बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

*अद्वितीय*अद्भुत बुज़ुर्ग का जीवन जीवन

 वे हमें*बुज़ुर्ग* कहते हैं, क्योंकि 

हमारा जन्म40, 50, 60 के दशक में हुआ था...हम50, 60, 70 के दशक में पले-बढ़े...हमने60, 70, 80 के दशक में पढ़ाई की...हम70, 80, 90 के दशक में डेटिंग कर रहे थे...हमने70, 80, 90 के दशक में शादी कीऔर दुनिया की खोज की...हम80, 90 के दशक में कदम रखते हैं।करीबन  2000 के दशक में हम स्थिर हुए...2010 के दशक में हम समझदार हुए...और हम 2020 में और उससे भी आगे मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं...पता चला कि हम आठ अलग-अलग दशकों से गुज़रे हैं...दो अलग-अलग सदियों से...दो अलग-अलग सहस्राब्दियों से...हम लंबी दूरी की कॉल के लिए ऑपरेटर वाले टेलीफोन से दुनिया में कहीं भी वीडियो कॉल तक पहुँच गए हैं...हम स्लाइड्स से यूट्यूब तक,विनाइल रिकॉर्ड से ऑनलाइन संगीत तक, हस्तलिखित पत्र से ईमेल और व्हाट्सएप  telegram ,तक पहुँच गए हैं...रेडियो पर लाइव मैचों सेब्लैक एंड व्हाइट टीवी, रंगीन टीवी तक और फिर 3D HDTV तक...हम वीडियो स्टोर गए और अब हम    टनेफ्लिक्स देखते हैं...हमेंपहले कंप्यूटर,पंच कार्ड, फ्लॉपी डिस्क के बारे में पता चला, और अब हमारे पास गीगाबाइट हैं और हमारे स्मार्टफ़ोन पर मेगाबाइट...हमने बचपन में शॉर्ट्स पहने और फिर लंबी पतलून,और ऑक्सफ़ोर्ड, फ़्लेयर,शेल सूट और नीली जींस....हमने शिशु पक्षाघात, मेनिन्जाइटिस, पोलियो, तपेदिक, स्वाइन फ्लू और अब कोविड_90...हमने स्केट्स, ट्राइसाइकिल, साइकिल, मोपेड, पेट्रोल या डीज़ल कारें चलाईं और अब हाइब्रिड या इलेक्ट्रिक चला रहे हैं...हाँ, हमनेबहुत कुछ देखा हैलेकिन हमारा जीवन कितना शानदार रहा है!वे हमें "एक्सेनियल्स" कह सकते हैं,वे लोग जोपचास के दशक की दुनिया में पैदा हुए थे, जिनकाएक एनालॉग बचपनऔर

डिजिटल वयस्कता....हमने सब कुछ देखा है*!हमारी पीढ़ी ने सचमुच जीवन के हर आयाम में किसी भी अन्य पीढ़ी की तुलना में अधिक अनुभव और अनुभव किया है।यह हमारी पीढ़ी है जिसने सचमुच "बदलावों" को अपना लिया है।इस बेहद खास पीढ़ी के सभी सदस्यों को बहुत-बहुत बधाई,जो कि*अद्वितीय* होगी! ईश्वर हमें इस अद्भुत जीवन के लिए आशीर्वाद दे



मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

*वक्त के पन्ने*

घर में कई जन हैं
सब सोफे पर बैठते
और कवर हैं कि बार-बार अकड़ में आ 
टेढ़े हुए जाते हैं
गृहिणी अकेली
और सबको घर साफ़ पसंद
फिर कवर ठीक करना, 
फिर संभालना, फिर जचाना....
धत्! यह भी कोई काम है।

