शनिवार, 24 सितंबर 2022

*जीवन का सच*

 मिडिल क्लास पति बीवी से प्यार ज़ाहिर करने के लिए उसे ऐनिवर्सरी पर ताजमहल या नैनीताल नहीं ले जा पा रहा था. वो रात में घर में जब सब सो जाते हैं तब ऑफ़िस वाले बैग में से चाँदी की एक जोड़ी पायल और लाल काँच की चूड़ियाँ धीरे से निकाल कर बीवी को पहनाता है और.. 

उसके माथे पर पसीने से फैल चुके सिंदूर को उँगलियों से पोछते हुए ख़ुद से वादा करता है कि अगली गर्मी से पहले वो कूलर ख़रीद लाएगा. और शर्ट की जेब टटोल कर #500 रूपये  हाथ में देते हुए कहता है, घर जाना तो अम्मा और भाभी के लिए कुछ ख़रीद लेना. क्या पता तब हाथ में पैसे रहे न रहे..🍁 🙂

हर कोई चाहता है प्यार में ताजमहल बनाना परंतु जीवन का सच है दो टाइम की रोटी का जुगाड़ लगाना🙏🏼

जिंदगी तब बहुत आसान हो जाती है,          

जब साथी परखने वाला नहीं....!

बल्कि समझने वाला  साथ हो...!!

🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰🥰

बुधवार, 14 सितंबर 2022

*मनमौजी बनिये *

*बीमारियां कैसे आती हैं?*
शरीर हमें बताता है !
अपने आंसुओं को भींच लेने  से !
कड़वी बातों को चुपचाप निगल जाने से !
अपनी जुबान को बंद रखने से !
अपने दिल के दरवाज़े पर सांकल लगाने से!
लेकिन शरीर तो बोलता है ,
ओह, शरीर जरूर बोलता है ...
टेबल की सतह को थपथपा कर 
उंगलियों की कोरो से बोलता है ,
बिस्तर पर बेचैन पैरों की हरकत से बोलता है ,
गले में रूंध गई आवाज से बोलता है,
दिमाग़ पर माइग्रेन के हमले से बोलता है ,
आंतों में भर गई हवा से बोलता है ,
पेट में भर गई आग से बोलता है ,
माथे पर तनी हुई लकीरों और सलवटों से बोलता है,
अनिद्रा और अतिनिद्रा से बोलता है,
अपनी आवाज पर लगाम लगा सकते हो तुम,
 पर भीतर एक संवाद शुरू हो जाता है,
हम बीमार इसलिए होते हैं।
क्योंकि हम न पचने वाले रेशों को,
दिल में समेट कर रख लेते हैं।
दर्द हमेशा हमेशा हमारे साथ रहने के लिए नहीं आया है,
वह तो सिर्फ़ एक अर्ध विराम है,पूर्ण विराम नहीं !
बोलना हमारी आत्मा को सुकून पहुंचाता है
इसलिए

* लिखो* 
कुछ भी लिखो ।
एक खत लिखो 
डायरी लिखो
अपनी कथा लिखो 
अपनी व्यथा लिखो 
एक कविता लिखो 
एक किताब लिखो 
एक *गीत* गाओ 
दूसरों को गाने के लिए तैयार करो
*नृत्य*
अपने पैरों को तैयार करो 
और नृत्य की मुद्रा में आ जाओ
  *कलाकार*
एक कलाकार बन जाओ
एक कैनवास पर मनचाहे रंग उतार दो 
*मिलो*
दोस्तों से मिलो - फोन पर ही सही 
*दौड़ो*घूमो 
पार्क में दौड़ लगाओ घूमने जाओ 🏃‍♂️
*बात*
अपने लोगों से बात करो 
पेड़-पौधों से बात करो..
गली के कुत्ते से बतियाओ
गाय को रोटी खिलाओ 
कुछ नहीं तो आसमान की ओर देखकर जोर से चिल्लाओ 
बस चुप मत रहो
तुमने जो झेला 
अगर उसे निगल लिया 
तो डूबने के अलावा कोई चारा नहीं तुम्हारे पास
आखिर तुम्हारा दिल एक गोदाम,
एक कबाड़खाना तो नहीं है न,दोस्त !
और शरीर यह जानता है
इसीलिए बोलता है !! 

