो या बुरी—तो उसे रखे। मैं अपनी ऊर्जा उन लोगों को साबित करने में बर्बाद नहीं करूंगी जिन्होंने पहले ही अपना फैसला कर लिया है।

मैंने उन लोगों से बहस करना छोड़ दिया है जो मेरी ऊर्जा के लायक नहीं हैं। उन्हें बात करने दो। उन्हें अनुमान लगाने दो। मुझे कुछ साबित नहीं करना है।

मैं अभी भी उन लोगों की मौजूदगी की कद्र करती हूं जो मेरी जिंदगी में मायने रखते हैं, लेकिन अब मैं किसी से यह नहीं कहती कि रुक जाए। अगर कोई जाने का निर्णय लेता है, तो मैं दरवाजा खुला छोड़ देती हूं।

मैं जीवन से जो मिला है, उसकी सराहना करती हूं, और अब मैं उससे अधिक नहीं मांगती जो मेरे लिए लिखा गया है। मैं उन लोगों के लिए हूं जिन्हें मेरी जरूरत है, लेकिन मैं अपनी मौजूदगी को उन जगहों पर नहीं थोपती जहां मुझे नहीं चाहिए।

मैं दयालु हूं, लेकिन अब मैं भोली नहीं हूं। मैं अपना विश्वास देती हूं, लेकिन अब किसी को इसे गलत इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दूँगी।

मैने अपनी शांति की रक्षा करना सीख लिया है। मैं खुद को किसी पर नहीं थोपती, और मैं अपनी राय को अपने तक ही रखती हूं। कुछ लड़ाइयाँ लड़ने के लायक नहीं होतीं। कुछ लोग पीछा करने के लायक नहीं होते।देखिए, मैंने विकास किया है। मैंने खुद को बदला है। और पहली बार, बहुत समय बाद—यह यात्रा अब मेरे बारे में है।


वो तमाम पल

 कभी फुर्सत में लिखूंगी

वो तमाम खूबसूरत पल…

जो मैंने सोचे ज़रूर थे

मगर उन्हें जी नहीं पाई।


वो खिलखिलाती सुबहें

जो खिड़कियों से झाँकती रहीं

मैंने देखा तो सही

मगर बाहों में भर नहीं पाई।


वो संध्या की धीमी लौ

जो मेरे आँगन में उतर आई थी

मैंने रोशन तो किया

मगर उसमें खो नहीं पाई।


वो बारिश की बूँदें

जो हथेलियों में थमी थीं

मैंने महसूस तो किया

मगर भीग नहीं पाई।


वो गीत जो होठों तक आए

मगर धड़कनों में बसे नहीं

वो ख़्वाब जो आँखों में जले

मगर रोशनी बन सके नहीं।


एक दिन जब दुनिया से परे

खुद से रूबरू हो जाऊंगी

तब हर अधूरी ख्वाहिश का

इक मुकम्मल गीत गाऊंगी।


कभी फुर्सत में लिखूंगी

वो तमाम खूबसूरत पल…

जो मैंने सोचे ज़रूर थे,

मगर उन्हें जी नहीं पाई।

*मेरे दो अनमोल रतन*

 *मेरे दो अनमोल रतन*


*धीरे धीरे मेरे बेटे मेरी माँ बनते जा रहे हैं*

*अब तक मैंने देखभाल की ,सम्भाला उनको*  

*अब वे बड़े प्यार से मुझे सम्भाल रहे हैं*


*धीरे धीरे मेरे बेटे मेरी माँ बनते जा रहे हैं*

*महसूस करती हूं में भी उनकी भावनाओं को*


*पर बहुत अंतर हो गया है उनके और मेरे तरीक़े और सोच में*


मैं कहती थी *चुप रहो शोर मत करो*,

वो कहते हैं *बातें करो चुप मत रहो*,


मैं कहती थी, *गंदे पाँव ऊपर मत रखो*,

वो कहते हैं *पाव सूज जाएँगे ऊपर ही रखो* 


 मैं कहती थी *उल्टा सीधा मत खाओ पेट ख़राब होगा*

*वजन बढ़ जाएगा* 

वो कहते हैं *जो मन हो वह खा लो मां... जो भी कहोगी ऑनलाइन आ जाएगा* बोलो क्या मंगाना है?


