ANITA SUKHWAL "GRACE"

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

*आधुनिक सच*

मियां-बीबी दोनों मिल खूब कमाते हैं

तीस लाख का पैकेज दोनों ही पाते हैं

सुबह आठ बजे नौकरियों पर जाते हैं

रात ग्यारह तक ही वापिस आते हैं

अपने परिवारिक रिश्तों से कतराते हैं

अकेले रह कर वह कैरियर बनाते हैं

कोई कुछ मांग न ले वो मुंह छुपाते हैं

भीड़ में रहकर भी अकेले रह जाते हैं

मोटे वेतन की नौकरी छोड़ नहीं पाते हैं

अपने नन्हे मुन्ने को पाल नहीं पाते हैं

फुल टाइम की मेड ऐजेंसी से लाते हैं

उसी के जिम्मे वो बच्चा छोड़ जाते हैं

परिवार को उनका बच्चा नहीं जानता है

केवल आया 'आंटी' को ही पहचानता है

दादा-दादी, नाना-नानी कौन होते है ?

अनजान है सबसे किसी को न मानता है

आया ही नहलाती है आया ही खिलाती है

टिफिन भी रोज़ रोज़ आया ही बनाती है

यूनिफार्म पहना के स्कूल कैब में बिठाती है

छुट्टी के बाद कैब से आया ही घर लाती है

नींद जब आती है तो आया ही सुलाती है

जैसी भी उसको आती है लोरी सुनाती है

उसे सुलाने में अक्सर वो भी सो जाती है

कभी जब मचलता है तो टीवी दिखाती है

जो टीचर मैम बताती है वही वो मानता है

देसी खाना छोड कर पीजा बर्गर खाता है

वीक एन्ड पर मॉल में पिकनिक मनाता है

संडे की छुट्टी मौम-डैड के संग बिताता है

वक्त नहीं रुकता है तेजी से गुजर जाता है

वह स्कूल से निकल के कालेज में आता है

कान्वेन्ट में पढ़ने पर इंडिया कहाँ भाता है

आगे पढाई करने वह विदेश चला जाता है

वहाँ नये दोस्त बनते हैं उनमें रम जाता है

मां-बाप के पैसों से ही खर्चा चलाता है

धीरे-धीरे वहीं की संस्कृति में रंग जाता है

मौम डैड से रिश्ता पैसों का रह जाता है

कुछ दिन में उसे काम वहीं मिल जाता है

जीवन साथी शीघ्र ढूंढ वहीं बस जाता है

माँ बाप ने जो देखा ख्वाब वो टूट जाता है

बेटे के दिमाग में भी कैरियर रह जाता है

बुढ़ापे में माँ-बाप अब अकेले रह जाते हैं

जिनकी अनदेखी की उनसे आँखें चुराते हैं

क्यों इतना कमाया ये सोच के पछताते हैं

घुट घुट कर जीते हैं खुद से भी शरमाते हैं

हाथ पैर ढीले हो जाते, चलने में दुख पाते हैं

दाढ़-दाँत गिर जाते, मोटे चश्मे लग जाते हैं

कमर भी झुक जाती, कान नहीं सुन पाते हैं

वृद्धाश्रम में दाखिल हो, जिंदा ही मर जाते हैं : 