*मनमौजी बनिये 🤪😋😆*
*हंसिए और हंसाइए....
*स्वस्थ रहिए और मस्त रहिए* 🕺

रविवार, 28 अगस्त 2022

*छोटी सी दुआ*

किसी ने मुझसे पूछा...
*दुनिया में सबसे मुश्किल काम क्या है??*
"बड़ा कठिन सवाल है"..
मैने मुस्करा कर कहा!
फिर कुछ सोचकर मैंने जबाब दिया....
"मेरी नजर में दुनिया का 
सबसे मुश्किल काम है.... 
*अपनी आंखों के सामने अपने माँ बाप को बूढ़ा होते हुए देखना..!!*
ये वो समय होता है जब हम कुदरत के इस लिखे को टाल नहीं पाते..!!
माँ-बाप के वो खूबसूरत से चेहरे जब झुर्रीयो से भर जाते हैं तो....
दिल भर  आता है..!!
उंगली पकड़कर चलाने वालें जब खुद चलने के काबिल नहीं रहते तो....
दिल भर आता है..!!
सहारा देने वालें जब खुद सहारे की तलाश में घूमते हैं तो....
दिल भर आता है..!!
रास्ता दिखाने वालों को जब अपने ही रास्ते वीरान नजर आते हैं तो....
दिल भर आता है..!!
हंसकर बोलने वालें जब खामोश रहने लगते हैं तो....
दिल भर  आता है..!!
अपने बच्चो की नजर उतारने वालो की जब नजरे धुंधला जाती हैं तो....
दिल भर आता है..!!
अगर ईश्वर मुझे कुछ मांगने के लिए कहें तो मैं ये मांगू.....
हे ईश्वर ....
किसी के भी माँ-बाप को कमजोर..
बीमार ना करना....
उनकी जितनी भी जिंदगी है ,
वो सेहतमंद रहें.!! 
कोई भी औलाद अपने माँ-बाप को बेसहारा ना छोड़े.!!

शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

सारे लड़कों को समर्पित💐

लड़के ! हमेशा खड़े रहे.
खड़े रहना उनकी  मजबूरी नहीं रही बस !
उन्हें कहा गया हर बार,
चलो तुम तो लड़के हो 
खड़े हो जाओ.

छोटी-छोटी बातों पर वे खड़े रहे कक्षा के बाहर.. स्कूल विदाई पर जब ली गई ग्रुप फोटो,लड़कियाँ हमेशा आगे बैठीं,और लड़के बगल में हाथ दिए पीछे खड़े रहे.
वे तस्वीरों में आज तक खड़े हैं..

कॉलेज के बाहर खड़े होकर, 
करते रहे किसी लड़की का इंतज़ार,

या किसी घर के बाहर घंटों खड़े रहे, एक झलक,एक हाँ के लिए. अपने आपको 
आधा छोड़ वे आज भी 
वहीं रह गए हैं...

बहन-बेटी की शादी में 
खड़े रहे, मंडप के बाहर
बारात का स्वागत करने के लिए.
खड़े रहे रात भर 
हलवाई के पास,कभी भाजी में कोई कमी ना रहे.खड़े रहे खाने की स्टाल के साथ,
कोई स्वाद कहीं खत्म न हो जाए.
खड़े रहे विदाई तक 
दरवाजे के सहारे और टैंट के 
अंतिम पाईप के उखड़ जाने तक.

बेटियाँ-बहनें जब तक वापिस लौटेंगी
 वे खड़े ही मिलेंगे...

वे खड़े रहे पत्नी को सीट पर 
बैठाकर,बस या ट्रेन की खिड़की थाम कर,
वे खड़े रहे 
बहन के साथ घर के काम में,
कोई भारी सामान थामकर.

माँ के ऑपरेशन के समय ओ. टी.के बाहर घंटों. वे खड़े रहे 
पिता की मौत पर अंतिम लकड़ी के जल जाने तक. 
वे खड़े रहे ,
अस्थियाँ बहाते हुए गंगा के बर्फ से पानी में.

लड़कों ! रीढ़ तो तुम्हारी पीठ में भी है,
क्या यह अकड़ती नहीं ?