मैं तड़के उठाती थी *पढ़ो व्यायाम करो* 

वो कहते है अब *देर से उठना माँ आराम करो* 


सिखाने के लिहाज़ से मैं कहती थी *थोड़े काम घर के भी किया करो* 

वो कहते हैं *बहुत कर लिया मां,अब आराम भी करो बाइयां किसके लिए लगाई हैं * एक दिन नही होगा तो कौन सा तूफान आ जायेगा


उनकी हर ज़िद पूरी नही करती थी मैं उनके बिगड़ जाने के डर से 

पर बेटे *बिना कहे ही, मेरी हर इच्छा जान जाते हैं , न जाने किधर से* बिना मांगे,सामान घर पर ही आ जाता 


मैं कहती समय पर खेलकूद, समय, पर पढ़ाई,करो अब 

वो कहते के *समय पर खाना सोना समय पर दवाई*.. लो 


 मैं ....रोज दोस्तों के साथ बेमतलब, घूमना, हुड़दंग ना करो,कहती रहती थी और वो

 वो...अब कहते हैं...*माँ सहेलियों से बातें करो , किट्टी करो*..खूब घुमा फिरा करो, वीडियो ,फोटो बनाया करो ,गाने गाया करो,मीडिया में मोजूद आपके सारे शौक का मसाला है,जो मन करे, उसमें देखा करो 


मैं--- कहती के सिनेमा नही जाओ, घर में भी रहा करो ,

वो--कहते हैं कि- * पिक्चरें बहुत अच्छी है मां Netflix पर देखा करो* मेने सब्सक्राइब कर रखा है आराम से खूब देखा करो


उन्हें नित नए फ़ैशन के उटपटांग कपड़े पहनने से रोकती थी , और 

*वो ऑनलाइन फैशन के सारे सामान मंगाते हैं क्रीम, मास्क जुड़े *मेरे चेहरे पे* निखर लाने के लिए बस,

और कहते हैं ….….*chil माँ try तो करो* 😘🤗

अरे कुछ मंगाऊं क्या ये बस आप बोलो, इनके साथ साथ अब कई बाते पोता भी दोहराता रहता है , फिल्टर ऐसे लगाते हैं दादी लगाओ देखो कितने अच्छे होते हैं, नई नई टैक्नोलॉजी बतियाता रहता है, समय के साथ वक्त का परिंदा उड़ता सा लगता है😊😊😊

धन्य है जीवन मेरा अब इस उमर में बस उनका ऐसा साथ अच्छा लगता है, बूढ़े होंगे अपने दुश्मन कहकर, में अब उन अनमोल रत्नों का सारा कहा ,सुन लेती हूं,बहुत अच्छा और गर्व सा महसूस कर लेती हूं 😘💓😘💓

सोमवार, 17 मार्च 2025

*बूढ़े पति-पत्नी *

बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम" शायद यही कहा बड़ी बहू ने। सुनते ही सासू मां ठिठक गई। और पलट कर बोली

" कुछ कहा तुमने बड़ी बहू"

" नहीं नहीं, मैंने तो कुछ भी नहीं कहा मम्मी जी"

" हां हां सच में" छोटी बहू ने झिझकते हुए कहा।

" अच्छा है कि तुमने कुछ नहीं कहा। अगर कहा होता तो शायद जवाब भी मिल जाता"

बड़ी बहू नज़रें नीची कर खड़ी हो गई और सासू मां उसे घूरती हुई वहां से निकल गई। सासू मां के जाते ही बड़ी बहू ने बड़बड़ाना शुरू कर दिया,

" क्या गलत कहती हूं मैं? मुझे तो रोक लेंगी, पर बाहर और भी तो लोग हैं, जो बातें करते हैं। उनका क्या? उनकी जबान पकड़ो तो माने "

" सही कहा भाभी, क्या जरूरत है मम्मी जी को पार्लर जाने की? इस उम्र में यह सब शोभा देता है क्या?"