सोचना की बच्चे अपने लिए पैदा कर रहे हो 

या विदेश की सेवा के लिए।

बेटा एडिलेड में, बेटी है न्यूयार्क।

ब्राईट बच्चों के लिए, हुआ बुढ़ापा डार्क।

बेटा डालर में बंधा, सात समन्दर पार।

चिता जलाने बाप की, गए पड़ोसी चार।

ऑन लाईन पर हो गए, सारे लाड़ दुलार।

दुनियां छोटी हो गई, रिश्ते हैं बीमार।

बूढ़ा-बूढ़ी आँख में, भरते खारा नीर।

हरिद्वार के घाट की, सिडनी में तकदीर।

तेरे डालर से भला, मेरा इक कलदार।

*रूखी-सूखी में सुखी, अपना घर संसार*

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गुरुवार, 30 सितंबर 2021

इच्छाएं

दिल की आवाज


 मैने बच्चों को,उनके ऑफिस के लिए ,विदा किया।रसोई का काम समेटा और अपने लिए एक कप चाय बना कर थोड़ी देर सुस्ताने बैठ गई। जब से शादी होकर ससुराल आईं , मैं घर गृहस्थी के कामों में ही तल्लीन रहीं।   सास ससुर का काम ,चाय ,नाश्ता  भोजन, पानी सब यथासम्भव समय पर ही करने की कोशिश करतीं। जाइंट परिवार था तो समय भागा कटा था,पति फर्टिलाइजर में थे।आने जाने वालों का रेलमपेल सा लगा रहता था,उनका भी  सारा काम समय पर करती रहीं।  वक्त पर दो बच्चों का लालन पालन और पूरे घर को संभालते कैसे वक्त निकल जाता था जान ही नहीं पाई। अपनी इच्छा ,ख़्वाहिश कुछ थी ही नहीं।कोशिश करती कि सब काम समय पर हो जाएं और किसी को उनसे कोई शिकायत न हो। बच्चों की बहुत मन से ,परवरिश की ।पढ़ी लिखी थी तो दोनो बच्चो को खूब ध्यान रखकर पढ़ाया लिखाया, बड़े,बेटे की शादी हुई। दूसरे बेटे की नौकरी भी बाहर लगी। पति रिटायर हुए ।सास ससुर परलोक सिधार गए।इतना सब परिवर्तन हो जाने के बाद भी मेरी जिन्दगी अपनी ही  रफ्तार से चलती रही। बढ़ती उम्र ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था।अब मै इतनी भागदौड़ करने पर थक जाती थीं। एक दिन थोड़ी फुर्सत मिलने पर  सोचने लगीं कि जिंदगी में सबके लिए सब कुछ किया लेकिन अपने लिये मैने क्या किया? सारे शौक ,इच्छाएं और ख्वाहिशें तो परिवार के लिये  समर्पित हो गईं। अब तो अपने लिये सोच सकती हूँ।कभी मेरे भी बहुत शौक थे, कितनी अच्छी पेंटिंग बनाती थी।शादी के बाद से रंग और ब्रश को हाथ नहीं लगाया।कोशिश करके देखती हूँ कुछ कर पाती हूँ या नहीं। ऐसा निश्चय कर मैंअपने कमरे में गईं।पुराने सामान में से ब्रश निकाले।रंग सूख कर बदरंग हो चुके थे।बाजार से पेंटिंग का  सामान लाने के लिए  लिस्ट बनाई और अपना लक्ष्य पूरा करने के लिये बाजार निकल गईं। मुझे एहसास हुआ कि कोई सुने न सुने हमें  तो अपने दिल की आवाज  सुननी ही चाहिए। आज में अपने शौक को पूरा करती हूं,कुछ  बच्चे भी आ जाते हैं तो उनके साथ अपने शौक को पूरा करने में,व्यस्त रहती हूं,

अनिता सुखवाल



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सोमवार, 9 अगस्त 2021

गुलजार जी के शब्द

 "Excellent poem by gulzar ...appreciate and enjoy ....

>

> ऐ उम्र !

> कुछ कहा मैंने,

> पर शायद तूने सुना नहीँ..

> तू छीन सकती है बचपन मेरा,

> पर बचपना नहीं..!!

>

> हर बात का कोई जवाब नही होता

> हर इश्क का नाम खराब नही होता...

> यु तो झूम लेते है नशेमें पीनेवाले

> मगर हर नशे का नाम शराब नही होता...

>

> खामोश चेहरे पर हजारों पहरे होते है

> हंसती आखों में भी जख्म गहरे होते है

> जिनसे अक्सर रुठ जाते है हम,

> असल में उनसे ही रिश्ते गहरे होते है..

>

>  किसी ने खुदासे दुआ मांगी

> दुआ में अपनी मौत मांगी,

> खुदा ने कहा, मौत तो तुझे दे दु मगर,

> उसे क्या कहु जिसने तेरी जिंदगी की दुआ मांगी...

>

> हर इंन्सान का दिल बुरा नही होता

> हर एक इन्सान बुरा नही होता

> बुझ जाते है दीये कभी तेल की कमी से....

> हर बार कुसुर हवा का नही होता !!!

>








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शनिवार, 28 नवंबर 2020

***सास एक मां***

"सास"भी एक मां है

ऐसे सास को बदनाम ना करो
वो बहुत बड़ा दिल रखती है
जीवन की जमा पूंजी सब दे देती है
सौप देती जो कभी उनका था
जिस घर की मालकिन थी... 

तुम्हारे आने पर वो थाल सजा
ले तेरे हाथों के निशान,तेरी आरती उतार
घर की चाबी भी सौप देती हैं.. 

अपना सब देकर,नजर तो रखेंगी
तुझे आजमाने के लिए 
तेरी परीक्षा भी लेंगी
अपनी मालकियत के कुछ  
अनुभव भी तुम्हे देंगी...

कभी तुमसे रूठ जाएं तो
प्यार से मना लेना
ये अनमोल रिश्ता है
प्यार से सजा लेना....

कितना बड़ा दिल होगा
जो अपना जिगर का टुकड़ा
तुम्हे सौप देती है
बदले में बस 
कभी कभी उसकी टोह लेती है....

सास तेरे सुहाग की दुआ करती है
उसके लिए खुद दुख सहती है
हां कभी सुना देती है
थोड़ा बड़बड़ा भी लेती है...