बर्तन कोई नहीं उठाता
कोई जूते व्यवस्थित नहीं रखता
कपड़े पहन कर निकाल फेंक दिए जाते हैं
मैले कपड़ों के भी ठिकाने होते हैं
जानते सब हैं पर रखता कौन है
गृहिणी उठाएंगी, धोएँगी, सुखाएंगी,समेटेंगी 
सब ठिकाने मिलेगा 
यही रोज के क्रम हैं।

सुबह के नाश्ते के बाद फिर रोटी
फिर बर्तन, 
जन एक-एक कर आएँगे जीमने
फिर रोटी, फिर थाली, फिर चक्करी
गृहणियाँ बस घूमती हैं घर भीतर।

उन्हें काम के रोने नहीं हैं
दुःख है अपनी ढलती काया का।

वे भी थकने लगती हैं
रोज के वही गीले तौलिए सुखाती हुई
वही तीन वक्त का खाना
और उस बीच बच्चों का कहना
क्या मम्मी! कभी कुछ ढंग का भी बना दिया करो।

बच्चे तेज रफ्तार में होते हैं
माँ धीमी
घर के बुजुर्ग अलग ठहराव में
उन्हें एक आवाज में हाजिर चाहिए सब।

एक दिन होने लगती है हर काम से उकताहट
झुंझलाहट घर में पसरती है
पर कोई नहीं समझता यह बात
गृहिणियां काम से नहीं अपनी उम्र और शरीर से भी झल्लाती हैं

"वक्त के पन्ने पलटकर देखती है तो, 
फ़िर वो हसीं लम्हे जीने को दिल चाहता है, 
कभी मुस्कराते थे सभी के साथ मिलकर हमारे साथ सभी
, 'अब उन्हें लम्हे, देखने को दिल तरस जाता है.

शनिवार, 11 अक्टूबर 2025

*क्या किया है*

शादी के तीस साल बाद आज उन्होंने बातों ही बातों में किसी बात से नाराज़ होकर सब के सामने कहा, "तूने आज तक किया ही क्या है ? सिर्फ घर पे खाना बनाना और बच्चों को संभालना और वह भी ठीक से नहीं कर सकी। बच्चे भी तुम्हारी सुनते कब हैं ? वो अपने मन की ही तो करते हैं। इतने सालो में तूने उनको कुछ नहीं सिखाया, तभी इतने बिगड़ गए है दोनों बच्चे।"

अपने पति की ऐसी बात सुनकर आज पूरी रात सुनीता को नींद नहीं आई, सुनीता सोचती रही, रोती रहीं, और बुदबुदाने लगीं - "सच में मेंने आज तक किया ही क्या है ? अगर मेंने आज तक इस घर के लिए सच में कुछ नहीं किया, तो अब मेरा यहाँ रहने का कोई मतलब नहीं। कहाँ जाना है पता नहीं, मगर बस अब और नहीं। " ये सोचते हुए सुनीता अपने पति विशाल को एक चिठ्ठी लिखने लगीं।  

"मैंने आज पूरी रात सोचा कि तुम शायद सही कह रहें थे। आज तक मैंने किया ही क्या है ? कौन हूँ मैं? क्या है मेरी पहचान ? चाहती तो थी मैं भी आसमान में उड़ना, मगर उडने से पहले ही मेरे पंख काट दिए गए। सपना देखने से पहले ही सपना तोड़ दिया गया। बाबा ने कहा, "शादी की उम्र बीती जा रही है, मुझसे पूछे बिना ही मेरी शादी करवा दी गई। बाबा का तो मानो, बहुत बड़ा बोझ उतर गया। ससुराल में मेरे लिए हर कोई अजनबी सा था। मगर माँ ने सिखाया था कि अब यही तुम्हारी दुनिया है, यही तेरे अपने। अब से इन सबको ही तुम अपने माँ, बाबा और भाई, बहन समझना। पति तेरे लिए परमेश्वर है, इनकी कही कोई बात मत टालना । सब को प्यार देके अपना बना लेना। माँ की बात मान के मैंने सबको अपना बनाया। मुझे क्या पसंद था और क्या नापसंद, इसके बारे में कभी सोचा ही नहीं।"