" अरे बुढ़ापे में सठिया गई है। कौन समझाएं इन्हें? जब कोई बाहर वाला मजाक उड़ाएगा, तब समझ में आएगा। फिर रोती हुई आएगी घर पर"


" हां हमें क्या? इन्हें खुद का मजाक उड़ाने की लगी है तो शौक से उड़ाए। हम तो खुश है अपनी जिंदगी में"

" वैसे भी किसे फर्क पड़ता है? पापा जी तो कुछ कहते नहीं। और इस उमर में कौन सा पापा जी निहार रहे हैं उन्हें, जो इतना सज धज कर तैयार हो रही है"

" यह तो है भाभी। दीया बुझने से पहले फड़फड़ाता है ना, वही हालत इंसान की बुढ़ापे में हो जाती है"

छोटी बहू ने भी बड़ी बहू की हां में हां मिलाई। और दोनों जोर जोर से हंसने लगी।


दरअसल बात यह थी कि मधु जी के पति सोमेश जी का आज सत्तरवाँ जन्मदिन था, जिसे वे धूमधाम से ना मनाकर सिर्फ अपनी पत्नी के साथ मनाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने एक रेस्टोरेंट में टेबल भी बुक कर ली थी। उसके बाद मूवी देखने का प्रोग्राम था।


मतलब यह कह सकते हैं कि आज का पूरा दिन मधु जी और सोमेश जी साथ बिताना चाहते थे। और मधु जी इस दिन को यादगार बनाना चाहती थी इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों ना पार्लर जाकर थोड़ा लाइट मेकअप ही करवा लूँ। सोमेश जी को अच्छा लगेगा।

बस यही सोचकर वे पार्लर निकल गई और यही बात दोनों बहुओं को खटक रही थी कि देखो तो मम्मी जी और पापा जी बुढ़ापे में कैसे-कैसे गुल खिला रहे हैं।


खैर दोपहर के 1:00 बज रहे थे। सोमेश जी अपने कमरे से तैयार होकर बाहर निकले तो एक पल के लिए बेटे बहू पोते पोती उन्हें देखते ही रह गए। हमेशा कुर्ता पजामा पहने रहने वाले पापा जी आज सूट टाई में तैयार होकर जँच रहे थे। पापा जी बार-बार घड़ी की तरफ देख रहे थे फिर उन्होंने अपने बड़े बेटे से पूछा,


"अरे बेटा तुम्हारी मम्मी आ गई क्या?"

" नहीं पापा बस आने में ही होगी "

थोड़ी देर बाद डोर बेल बजी। बड़ी बहू ने जाकर दरवाजा खोला तो मम्मी जी को देखकर एकटक निहारती ही रह गई। हरी बंधेज की साड़ी, उस पर मैचिंग ब्लाउज, साथ ही बालों का सुंदर सा जुड़ा बना रखा था और हल्का सा मेकअप। आज वाकई मम्मी जी कहर ढा रही थी।

सोमेश जी तो मधु जी को निहारते ही रह गए। इतने में दोनों बेटे एक साथ ही बोल पड़े,

" वाह! क्या बात है मम्मी, आज तो बहुत सुंदर लग रही हो"

दोनों बेटों की बात सुनकर मधु जी मुस्कुरा दी। इतने में सोमेश जी बोले,

" तो मधु जी, तैयार है आप साथ चलने के लिए"

" जी जरूर"

कहकर दोनों पति पत्नी वहां से निकल गए। उनके जाते ही दोनों बहुओं ने फिर से बड़बड़ाना शुरू कर दिया,


" यह क्या शोभा देता है मम्मी जी और पापा जी को? इस उमर में एक दूसरे का हाथ पकड़े घूमने जा रहे हैं। और तुम दोनों भाई कुछ कहते भी नहीं"

"और देखा नहीं, कैसे तैयार होकर जा रहे हैं। इनके पोते पोतियो की शादी की उम्र होने को आई और इन्हें देखो, कल को यह सब सिखाएंगे अपनी पोता बहुओं को। कम से कम पूछ तो लेना चाहिए था हमसे"

" क्यों इसमें गलत क्या है? मम्मी और पापा दोनों पति-पत्नी है। एक दूसरे के साथ समय बिताना उनका हक है। इसके लिए भला किसी की इजाजत की क्या जरूरत है"

" और रही बात उम्र की, तो उम्र का क्या है? वह तो सिर्फ एक अंक है। उम्र के साथ क्या भावनाएं बदल जाती है। तुम लोगों के हिसाब से तो कल को हम लोग पति पत्नी ही नहीं रहेंगे। और हमारे बेटे बहू डिसाइड करेंगे कि हमें क्या करना है और क्या नहीं"

दोनों भाईयों ने एक साथ सुर मिलाकर कहा। जब बात खुद पर आई तो दोनों बहूए एक बार सोचने को मजबूर हो गई कि गलत तो कुछ भी नहीं है। आखिर पति पत्नी का रिश्ता तो उम्र के साथ प्रगाढ़ होता है, तो उसे उम्र के बंधन में बांधने की क्या जरूरत है।



शनिवार, 15 मार्च 2025

*बेशकीमती दौलत..*

 अजी सुनते हो.....आज एक बात पूछू आपसे....

