गुरुवार, 6 मार्च 2025

* बाद में *

 टहनियों पर लगे पीले पत्ते मत तोड़ो तुम 

चन्द रोज़ में खुद बा खुद झड़ जाएंगे,,

बैठा करो कुछ देर तो घर के बुजुर्गों के पास, 

एक दिन खुद ही ये आपके पास से चले जाएंगे,,

खर्चनें दो उन्हें बेहिसाब हर चीज़ तुम यारों, 

एक दिन सबकुछ तुम्हारे लिए छोड़ जाएंगे, 

मत टोको उनको बार-बार उन्हें बात दोहराने पर, 

एकदिन खुद हमेशा के लिए ख़ामोश हो जाएंगे,,

इनका आशीर्वाद ले लिया करो सर पर हाथ रखकर, 

वर्ना फिर ये तस्वीरों मे ही नज़र आएंगे, 

दो वक्त की रोटी तो समय पर दे दिया करो, 

इज्ज़त और प्यार मोहब्बत के साथ,,

वर्ना फिर श्राद्ध मे भी देखना खाने नही आएंगे,,

आँखे इन्तज़ार करेंगी इन बूढ़ी आत्माओं का 

पर ये कहीं नज़र नहीं आएंगे,,

एक दिन कीमत खुद जान जाओगे उनकी 

 जब उनकी उम्र पर तुम आओगे ,,, 🙏🌺🙏

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025

*महिलाओं को समर्पित*

🥰तुम!!! खुद को कम मत आँको,

खुद पर गर्व करो।

🥰क्योंकि तुम हो तो

थाली में गर्म रोटी है। 

🥰ममता की ठंडक है,

प्यार की ऊष्मा है। 

🥰तुमसे, घर में संझा बाती है

घर घर है। 

🥰घर लौटने की इच्छा है... 

🥰क्या बना है रसोई में

आज झांककर देखने की चाहत है। 

🥰तुमसे, पूजा की थाली है,

रिश्तों के अनुबंध हैं

पड़ोसी से संबंध हैं।

🥰घर की घड़ी तुम हो,

सोना जागना खाना सब तुमसे है।

🥰त्योहार होंगे तुम बिन?? 

तुम्हीं हो दीवाली का दीपक,

होली के सारे रंग,

विजय की लक्ष्मी,

रक्षा का सूत्र! हो तुम।

🥰इंतजार में घर का खुला दरवाजा हो,

रोशनी की खिडक़ी हो

ममता का आकाश तुम ही हो। 

 🥰समंदर हो तुम प्यार का,

तुम क्या हो... 

खुद को जानो!

🥰उन्हें बताओ जो तुम्हें जानते नहीं, 

कहते हैं.. 

तुम करती क्या हो??!!!

🌸☘🍃🍀🍃☘🌸 



मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

*गृहिणी*

 *सभी महिलाओं को समर्पित*

रसायनशास्त्र से शायद ना पड़ा हो पाला

पर सारा रसोईघर प्रयोगशाला

दूध में साइटरीक एसिड डालकर पनीर बनाना या 

सोडियम बाई कार्बोनेट से केक फूलाना

चम्मच से सोडियम क्लोराइड का सही अनुपात तोलती 

रोज कितने ही प्रयोग कर डालती हैं

पर खुद को कोई  वैज्ञानिक नही 

बस गृहिणी ही मानती हैं

रसोई गैस की बढ़े कीमते या सब्जी के बढ़े भाव

पैट्रोल डीजल महँगा हो या तेल मे आए उछाल

घर के बिगड़े हुए बजट को झट से सम्हालती है

अर्थशास्त्री होकर भी

खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं

मसालों के नाम पर भर रखा

आयूर्वेद का खजाना

गमलो मे उगा रखे हैं

तुलसी गिलोय करीपत्ता

छोटी मोटी बीमारियों को

काढ़े से भगाना जानती है

पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।

सुंदर रंगोली और मेहँदी में 

नजर आती इनकी चित्रकारी

सुव्यवस्थित घर में झलकती है

इनकी कलाकारी

ढोलक की थाप पर गीत गाती नाचती है

कितनी ही कलाए जानती है पर 

खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं

समाजशास्त्र ना पढ़ा हो शायद

पर इतना पता है कि

परिवार समाज की इकाई है

परिवार को उन्नत कर

समाज की उन्नति में

पूरा योगदान डालती है

पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।

मनो वैज्ञानिक भले ही ना हो

पर घर में सबका मन पढ लेती है

रिश्तों के उलझे धागों को

सुलझाना खूब जानती है

पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।

 योग ध्यान के लिए समय नहीं है

 ऐसा अक्सर कहती हैं

और प्रार्थना मे ध्यान लगाकर

 घर की कुशलता मांगती है

 खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।

ये गृहणियां सच में महान है

कितने गुणों की खान है

सर्वगुण सम्पन्न हो कर भी

अहंकार नहीं पालती है

खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं।




रविवार, 12 जनवरी 2025

*हकीकत*

 एक कमरा था

जिसमें मैं रहता था

माँ-बाप के संग


घर बड़ा था

इसलिए इस कमी को

पूरा करने के लिए

मेहमान बुला लेते थे हम.


फिर समृद्धि का फैलाव आया 

समृद्धि उस कमरे में नहीं समा पाई


जो चादर पूरे परिवार के लिए बड़ी पड़ती थी

उस चादर से बड़े हो गए हमारे हर एक के पाँव


लोग झूठ कहते हैं कि दीवारों में दरारें पड़ती हैं

हक़ीक़त यही कि जब दरारें पड़ती हैं

तब दीवारें बनती हैं .