इतना लिखते लिखते उनकी आंख डबडबा उठी, अक्षर झिलमिलाने लगे। चश्मा उतारकर आंखें पोंछी, फिर लिखना शुरु किया।

"सुबह को आपकी कॉफ़ी और नाश्ता, बच्चो का लंच बॉक्स, बाबा की डायबिटीज की अलग से दवाई, नाश्ता, माँ के घुटनो की तेल मालिश, आपका टिफ़िन, मार्केट जाना, शाम की खाने की तैयारी करना, माँ को इलाज के लिए बार बार अस्पताल ले जाना, बच्चो को पढ़ाना, उनकी शैतानी बर्दाश्त करना, आपके दोस्त मेहमान बनकर अचानक से आए तो उनके लिए खाना बनाना। बस इतना ही तो किया मैंने ! और क्या किया ? इस लिए अब मुझे कुछ और करना है। अब मैं जा रही हूँ, ये तो नहीं जानती कि कहां जाऊंगी, मगर मुझे जाना है। पर तुम अपना ख्याल रखना।"

          फिर सुनीता चिठ्ठी टेबल पर रख कर चुपचाप घर से बाहर निकल पड़ीं।

          सुबह होते ही बाबूजी अपनी दवाई, नाश्ता और अख़बार के लिए बहू को आवाज़ देने लगे। उसके साथ ही माँ भी अपने घुटनो के मालिश के लिए बहू को आवाज़ देने लगी। बच्चे भी 'माँ ! हमारा ब्रेकफास्ट कहां है ? कोई जवाब न पाकर चिंतित हो उठे कि आज माँ कहा चली गई ?' 

           इतना शोरगुल सुनकर सुनीता के पति की भी ऑंखें खुल गई। 'क्या हो गया' यह सोचते हुए वो बाहर आया। "इतना शोर क्यों मचा रखा है सुबह सुबह?" 
 "पापा ! देखो ना, माँ कहीं नहीं दिख रही। हमको कॉलेज जाने में देरी हो रही है। अभी तक ब्रेकफास्ट भी नहीं किया। लगता है आज भूखा ही जाना पड़ेगा।" दूसरे ने कहा- "मेरी किताबे भी नहीं मिल रही, माँ तुम कहां हो ?" बाबूजी ने आवाज़ लगाई, "बहू ज़रा देखो तो, मेरा चश्मा किधर है ?" माँ ने आवाज़ लगा रही थी -"बहू ! मेरे मालिश की बोतल और दवाइयाँ कहाँ है ?"

           सारा घर जैसे बिख़रा हुआ था। सुनीता का पति ज़ोर से चिल्लाया। "सब लोग चुप हो जाओ। में देखता हूँ वो कहां है, यही कहीं होगी, कहाँ जाएगी ?" वो सुनीता को फ़ोन करने लगा, मगर उसका फ़ोन तो कमरें में टेबल पर ही पड़ा हुआ था। उसने देखा फ़ोन के पास एक चिठ्ठी भी थी। उसे आश्चर्य के साथ बेचैनी भी होने लगी, उसने जल्दी से चिठ्ठी खोल के पढ़ी। चिठ्ठी पढ़कर ही उसे याद आया कि उसने कल शाम अपनी पत्नी का कैसे अपमान किया था, वो भी सब के सामने। ओह!! उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। वो उस से माफ़ी मांँगना चाहता था, मगर कैसे ? उसका कोई अता पता नहीं था। उसने उसके मायके और उसकी सहेलियाँ, सबको फ़ोन करके पूछा, मगर किसी को नहीं पता था कि वो कहां है ? किस हाल में है ?
 