बेटी पर तो बहुत लिखा जाता है,

आज बेटों पर लिखने का मन किया ।❤️

*🌹बेवजह कुण्डी* *खटखटाया करो* 🌹

🌻🌹🍁🌷🌺🌸💐🌼🥀🌻🌹🍁
*आसपास के लोगों से मिलते रहा करो,*
*उनकी थोड़ी खैर खबर भी रखा करो,*
*जाने कौन कितने अवसाद में जी रहा है,*
*पता नहीं कौन बस पलों को गिन रहा है,* 

*कभी निकलो अपने घरोदों से,*
*औरों के आशियानें में भी जाया करो,*
*कभी कभी अपने पड़ोसियों की कुण्डी,*
*तुम बेवजह ही खटखटाया करो,*

*कभी यों ही किसी के कंधे पे हाथ रख,*
*साथ होने का अहसास दिलाया करो,*
*कभी बिन मतलब लोगों से बतियाया करो,*
*बिना जज किये बस सुनते जाया करो,*

*बहुत कुछ टूटे मिलेंगे, कुछ रूठे दिखेंगे,*
*जिन्दगी से मायूस भी मिलेंगे,*
*बस कुछ प्यारी सी उम्मीदें,* 
*कभी उनके दिलों में जगाया करो,*

*ऐसा न हो फिर वक्त ही न मिले,*
*और मुट्ठी की रेत की तरंह लोग फिसलते रहे,*

*तूँ बेवक्त ही सही...*
*लोगों को गले तो लगाया करो ।*


🌻🌹🍁🌷🌺🌸💐🌼🥀🌻🌹🍁
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

मंगलवार, 2 अगस्त 2022

🌷 माँ का कटोरदान 🌿

जब हम छोटे थे तब मम्मी रोटियां एक स्टील के कटोरदान में रखा करती थी.
रोटी रखने से पहले कटोरदान में एक कपड़ा बिछाती वो कपड़ा भी उनकी पुरानी सूती साड़ी से फाड़ा हुआ होता था।वो कपड़ा गर्म रोटियों की भाप से गिरने वाले पानी को सोख लेता था, जैसे मम्मी की साड़ी का पल्लू सोख लेता था हमारे माथे पे आया पसीना कभी धूप में छाँव बन जाता, कभी ठण्ड में कानों को गर्माहट दे जाता।
कभी कपड़ा न होता तो अख़बार भी बिछा लेती थी मम्मी
.....लेकिन कुछ बिछातीं ज़रूर थी.समय बीतता गया और हम बड़े हुए.
एक बार दीपावली पर हम मम्मी के साथ बाजार गए 
तो बर्तनो की दूकान पर देखा केसरोल .....चमचमाते लाल रंग, का बाहर से प्लास्टिक और अंदर से स्टील का था. दुकानदार ने कहा ये लेटेस्ट है  इसमें रोटियां गर्म रहती है.
हम तो मम्मी के पीछे ही पड़ गए अब तो इसी में रोटियां रक्खी जाएँगी, मम्मी की कहाँ चलती थी हमारी ज़िद के आगे 
अब रोटियाँ कैसेरोल में रक्खी जाने लगी.
कटोरदान में अब पापड़ रखने लगी थी मम्मी
अगले महीने, मम्मी की एक सहेली ने ,पापड़ मंगवा के दिए पर, वो तो बहुत बड़े थे, तो कटोरदान में फिट ही नहीं हो पाये इसलिए उन्हें एक दूसरे बड़े डब्बे में रखा गया....
और अब कटोरदान में मम्मी ने परथन (सूखा आटा जिसे लगाकर रोटियाँ बेली जाती है) रख लिया।जैसे जैसे समय बीतता गया कटोरदान की भूमिका भी बदलती गई पर वो मायूस न हुआ जैसा था वैसा ही रहा बस ढलता गया नयी भूमिकाओं में।
कुछ और समय बीता....
मेरी शादी हो गयी और मैं एक नए शहर में आ गयी।मम्मी ने मुझे बहुत सुन्दर कीमती और नयी चीज़ें दी अपनी गृहस्ती को सजाने के लिए.....
पर मुझे हमेशा कुछ कमी लगती
एक बार जब गर्मी की छुटियों में मम्मी से मिलने गई तो मम्मी ने मुझे एक कैसेरोल का सेट दिया.
मैने कहा मुझे ये नहीं वो कटोरदान चाहिए 
मम्मी हंस दी बोली .... उसका क्या करेगी? ये ले जा लेटेस्ट है
मैंने कहा हाँ ठीक है पर वो भी ।
मम्मी मुस्कुरा दी और परथन निकालकर कटोरदान धोने लगी , उसे अपनी साड़ी के पल्लू से सुखाया और उसमे पापड़ का एक पैकेट रख कर मेरे बैग में में रख दिए ।
अब खुश मम्मी बोली, ......मैने कहा हाँ 
मै उस कटोरदान को बहुत काम में लेती हूं सच कहू तो अकेलापन कुछ कम हुआ
कभी बेसन के लाडू भर के रखती हूं ,कभी मठरी
कभी उसमें ढोकला बनाती हूँ 
कभी सूजी का हलवा जमाती हूँ
कभी कभी पापड़ भी रखती हू I नित नयी भूमिका मैं ढल जाता है मम्मी का ये कटोरदान 
यहाँ आने बाद मुझे मम्मी की बहुत याद आती थी ,पर मैं कहती नहीं थी के मम्मी को दुःख होगा 
कभी कभी सोचती हू क्या इस कटोरदान को भी मम्मी की याद आती होगी 
ये भी तो मेरी तरह मम्मी के हाथों के स्पर्श को तरसता होगा आखिर इसने भी तो अपनी लगभग आधी ज़िन्दगी उनके साथ बिताई है ।
बस हम दोनों ऐसे ही अक्सर मम्मी को याद कर लेते हैं
एक दूसरे को ' छू ' कर मम्मी का प्यार महसूस कर लेते है। 
बस ऐसे ही एकदूसरे को सहारा दे देते हैं .....
मैं और मम्मी का कटोरदान। 
सच माँ की कमी कोई पूरा नहीं कर सकता इसलिये आज माँ है तो पल भर भी गंवाये बिना उनके साथ जिन्दगी जी लो.....
🙏🙏🌷🌿
आशीर्वाद बना रहे माँ 😍 💗 💓 💛 ♥️