पर सर दर्द में चाय भी बना के देती है
तेरे बेटा होने पे वो भी नाच लेती है
कभी कभी तो तेरे बच्चों संग
वो भी अपना बचपन जी लेती है...

उसका भी एक दिल होता है
वो जताती नहीं,कभी बताती नहीं
चुपके से तेरे लिए वो दुआ करती है
तेरी गृहस्थी से एक वो ही है
जो कभी जलती नही...

🙏
प्रस्तुतकर्ता Anita Sukhwal पर 9:18 pm 5 टिप्‍पणियां:
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रविवार, 8 नवंबर 2020

मेरी छवि

"उम्रदराज़ न बनो" 
उम्र को दराज़ में रख दो
उम्रदराज़ ना बनो
खो जाओ ज़िन्दगी में
मौत का इन्तज़ार न करो..
जिसको आना है आये
जिसको जाना है जाये
ये तो वक़्त की पहचान है
हम तो जीना जानते हैं
ज़िन्दगी से ही मिलते हैं बार बार
उसी को पहचानते हैं....
कभी बचपन को जीती हूँ
कभी जवानी में सपने सँजोती हूँ
बुढापे में भी रहूँगी जवान ही
ऐसा सोचती हूँ
महफिलों का शौक रखती हूँ
दोस्तों से प्यार करती हूँ
जो रिश्ते मुझे समझ सकें
मैं उनसे जुड़ी रहती हूँ
बँधती नहीं किसी से
ना किसी को जुड़ने पर मजबूर करती हूँ
दिल से जोड़ती हूँ हर रिश्ता
और उन रिश्तों से दिल से ही जुड़ी रहना चाहती हूँ...
हँसना मुझे भाता है
पर अपनों के लिये रोने से भी गुरेज नहीं करती
जो दे देता है एक बार दगा
उससे दूर जाने में भी परहेज़ नहीं करती
याद आते हैं वो लोग कभी
तो आँखें भिगो लेती हूँ
पर फिर ज़िन्दगी की हसीन वादियों में खो जाती हूँ
जानती हूँ कि ज़िन्दगी के पास
समय कुछ थोड़ा है
शिकवे शिकायतों में व्यर्थ क्यों गँवाऊँ
क्यों न शिद्दत से ज़िन्दगी जी लूँ इसे
और प्रेम की गंगा हर तरफ बहाऊँ
मैं रहूँ न रहूँ
पर मेरी छवि मेरे बाद भी ज़िन्दा रहेगी
जिसको दिल से जो भी याद करेगा
मैं उसमें अपनी ज़िन्दगी शायद महसूस कर सकूंगी...
😊😊💐💐❤️❤️😊😊
प्रस्तुतकर्ता Anita Sukhwal पर 7:30 pm 1 टिप्पणी:
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मंगलवार, 12 मई 2020