एक 80 वर्षीय की बुजुर्ग पत्नी ने अपने 84 वर्षीय

पति से कहा.... 


बुजुर्ग पति छडी का सहारा लिए अपनी बुजुर्ग पत्नी के करीब आए और बोले.... कहो.... 


बुजुर्ग पत्नी भावुक होकर बोली....आपको याद है आपने हमारी शादी से पहले अपनी माताजी को छुपकर एक खत लिखा था जिसमे आपने अपने गुस्से को व्यक्त करते हुए लिखा था की आप मुझसे शादी नहीं करना चाहते

कयोकि आपको मेरा चेहरा पसंद नहीं था..... 


बुजुर्ग पति ने हैरान होकर पूछा ....वो खत....वो तुम्हें कहा मिला..... वो तो बहुत पुरानी बात है.... 


बुजुर्ग पत्नी आँखों में आंसू भरकर बोली.... कल आपके बक्से से मुझे ये पुराना खत मिला...मुझे नहीं पता था की

ये शादी आपकी मर्जी के खिलाफ हुई थी वरना में खुद ही मना कर देती.... 


बुजुर्ग पति ने अपना सर अपनी पत्नी की बांहों में रखा और कहा....अरे पगली .....उस वक्त मैं सिर्फ 12 साल का था और मुझे लगा तू मेरे से शादी करके जब आएगी तो मेरे कमरे में मेरे साथ मेरा बिस्तर और तकिये पे

सोएगी .....मेरे सारे खिलोनो के साथ खेलेगी और मेरी गुल्लक से पैसे चुरा लेगी ..... 


लेकिन उस वक्त मैं ये कहा जानता था की तू मेरी जिन्दगी में आकर मेरी जिन्दगी को एक कमरे से बाहर एक घर तक ले जायेगी.....

ये कहा जानता था की मुझे कपड़ो के बने खिलोनो से

कही ज्यादा खुबसूरत और प्यारे खिलोने ( हमारे बच्चे )

तुम मुझे दोगी ..... 


ये कहा जानता था की मेरी चिल्लर से भरी गुल्लक के

मुकाबले तू मुझे प्यार की बेशकीमती दौलत

देगी.... 


अब बोल और भी कुछ पूछना बाकी है..... 


बुजुर्ग पत्नी ने तसल्ली के साथ कहा....

भगवान् का शुक्र है..... में तो समझ रही थी तुम्हे उस

पड़ोस वाली से प्रेम था.... 


बुजुर्ग पति ने हंसते हुए कहा....अजी रहने दो ....कहा वो... और कहा मेरी ये राजकुमारी...... 


दोनों बुजुर्गों ने भीगी हुई पलकें लिए एकदूसरे को देखा..... और फिर एकदूसरे से लिपट गए....

प्यार के आखिरी सफर की मंजिल अब कुछ ही दूर जो

बची थी .....

दोस्तो ......ये रिश्ता पति पत्नी का यही आखिरी वक्त तक साथ रहता है ये वो रिश्ता है जो हमारे जन्म से नहीं जुडता मगर बन जाता है जन्म जन्मांतर का .....

आप सभी पति पत्नियों का ये खूबसूरत नौकझौक एक महत्वपूर्ण संदेश देती है एकदूसरे का ख्याल रखिए सम्मान कीजिए और सदैव साथ रहिए .....