           घर में कोहराम सा मच गया था। बाबू जी और मां तो जैसे अचानक ही और बूढ़े हो गए थे। उनकी दवाएं, उनका तेल, उनका चश्मा सब कुछ जैसे भूल गया था। उनकी भूख प्यास भी बंद सी हो रही थीं। बच्चे घर से बाहर ही नहीं निकल रहे थे। बच्चे अचानक जैसे बड़े हो गए थे। मजबूरी में वे घर का काम संभालने में लगे थे, मगर बहुत सारी चीज़ें उनको मिल ही नहीं रही थीं। सुनीता के पति का दिमाग ही काम नहीं कर रहा था। वह करे तो क्या करे और जाए तो कहां जाए। पुलिस में रिपोर्ट करने में भी बात फैलने से बदनामी का डर था। मगर रिपोर्ट तो करना ही होगा। उसने सोचा कि एक बार ससुराल वालों से बात करने के बाद ही पुलिस में सुनीता के गायब होने की रिपोर्ट देगा।
           बिना नहाए धोए, बिना सेव किए, भूखा प्यासा वह बदहवाश सा अपनी ससुराल जा पहुंचा। ससुराल वालों ने उसकी हालत देखकर उसकी बात को गंभीरता से सुना। उसे बात करते करते आंखों से आंसू बहते देख सुनीता से नहीं रहा गया और वह सामने आकर खड़ी हो गई। सुनीता का पति जैसे नई जिंदगी पा गया हो और उठकर उसका हाथ पकड़ कर उसे भरी आंखों से देखने लगा। ससुराल के लोग हंसने लगे। 

विशाल ने सब के सामने सुनीता से अपनी गलती की माफ़ी माँगी और वापिस घर चलने को कहा। औरत का दिल तो वैसे भी बड़ा होता है, इसलिए वह अपने परिवार को कैसे अकेला छोड़ देती ? सुनीता ने विशाल को आंखों आंखों में ही माफ़ कर दिया और पति के साथ घर चली आई। 

घर में सब लोग बहुत खुश हुए, सबको सुनीता की कीमत का पता भी चल चुका था। अब सभी सुनीता को काम में मदद भी करने लगे थे। अब सारे काम का बोझ सिर्फ सुनीता पर नहीं था । बच्चे अपनी माँ को काम में मदद करने के साथ ही अपनी माँ का सम्मान भी करने लगे थे। सुनीता के पति विशाल ने अब जान लिया था कि सुनीता ने आज तक जो किया था, उसे कोई और कर पाने में सक्षम भी नहीं था।  


शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

*दर्द*

 मैं भी इंसान हूँ..." 🌧️🕊️


हर रोज़ मुस्कुराती हूँ, पर कभी-कभी में भी अंदर से रोती हूँ,

भीड़ में सबसे मिलती हूँ, पर अंदर से अपने आप को खोती भी हूँ।


हर चेहरे पे हँसी बाँटती हूँ,कोशिश यही होती है मेरी

पर अपने ग़म किसी से नहीं कहती,आदत है मेरी, 

क्योंकि मैंने सीखा है —

हर सवाल का जवाब देना

हर बार ज़रूरी नहीं होता।


मैं पत्थर नहीं…

जो ठोकरें खा के भी ,आवाज़ न करे,

मैं भी एक इंसान हूँ…

फिर भी कभी-कभी ,टूटकर, खुद से ही माफ़ी माँग लेती हूँ।


कभी किसी की जीत में तालियाँ बजाईं,

तो कभी खुद की हार पे चुपचाप सिर भी झुकाया है मैने।

मैंने रिश्तों को बचाने में खुद को खोया,

पर कभी किसी को ये एहसास तक नहीं होने दिया।


कई लोग कहते भी हैं —

"तू तो मजबूत है ..."

पर कोई नहीं जानता —

मजबूती की इस, दीवार के पीछे, 

एक थका हुआ दिल, हर रात बिखरता भी है।


मैं दिखती हूँ शांत समंदर सी,

पर अंदर ज्वार मेरे भी उठते हैं — 

रोज़… हर लम्हा उठते हैं।


कभी-कभी जी चाहता है —

कि कोई तो पूछे...