रविवार, 24 जुलाई 2022

लौट के आजा मेरे मीत

  जानती हूं, कल से मुझ ही को याद कर रहे हो, करो भी क्यों न, आज, मुझे तुमसे दूर हुए पूरा एक साल जो हो गया, आज पूजा पाठ हो रहा है घर में, ब्राम्हण भोज भी होगा, आज तो दिन भर व्यस्त रहोगे, जब फुरसत मिले तो मुझे याद करना, मैं भागी भागी, चली आऊंगी, तुम्हारे  पास,साथ के लिए जीते जी तरसी हूं, तो मरने के बाद, ये मौका, कैसे छोड़ दूंगी।

    ताना नहीं मार रही हूं, शिकायत कर रही हूं, जब तक साथ थी, अपनी व्यस्तता के चलते, न मुझ पर ध्यान दे पाए, न कभी मेरे मन की सुन पाए, घर के बड़े होने के कारण, सारी जिम्मेदारियां उठाने में लगे रहे, और मैं तुम्हारा, इंतजार ही करती रही।

    याद आ रहा है, जब ब्याह के आई थी, छोटी उमर के थे हम, अंदर से तुम कवि हृदय, पर ऊपर से सदैव, कठोर बने रहे, अकेले में हम, जी भर के बातें करते, पर जैसे ही घर वालों के सामने आते, कभी मुझे, नजर उठा कर भी न देखते, जानती हूं, जानती हूं, बड़ों का लिहाज था। पर सच कहूं, मुझे तुम्हारा, वही रुप पसंद था जो मेरे सामने, रहता, एक पागल प्रेमी का।

    बच्चों के जन्म के बाद, मैं भी तो उनकी परवरिश में उलझकर, रह सी गई थी, घर की बड़ी बहू, होने के कारण जिम्मेदारियां भी, निभानी थीं........... बच्चे बड़े होते गए, खर्च बढ़ते गए, और तुम, हमेशा जोड़ तोड़ और गुणा भाग, में ही लगे रहे, ऑफिस की जिम्मेदारियां, कभी घर की परेशानियां, जीवन सरपट, भागा जा रहा था, और हमें भी साथ दौड़ाए जा रहा था।