"उम्र भर का पसीना उसकी गोद मे सुख जायेगा, "हमसफर" क्या चीज है ये बुढ़ापे मे समझ आयेगा


 

*दर्द*

 हाउस वाइफ का दुःख


हाउस वाइफ ही जाने


आज ससुर तो कल


सास बीमार


ससुर को डाक्टर के


पास ले जाना है


सास को बैद जी को


दिखाना है


मंदिर से लेकर


अस्पताल तक साथ


निभाना है


पति का सिर दुःख रहा


सिर पर बाम लगाना है


बेटा खांस रहा है


शरीर गर्म हो रहा है


उसे हल्दी मिला दूध


पिलाना है


चिडचिडा हो रहा है


इसलिए पास भी


बैठना है


स्कूल जाकर छुट्टी के लिए


कहना है


गैस ख़त्म हो गयी


कब आयेगी पता नहीं


तब तक पड़ोसी से


मांग कर काम चलाना है


काम वाली बाई आज


आयी नहीं


पर खाना तो बनाना है


बर्तनों को साफ़ करना है


मुंबई से नंदोई आये हैं


दो चार दिन उनका


सत्कार करना है


साथ में शहर दर्शन भी


कराना है


कमी रह जायेगी तो


महीनों सुनना पडेगा


छोटी बहन का फ़ोन आया


ससुराल में विवाह है


शौपिंग के लिए


बाज़ार साथ जाना है


दफ्तर से पती का फ़ोन

आया है


रात को अफसर का खाना है


बढ़िया से बढ़िया


इंतजाम करना है


इज्ज़त का झंडा ऊंचा

रखना है


जेठ जी का फ़ोन आया


कल सवेरे की गाडी से आयेंगे


पतिदेव तो दफ्तर जायेंगे


इसलिए स्टेशन से लाना है


आज करवा चौथ का व्रत है


भूखे पेट भजन नहीं होता


हाउस वाइफ को घर तो

चलाना है


खुद का बदन दुखे या पेट


खाना तो बनाना है


छोटी छोटी बात का भी

ख्याल रखना है


माँ,बहु,भाभी,पत्नी का

धर्म भी निभाना है

सब को खुश जो रखना है


मन करता थोड़ा अपने

मन का कर ले


इतने में कोई घंटी बजाता है


दरवाज़ा खोला तो सामने

पड़ोसी खडा है


पत्नी की तबियत ठीक नहीं

अस्पताल साथ जाना है


इतना कुछ करती है


फिर भी


ज़िंदगी भर सुनना

पड़ता है


दिन भर करती

क्या हो


तुम्हें कितना आराम है


काम के लिए तुम्हें


दफ्तर नहीं जाना पड़ता


कैसे समझाए किसी को?


निरंतर खटते खटते उम्र

गुजर जाती है


हर दिन दूसरों के लिए

जीती है


फिर भी ज़िन्दगी भर


केवल हाउस वाइफ 

कहलाती है..


सोमवार, 10 मार्च 2025

*बढ़ती उम्र*

 खुद को बढ़ती उम्र के साथ स्वीकारना एक तनावमुक्त जीवन देता है।

हर उम्र एक अलग तरह की खूबसूरती लेकर आती है उसका आनंद लीजिये

बाल रंगने हैं तो रंगिये, 

वज़न कम रखना है तो रखिये, 

मनचाहे कपड़े पहनने हैं तो पहनिए,

बच्चों की तरह खिलखिलाइये, 

अच्छा सोचिये, 

अच्छा माहौल रखिये, 

शीशे में दिखते हुए अपने अस्तित्व को स्वीकारिये। 


कोई भी क्रीम आपको गोरा नही बनाती, 

कोई शैम्पू बाल झड़ने नही रोकता,

कोई तेल बाल नही उगाता, 

कोई साबुन आपको बच्चों जैसी स्किन नही देता। 

चाहे वो PNG हो या पतंजलि.....सब सामान बेचने के लिए झूठ बोलते हैं। 


ये सब कुदरती होता है। 

उम्र बढ़ने पर त्वचा से लेकर बॉलों तक मे बदलाव आता है। 

पुरानी मशीन को Maintain करके बढ़िया चला तो सकते हैं, पर उसे नई नही कर सकते।


ना किसी टूथपेस्ट में नमक होता है ना किसी मे नीम। 

किसी क्रीम में केसर नही होती, क्योंकि 2 ग्राम केसर भी 500 रुपए से कम की नही होती ! 