"तू ठीक तो है ना?" 



मंगलवार, 2 सितंबर 2025

*कभी नहीं सोचा*

 कभी सोचा है…हम कौन हैं 

क्या हैं, किधर हैं, क्यूँ हैं 


हर वक़्त भाग रहे हैं हम 

किसी और के जैसा बनने के लिए 


अपने जैसा बनने में 

अपने दिल की सुनने में 

पता नहीं कौन सा डर है हमें 


जिसके साथ ख़ुश हैं 

उसके साथ होते नहीं 

जो पाना चाहते हैं 

वो मिलता नहीं 

हर वक़्त ख़ुद से जाने 

कितने समझौते 

करते हुए जिये जा रहे हैं 


अपने ही भीतर की 

आवाज़ को 

अनसुनी कर 

बाहर के शोर में 

ख़ुद को 

खोते चले जा रहे हम 

सबके लिए और 

सबके हिसाब से जीते जी

सबके जैसे बनने की 

होड़ में ख़ुद को ही 

मारते जा रहे हम 


कौन है हम वास्तव में 

क्या चाहते हैं हम ?

क्या ये सवाल ख़ुद से 

कभी करते हैं हम ?


शायद नहीं… 

क्यूँकि ख़ुद के भीतर 

झांक कर देखना ही 

नहीं चाहते हम

अपनी ही सच्चाई से डरते हैं हम

दुनिया के इस बने बनाए ढाँचे में 

ख़ुद को कैसे भी करके फ़िट करते हम ll


अनिता ✍️





शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

*अनपढ़*

  बेटे का जॉइनिंग लेटर आया है और पिता-पुत्र खोल कर पढ़ रहे है मां दौड़ी दौड़ी आती है और बोलती है मुझे भी दिखाइए ..




बेटा तपाक से बोलता है पढ़ पाओगी आप तो अनपढ़ हो!!!!! 


बेटे का यह शब्द पिता को चुभ गया...


सही बोल रहा है बेटा!!!




वह अनपढ़ है।


इसलिए तुम्हारे कॉपी-किताबों में गलतियाँ सुधार नहीं पाती थी, पर रात-रात भर तुम्हें पढ़ते हुए देखती रहती थी।




वह अनपढ़ है।


इसलिए गणित के सवाल तुम्हें नहीं समझा पाई, पर तुम्हारे पास बैठकर दीपक की लौ तेज करती रही ताकि तुम अंधेरे में भी पढ़ सको।




वह अनपढ़ है।


पर नौ महीने तुम्हें अपने पेट में ढोया, जब डॉक्टर ने कहा था कि यह सफर मुश्किल है, तब भी उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।




वह अनपढ़ है।


इसलिए बड़े-बड़े सपनों का मतलब नहीं समझती थी, लेकिन चाहती थी कि उसका बेटा आसमान से भी ऊँचा उड़ जाए।




वह अनपढ़ है।


तुम्हारे स्कूल जाने से दो घंटे पहले उठ जाती, टिफिन बनाती, जूते पॉलिश करती, और दरवाजे पर खड़े होकर तुम्हें आशीर्वाद देती—“पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना।”




वह अनपढ़ है।


इसलिए तुम्हें कभी होमवर्क में मदद न कर सकी, पर तुम्हारे आँसुओं को पोंछकर यह जरूर कहती—“बेटा, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।”




वह अनपढ़ है।


इसलिए तुम्हारे रिजल्ट कार्ड के नंबर नहीं पढ़ पाती थी, लेकिन तुम्हारे चेहरे की खुशी देखकर समझ जाती थी कि तुम पास हो गए हो।




वह अनपढ़ है।


इसलिए तुम्हारे नाम की स्पेलिंग नहीं जानती थी, पर तुम्हारे नाम से ही उसकी दुनिया रोशन थी।