बच्चे बड़े हो गए, शुक्र है, दोनों बेटे, पढ़ लिखकर लायक बन गए, अब सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उनके लिए बहुएं, ढूंढना, पर ये सौभाग्य, बड़े पुत्र ने हमें न दिया, एक दिन अपनी सहपाठी को, हमारे समक्ष खड़ा कर दिया, मम्मी पापा, ये है आपकी होने वाली बहू, तुम, हमेशा नियमों और कायदों से चलने वाले, क्या तुम्हें, बेटे का ये रवैया, पसंद आता, क्रोध में आता हुआ देख, मैंने झट तुम्हारा हाथ उठाकर, बहू के सिर पर रख दिया, और आशीर्वाद दे दिया........ तुम खा जाने वाली नजरों से देखते रहे मुझे, बच्चों के जाने के बाद, मैंने तुम्हें समझाने कि, कितनी कोशिश की, पर तुम कई दिनों तक नाराज़, रहे मुझसे।

   जानती थी, ये नाराजगी, मुझसे नहीं, बेटे से थी, पर नए जमाने के चलन को देखते हुऐ, तमाशा करने के बजाय, उनके निर्णय को स्वीकृति देने केअलावा, मुझे कुछ सूझा नहीं।

    छोटा बेटा, आपका लाड़ला रहा हमेशा, उसने तो साफ कह दिया, जहां पापा कहेंगे, मैं तो आंख मूंद के शादी कर लूंगा, उस दिन, तुम्हारे चेहरे पर, अलग सा सुकून देखा मैने........ तुम्हें अपनी चलाने की आदत भी तो रही है न हमेशा, नाराज क्यों होते हो, मैं तो दिल्लगी कर रही थी।

    खूब देख भाल के,  तुम्हारे अभिन्न मित्र की ही बेटी को, छोटी बहू के रुप में पसंद किया, खूब धूमधाम से, हमने अपनी, आखिरी ज़िम्मेदारी निभा दी।

    दोनों बच्चे, अपनी नौकरियों में व्यस्त हो गए, कभी कभार, हम भी उनके पास, चले जाते, पर रिटायरमेंट के बाद, तुम्हें अपना घर ही अच्छा लगता, यार दोस्त ज्यादा बनाना, पसंद था नहीं तुम्हें, अंदर ही रखते थे सारी बातें, खुश हो या दुखी, शक्ल देखकर ही अंदाजा, लगा पाती थी मैं।

    आजकल थोड़ी थकावट होने लगीहै, डॉक्टर को दिखाया है पर, कमजोरी और थकान, बढ़ने लगी है, उमर बढ़ने लगी है, और तुम्हारी चिन्ता भी, तुम इतने संकोची हो कि, मेरे न रहने पर, बहुओं से, अपने मन का कुछ खाने को भी न कह पाओगे, खाने पीने के इतने शौकीन हो, कैसे अपना मन मार पाओगे........ आजकल ज्यादा समझाइश देने लगीं हूं, और बच्चों के साथ रहने पर जोर देने लगी हूं, पर तुम टस से मस नहीं होते, ठेल ठेलकर, मुझे सुबह, घुमाने ले जाने लगे हो, खुली हवा में, पर मुझे तो तुम्हारे अकेलेपन की चिन्ता खा रही है, ज्यादा सोचती हूं न, तुमसे डांट भी तो खाती हूं।

आजकल मेरी चिन्ता, बहुत करने लगे हो, खो देने का, डर सताने लगा है न, कितनी तेज गति से दौड़ी जा रही है जिंदगी, चाहकर भी नहीं रोक पा रहे हैं हम।

    पहले भी समझाती थी, आज भी कह रही हूं, बहुओं को बेटी समझना, उनसे अपने मन की बात कह देना, संकोच न करना, खाने में मनमानी न करना, दादागिरी दिखाकर, अब आंखे क्या दिखा रहे हो, अब मैं डरने वाली नहीं हूं।

    हमारे साथ की, वो आखिरी रात,मैं तुमको देखकर सोई, कभी न जागने के लिए, अरे मैं तो और भी कुछ कहना चाहती थी, सुनना चाहती थी, पर ईश्वर ने मौका ही न दिया, शायद इतना ही साथ था हमारा, पर दुखी न होना, मैं तुम्हारा पीछा छोड़ने वाली नहीं, मरकर भी नहीं........

अब मेरे जाने का वक्त हो गया, अपना ध्यान रखना, मैं यहीं हूं, हमेशा तुम्हारे पास, बिलकुल नजदीक,................

प्रीति सक्सेना
इन्दौर द्वारा रचित ह्रदय स्पर्शी कथा