कोई बात नही अगर आपकी नाक मोटी है तो,

कोई बात नही आपकी आंखें छोटी हैं तो,

कोई बात नही अगर आप गोरे नही हैं 

या आपके होंठों की shape perfect नही हैं, 


फिर भी हम सुंदर हैं, 

अपनी सुंदरता को पहचानिए।


दूसरों से कमेंट या वाह वाही लूटने के लिए सुंदर दिखने से ज्यादा ज़रूरी है, अपनी सुंदरता को महसूस करना।


हर बच्चा सुंदर इसलिये दिखता है कि वो छल कपट से परे मासूम होता है और बडे होने पर जब हम छल व कपट से जीवन जीने लगते हैं तो वो मासूमियत खो देते हैं 

और उस सुंदरता को पैसे खर्च करके खरीदने का प्रयास करते हैं।


मन की खूबसूरती पर ध्यान दो।


पेट निकल गया तो कोई बात नही उसके लिए शर्माना ज़रूरी नही।

आपका शरीर आपकी उम्र के साथ बदलता है तो वज़न भी उसी हिसाब से घटता बढ़ता है उसे समझिये।


सारा इंटरनेट और सोशल मीडिया तरह तरह के उपदेशों से भरा रहता है,

यह खाओ, वो मत खाओ 

ठंडा खाओ, गर्म पीओ, 

कपाल भाती करो,  

सवेरे नीम्बू पीओ,

रात को दूध पीओ

ज़ोर से सांस लो,लंबी सांस लो 

दाहिने से सोइये ,

बाहिने से उठिए,

हरी सब्जी खाओ, 

दाल में प्रोटीन है,

दाल से क्रिएटिनिन बढ़ जायेगा।


अगर पूरे एक दिन सारे उपदेशों को पढ़ने लगें तो पता चलेगा 

ये ज़िन्दगी बेकार है ना कुछ खाने को बचेगा ना कुछ जीने को !!

आप डिप्रेस्ड हो जायेंगे।


ये सारा ऑर्गेनिक, एलोवेरा, करेला, मेथी, पतंजलि में फंसकर दिमाग का दही हो जाता है। 

स्वस्थ होना तो दूर स्ट्रेस हो जाता है।


अरे! अपन मरने के लिये जन्म लेते हैं,

कभी ना कभी तो मरना है अभी तक बाज़ार में अमृत बिकना शुरू नही हुआ।


हर चीज़ सही मात्रा में खाइये, 

हर वो चीज़ थोड़ी थोड़ी जो आपको अच्छी लगती है। 


भोजन का संबंध मन से होता है

और मन अच्छे भोजन से ही खुश रहता है..