वह अनपढ़ है।


लेकिन उसका त्याग, उसका संघर्ष, उसका प्यार—दुनिया की किसी किताब से कम नहीं था।




आज तुम पढ़-लिखकर दुनिया जीत रहे हो, लेकिन याद रखना—तुम्हारी पहली गुरु वही थी।


वह अनपढ़ थी… पर उसी ने तुम्हें जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान दिया।

अनिता✍🏼










बुधवार, 13 अगस्त 2025

*आत्मिक संतुष्ष्टि *

 वो समझदार बहु **

😇😇😇😇

शाम को गरमी थोड़ी थमी तो मैं पड़ोस में जाकर निशा के पास बैठ गई। 

आखिर ,उसकी सासू माँ भी तो कई दिनों से बीमार है..... सोचा ख़बर भी ले आऊँ और निशा के पास बैठ भी आऊँ। मेरे बैठे-बैठे पड़ोस में रहने वाली उसकी तीनों देवरानियाँ भी आ गईं। निशा से पूछा ‘‘अम्मा जी, कैसी हैं?’’ 

और पूछ कर इतमीनान से चाय-पानी पीने लगी।.......फिर एक-एक करके अम्माजी की बातें होने लगी। सिर्फ़ शिकायतें.......... ‘‘जब मैं आई तो अम्माजी ने ऐसा कहा, वैसा कहा, ये किया, वो किया।’’

आधे घंटे तक शिकायते करने के बाद सब ये कहकर चली गईं....... कि उनको शाम का खाना बनाना है....बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। 

उनके जाने के बाद मैं निशा से पूछ बैठी,

निशा अम्माजी, आज एक साल से बीमार हैं और तेरे ही पास हैं। तेरे मन में नहीं आता कि कोई और भी रखे या इनका काम करे, माँ तो सबकी है।’’

उसका उत्तर सुनकर मैं तो जड़-सी हो गई। 

वह बोली, ‘‘बहनजी, मेरी सास सात बच्चों की माँ है। अपने बच्चो को पालने में उनको अच्छी जिंदगी देने में कभी भी अपने सुख की परवाह नही की.... सबकी अच्छी तरह से परवरिश की ......ये जो आप देख रही हैं न मेरा घर, पति, बेटा....बेटी , शानो-शौकत सब मेरी सासुजी की ही देन है।......

अपनी-अपनी समझ है बहनजी । मैं तो सोचती हूँ इन्हें क्या-क्या खिला-पिला दूँ, कितना सुख दूँ, मेरे दोनों बेटे बेटी अपनी दादी मां के पास सुबह-शाम बैठते हैं..... उन्हे देखकर वो मुस्कराती हैं, अपने कमजोर हाथो से वो उन दोनों का माथा चेहरा ओर शरीर सहलाकर उन्हे जी भरकर दुआएँ देती हैँ।

जब मैं सासु माँ को नहलाती, खिलाती-पिलाती हूँ, ओर इनकी सेवा करती हूँ तो जो संतुष्टि के भाव मेरे पति के चेहरे पर आते है उसे देखकर मैं धन्य हो जाती हूँ၊ मन में ऐसा अहसास होता है जैसे दुनिया का सबसे बड़ा सुख मिल गया हो.......

मेरी सासु माँ तो मेरा तीसरा बच्चा बन चुकी हैं.........

और ये कहकर वो सुबकसुबक कर रो पड़ी।

मैं इस ज़माने में उसकी यह समझदारी देखकर हैरान थी, मैने उसे अपनी छाती से लगाया और मन ही मन उसे नमन किया और उसकी सराहना की .......

कि कैसे कुछ निहित स्वार्थी ओर अपने ही लोग तरह-तरह के बहाने बना लेते है तथा अपनी आज़ादी और ऐशो अय्याशी के लिए,अपनी प्यार एवं ममता की मूरत को ठुकरा देते हैं

 😇😇😇😇