****कौन?****

मैं थोड़ी भावुक ,तो थोड़ी गुस्सैल हूं, कभी मुंह फट सी भी  कह देती हूं, मैं किसी को बहुत पसंद ,तो किसी को दिखाई  तक नहीं देती  हूं,मैं किसी के हर कदम पर,साथ तो, किसी के, कदमों के पीछे की, निशान भी हूं, कभी सहती हूं ,कभी कहती हूं, मैं पल में आंसू ,पल में हंस देती हूं, मैं किसी के लिए गुलाब ,तो किसी के लिए कांटो की बौछार भी हूं ,सच तो बस इतना है, जो मेरे साथ जैसा है, उसके साथ में वैसी हूं ,
हां मैं बहुत रूपों में बसी हूं ,खुद किसी की,एक बेटी ,और दो बेटो की मां हूं,,बस इतनी मेरी अपनी पहचान है,
कुछ लाइन जिसमे मन की बातें शामिल हैं
```मैं रूठा, तुम भी रूठ गए
फिर मनाएगा कौन ?
आज दरार है, कल खाई होगी
फिर भरेगा कौन ?
मैं चुप, तुम भी चुप
इस चुप्पी को फिर तोडे़गा कौन ?
हर छोटी मोटी बात को लगा लोगे दिल से,
तो रिश्ता फिर निभाएगा कौन ?
दुखी मैं भी और तुम भी बिछड़कर,
सोचो हाथ फिर बढ़ाएगा कौन ?
ना मैं राजी, ना तुम राजी,
फिर माफ़ करने का बड़प्पन दिखाएगा कौन ?
डूब जाएगा यादों में दिल कभी,
तो फिर धैर्य बंधायेगा कौन ?
एक अहम् मेरे, एक तेरे भीतर भी,
इस अहम् को फिर हराएगा कौन ?
ज़िंदगी किसको मिली है सदा के लिए ?
फिर इन लम्हों में अकेला रह जाएगा कौन ?
मूंद ली दोनों में से गर किसी दिन एक ने भी आँखें....
तो कल इस बात पर फिर पछतायेगा कौन ?```♥️
प्रस्तुतकर्ता Anita Sukhwal पर 9:45 am 2 टिप्‍पणियां:
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रविवार, 26 अप्रैल 2020

*तब ओर अब की बातें*




मुझे अच्छे से याद है पांचवी तक मेँ घर से तख्ती जिसे स्लेट कहते है,लेकर ही स्कूल गए थी
स्लेट को जीभ से चाटकर अक्षर मिटाने की मेंरी स्थाई आदत थी लेकिन इसमें पापबोध भी था कि कहीं विद्यामाता नाराज न हो जायें ।पढ़ाई का तनाव मेंने पेम का पिछला हिस्सा चबाकर मिटाया था ।(पेम जिससे में स्लेट ओर लिखती थी शायद आज के बच्चों को नाम नही पता होगा)
स्कूल में टाट पट्टी की अनुपलब्धता में घर से बोरी का टुकड़ा बगल में दबा कर ले जाना मेंरी रोज की दिनचर्या में शामिल था ।
पुस्तक के बीच विद्या , पौधे की पत्ती और मोरपंख रखने से में होशियार हो जाऊंगी ऐसा मेंरा दृढ विश्वास था ।  
कक्षा छः में पहली दफा मेंने अंग्रेजी का ऐल्फाबेट पढ़ा और पहली बार एबीसीडी देखी ।
यह बात अलग है बढ़िया स्मॉल लेटर बनाना मुझे बारहवीं तक भी नही आया था ।कपड़े के थैले में किताब कॉपियां, जमाकर रखना मेंरा रचनात्मक कौशलकी तरह काम था ।हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते तब कॉपी किताबों पर जिल्द चढ़ाना मेंरे साथ मेरे भाई बहनो का भी, उत्सव की तरह काम होता था ।जिससे हमें बहुत खुशी मिलती थी।माता पिता को हम सबकी पढ़ाई की कोई फ़िक्र नहीं थी , न हमारी पढ़ाई उन पर  बोझा थी । सालों साल बीत जाते पर भी माता पिता के कदम,  स्कूल में नही पड़ते थे ।
एक दोस्त को साईकिल के डंडे पर और दूसरे को पीछे कैरियर पर बिठा मेंने ओर मेरे दोस्तों ने न जाने  कितने रास्ते नापें हैं , यह अब याद नहीं बस कुछ धुंधली सी स्मृतियां हैं । जब
स्कूल में पिटते हुए और मुर्गा बनते थे टी मेंरा ईगो मुझे कभी परेशान नहीं करता था , दरअसल में जानती ही नही थी कि ईगो होता क्या है ?
पिटाई  जैसा काम मेंरे दैनिक जीवन की सहज सामान्य प्रक्रिया थी ,पीटाने वाला और पिटने वाला दोनो खुश रहते थे , पिटने वाला इसलिए कि कम पिटे ,  पीटाने वाला इसलिए, खुश कि हाथ साफ़ हुवा उसका,ये अहसाह बस अब यादें बन गया है
में अपने माता पिता को कभी नहीं बता पाई कि में उन्हें कितना प्यार करती हूँ, क्योंकि हमें आई लव यू कहना ही नहीं आता था ।अब लगता है कि काश उन्हें एक बार भी ये बात कही होती।समय पंख लगाकर जैसे उड़ गया,आज हम गिरते - सम्भलते , संघर्ष करते ,दुनियां का हिस्सा बन चुके हैं ,दोस्तो ओर रिश्तेदारों में, कुछ मंजिल पा गये हैं तो कुछ न जाने कहां खो गए हैं ।
हम दुनिया में कहीं भी रह रहे हों लेकिन यह सच लगता है ,कि हमे उस वक़्त ने  हकीकतों ने पाला है , हम सच की दुनियां में थे ।
कपड़ों को सिलवटों से बचाए रखना और रिश्तों को औपचारिकता से बनाए रखना हमें कभी नहीं आया इस मामले में यूँ कह सकते हैं कि हम सदा मूरख ही रहे  ।
अपना अपना प्रारब्ध झेलते हुए हम आज भी ख्वाब बुन रहे हैं , शायद ख्वाब बुनना ही हमें जिन्दा रखे है वरना जो जीवन हम जीकर आये हैं,ऐसा लगता है कि ये ,जीवन ,उसके सामने, कुछ भी नहीं ।
हम अच्छे थे या बुरे थे पर हम एक समय थे, काश वो समय फिर लौट आए ।
  "बस यूंही" आज कलम चलकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का मन किया।
अनिता सुखवाल

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प्रस्तुतकर्ता Anita Sukhwal पर 3:14 am 1 टिप्पणी:
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