मन को मारकर खुश नही रहा जा सकता।

थोड़ा बहुत शारीरिक कार्य करते रहिए,

टहलने जाइये, 

लाइट कसरत करिये,

व्यस्त रहिये,  

खुश रहिये,

शरीर से ज्यादा मन को सुंदर रखिये.. 💞



शनिवार, 8 मार्च 2025

*हर पल खुशी का पल*😍

 भले ही पार कर गयी 66 को मैं

चेहरे पर नूर है 

हल्का सा गुरुर है

नही करती अब परवाह मैं

किसी के भी तानों की, उल्हानो की

वो दिन अब लद गये

जब आँखों के कोने पानी था

छुप कर् के मैं रोती थी

होठों पर ले नकली मुस्कान

अब रहती हूँ मस्त अपने में

निहारती हूँ खुद को ,

 सँवारती हूँ खुद को  आईने में , 

भजन भी मैं गाती हूँ, तो गजल भी मै गाती हूँ, 

गाने हमेशा गाना पसंद करती हूं

नाच नही आता पर कोशिश करती हूं

जरूरत नही मुझे रिझाने की अब,

 सजना को भी नजर  आता है मेरा ये बदला रुप, 

उनकी आँखों में  अपना अक्स, 

मेरे बिन कहे पढ़ लेते वो मेरी जुबाँ

काम वो करती हूँ मैं ,जो मुझे भाता है, 

कलम भी चलाती हूँ ,तो कड़छी भी चलाती हूँ, 

पार्लर भी जाती हूँ तो मंदिर भी जाती हूँ, 

बगियाँ मे देख तितली बच्चो सी मचल जाती हूँ

मोबाइल पर नया देखा  तो तुरंत सीखना चाहती हूँ, 

बाहर के सारे नज़ारों को समेट कर रख लेती हूं

सब कुछ होते भी कमी महसूस करती हूँ

अपने दिल के टुकड़ों को, बच्चों को, पर

बात उनसे करके कुछ पल , हो लेती हूँ खुश मैं

देख कर खुश उनको भूल जाती हूँ अपने गम, 

66 के पार करके मैं जीवन की नयी पारी खेल रही हूँ

जीवन के एक एक पल को  में जी रही हूँ

जो नही कर पायी अभी तक

वो सब  ,अब ,करने की कोशिश भी कर रही हूँ

*66 को पार करने का गम नही कर रही मैं 

नये अध्याय को ,स्वीकारना ,

अब आदत बना रही हूं में

जानती हूँ जनम मरण परण अपने हाथों मे नही है

इसलिए हर पल को खुशी से बिताना चाह रही हूँ




गुरुवार, 6 मार्च 2025

* बाद में *

 टहनियों पर लगे पीले पत्ते मत तोड़ो तुम 

चन्द रोज़ में खुद बा खुद झड़ जाएंगे,,

बैठा करो कुछ देर तो घर के बुजुर्गों के पास, 

एक दिन खुद ही ये आपके पास से चले जाएंगे,,

खर्चनें दो उन्हें बेहिसाब हर चीज़ तुम यारों, 

एक दिन सबकुछ तुम्हारे लिए छोड़ जाएंगे, 

मत टोको उनको बार-बार उन्हें बात दोहराने पर, 

एकदिन खुद हमेशा के लिए ख़ामोश हो जाएंगे,,

इनका आशीर्वाद ले लिया करो सर पर हाथ रखकर, 

वर्ना फिर ये तस्वीरों मे ही नज़र आएंगे, 

दो वक्त की रोटी तो समय पर दे दिया करो, 

इज्ज़त और प्यार मोहब्बत के साथ,,

वर्ना फिर श्राद्ध मे भी देखना खाने नही आएंगे,,

आँखे इन्तज़ार करेंगी इन बूढ़ी आत्माओं का 

पर ये कहीं नज़र नहीं आएंगे,,

एक दिन कीमत खुद जान जाओगे उनकी 

 जब उनकी उम्र पर तुम आओगे ,,, 🙏🌺🙏

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025

*महिलाओं को समर्पित*

🥰तुम!!! खुद को कम मत आँको,

खुद पर गर्व करो।

🥰क्योंकि तुम हो तो

थाली में गर्म रोटी है। 

🥰ममता की ठंडक है,

प्यार की ऊष्मा है। 

🥰तुमसे, घर में संझा बाती है

घर घर है। 

🥰घर लौटने की इच्छा है... 

🥰क्या बना है रसोई में

आज झांककर देखने की चाहत है। 

🥰तुमसे, पूजा की थाली है,

रिश्तों के अनुबंध हैं

पड़ोसी से संबंध हैं।

🥰घर की घड़ी तुम हो,

सोना जागना खाना सब तुमसे है।

🥰त्योहार होंगे तुम बिन?? 

तुम्हीं हो दीवाली का दीपक,

होली के सारे रंग,

विजय की लक्ष्मी,

रक्षा का सूत्र! हो तुम।

🥰इंतजार में घर का खुला दरवाजा हो,

रोशनी की खिडक़ी हो

ममता का आकाश तुम ही हो। 

 🥰समंदर हो तुम प्यार का,

तुम क्या हो... 

खुद को जानो!

🥰उन्हें बताओ जो तुम्हें जानते नहीं, 

कहते हैं.. 

तुम करती क्या हो??!!!

🌸☘🍃🍀🍃☘🌸 



मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

*गृहिणी*

 *सभी महिलाओं को समर्पित*

रसायनशास्त्र से शायद ना पड़ा हो पाला

पर सारा रसोईघर प्रयोगशाला

दूध में साइटरीक एसिड डालकर पनीर बनाना या 

सोडियम बाई कार्बोनेट से केक फूलाना

चम्मच से सोडियम क्लोराइड का सही अनुपात तोलती 

रोज कितने ही प्रयोग कर डालती हैं

पर खुद को कोई  वैज्ञानिक नही 

बस गृहिणी ही मानती हैं

रसोई गैस की बढ़े कीमते या सब्जी के बढ़े भाव

पैट्रोल डीजल महँगा हो या तेल मे आए उछाल

घर के बिगड़े हुए बजट को झट से सम्हालती है

अर्थशास्त्री होकर भी

खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं

मसालों के नाम पर भर रखा

आयूर्वेद का खजाना

गमलो मे उगा रखे हैं

तुलसी गिलोय करीपत्ता

छोटी मोटी बीमारियों को

काढ़े से भगाना जानती है

पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।

सुंदर रंगोली और मेहँदी में 

नजर आती इनकी चित्रकारी

सुव्यवस्थित घर में झलकती है

इनकी कलाकारी

ढोलक की थाप पर गीत गाती नाचती है

कितनी ही कलाए जानती है पर 

खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं

समाजशास्त्र ना पढ़ा हो शायद

पर इतना पता है कि

परिवार समाज की इकाई है

परिवार को उन्नत कर

समाज की उन्नति में

पूरा योगदान डालती है

पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।

मनो वैज्ञानिक भले ही ना हो

पर घर में सबका मन पढ लेती है

रिश्तों के उलझे धागों को

सुलझाना खूब जानती है

पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।

 योग ध्यान के लिए समय नहीं है

 ऐसा अक्सर कहती हैं

और प्रार्थना मे ध्यान लगाकर

 घर की कुशलता मांगती है

 खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।

ये गृहणियां सच में महान है

कितने गुणों की खान है

सर्वगुण सम्पन्न हो कर भी

अहंकार नहीं पालती है

खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।




रविवार, 12 जनवरी 2025

*हकीकत*

 एक कमरा था

जिसमें मैं रहता था

माँ-बाप के संग


घर बड़ा था

इसलिए इस कमी को

पूरा करने के लिए

मेहमान बुला लेते थे हम.


फिर समृद्धि का फैलाव आया 

समृद्धि उस कमरे में नहीं समा पाई


जो चादर पूरे परिवार के लिए बड़ी पड़ती थी

उस चादर से बड़े हो गए हमारे हर एक के पाँव


लोग झूठ कहते हैं कि दीवारों में दरारें पड़ती हैं

हक़ीक़त यही कि जब दरारें पड़ती हैं

तब दीवारें बनती हैं .


पहले हम सब लोग दीवारों के बीच में रहते थे

अब हमारे बीच में दीवारें आ गईं

यह समृध्दि मुझे पता नहीं कहाँ पहुँचा गई


पहले मैं माँ-बाप के साथ रहता था

अब माँ-बाप मेरे साथ रहते हैं


फिर हमने बना लिया एक मकान

एक कमरा अपने लिए

एक-एक कमरा बच्चों के लिए


एक वो छोटा-सा ड्राइंगरूम

उन लोगों के लिए

जो मेरे आगे हाथ जोड़ते थे


एक वो अन्दर बड़ा-सा ड्राइंगरूम

उन लोगों के लिए

जिनके आगे मैं हाथ जोड़ता हूँ


पहले मैं फुसफुसाता था तो

घर के लोग जाग जाते थे

मैं करवट भी बदलता था तो

घर के लोग सो नहीं पाते थे


और अब,

जिन दरारों की वहज से दीवारें बनी थीं

उन दीवारों में भी दरारें पड़ गई हैं।


अब मैं चीख़ता हूँ तो

साथ वाले कमरे से

ठहाके की आवाज़ सुनाई देती है


और मैं सोच नहीं पाता हूँ कि

मेरी चीख़ की वजह से वहाँ ठहाके लग रहे हैं

या उन ठहाकों की वजह से मैं चीख रहा हूँ !


आदमी पहुँच गया है चांद तक

पहुँचना चाहता है मंगल तक

पर नहीं पहुँच पाता सगे भाई के दरवाज़े तक


अब हमारा पता तो एक रहता है

पर हमें एक-दूसरे का पता नहीं रहता


और आज मैं सोचता हूँ

जिस समृध्दि की ऊँचाई पर मैं बैठा हूँ

उसके लिए मैंने कितनी बड़ी खोदी हैं खाइयाँ


अब मुझे अपने बाप की बेटी से

अपनी बेटी अच्छी लगती है

अब मुझे अपने बाप के बेटे से

अपना बेटा अच्छा लगता है


पहले मैं माँ-बाप के साथ रहता था

अब माँ-बाप मेरे साथ रहते हैं

अब मेरा बेटा भी कमा रहा है

कल मुझे उसके साथ रहना पड़ेगा


और हक़ीक़त यही है की

तमाचा मैंने मारा है

तमाचा मुझे खाना भी पड़ेगा..