पहले हम सब लोग दीवारों के बीच में रहते थे

अब हमारे बीच में दीवारें आ गईं

यह समृध्दि मुझे पता नहीं कहाँ पहुँचा गई


पहले मैं माँ-बाप के साथ रहता था

अब माँ-बाप मेरे साथ रहते हैं


फिर हमने बना लिया एक मकान

एक कमरा अपने लिए

एक-एक कमरा बच्चों के लिए


एक वो छोटा-सा ड्राइंगरूम

उन लोगों के लिए

जो मेरे आगे हाथ जोड़ते थे


एक वो अन्दर बड़ा-सा ड्राइंगरूम

उन लोगों के लिए

जिनके आगे मैं हाथ जोड़ता हूँ


पहले मैं फुसफुसाता था तो

घर के लोग जाग जाते थे

मैं करवट भी बदलता था तो

घर के लोग सो नहीं पाते थे


और अब,

जिन दरारों की वहज से दीवारें बनी थीं

उन दीवारों में भी दरारें पड़ गई हैं।


अब मैं चीख़ता हूँ तो

साथ वाले कमरे से

ठहाके की आवाज़ सुनाई देती है


और मैं सोच नहीं पाता हूँ कि

मेरी चीख़ की वजह से वहाँ ठहाके लग रहे हैं

या उन ठहाकों की वजह से मैं चीख रहा हूँ !


आदमी पहुँच गया है चांद तक

पहुँचना चाहता है मंगल तक

पर नहीं पहुँच पाता सगे भाई के दरवाज़े तक


अब हमारा पता तो एक रहता है

पर हमें एक-दूसरे का पता नहीं रहता


और आज मैं सोचता हूँ

जिस समृध्दि की ऊँचाई पर मैं बैठा हूँ

उसके लिए मैंने कितनी बड़ी खोदी हैं खाइयाँ


अब मुझे अपने बाप की बेटी से

अपनी बेटी अच्छी लगती है

अब मुझे अपने बाप के बेटे से

अपना बेटा अच्छा लगता है


पहले मैं माँ-बाप के साथ रहता था

अब माँ-बाप मेरे साथ रहते हैं

अब मेरा बेटा भी कमा रहा है

कल मुझे उसके साथ रहना पड़ेगा


और हक़ीक़त यही है की

तमाचा मैंने मारा है

तमाचा मुझे खाना भी पड़ेगा..



सोमवार, 23 दिसंबर 2024

*----- इच्छा -----*

 सुबह  चाय  पीते  व्यक्त, पति,मुस्कुराता हुआ अपने मोबाइल पर फटाफट उँगलियां दौड़ा रहा था! उसकी पत्नी बहुत देर से उसके पास बैठी खामोशी से देख रही थी, जो उसकी रोज़ की आदत हो गई थी और जब भी कोई बात अपने पति से करती तो जवाब ‘हाँ’ ‘हूँ’ में ही होता या नपे-तुले शब्दों में!

“किससे चैटिंग कर रहे हो?”

“फेसबुक फ्रेंड से।”

“मिले हो कभी अपने इस फ़्रेण्ड से?”

“नहीं”

“फिर भी इतने मुस्कुराते हुए चैटिंग करते हो?”

“और क्या करूँ बताओ?”

“कुछ नहीं, फेसबुक पे आपकी महिला मित्र भी बहुत -सी होंगी ना?”

“हूँ”

उँगलियों को हल्का -सा विराम दे मुस्कुराते हुए पति ने हुंकार भरी!

“उनसे भी यूहीं मुस्कुराते हुए चैटिंग करते हो, क्या आप सभी को भली-भांति जानते हो?”

पत्नी ने मासूमियत भरा प्रश्न पर प्रश्न किया!

“भली-भांति तो नहीं मगर रोजाना चैटिंग होते-होते बहुत कुछ हम आपस में एक दूसरे को जानने लगते हैं और बातें ऐसी होने लगती हैं कि मानो बरसों से जानते हो और मुस्कुराहट होठों पे आ ही जाती है, अपने -से लगने लग जाते हैं फिर ये!”

“हूँ और पास बैठे पराये -से!” पत्नी हुंकार सी भरने के बाद बुदबुदाई!

“अभी मजे़दार टॉपिक चल रहा है हमारे ग्रुप में! अरे, अभी तुमने क्या कहा था, ध्यान नहीं दे पाया! बोलो ना फिर से, अरे, यार किस सोच डूब गईं।”

पति मुस्कुराता हुआ तेज़ी से मोबाइल पर अपनी उँगलियाँ चलाता। हुआ एक नज़र पत्नी पे डाल के बोला!

“किसी सोच में नहीं! सुनो, बस मेरी एक इच्छा पूरी करोगो?”

पत्नी टकटकी लगाए बोली!

“क्या अब तक तुम्हारी कोई अधूरी इच्छा रखी है मैंने? खैर,चलो बोलो ,बताओ क्या चाहिए?”

“मेरा मतलब ये नहीं था, मेरी हर इच्छाएँ आपने पूरी की हैं मगर ये बहुत ही अहम है!”

“ऐसी बात तो बोलो क्या इच्छा?”

“एंड्रॉयड मोबाइल”

“मोबाइल! बस इनती- सी बात, ओके डन! मगर क्या करोगी बताना चाहोगी?” पति चौकता बोला!

पत्नी ने भीगी पलकों से ,प्रत्युत्तर दिया! “और कुछ नहीं, चैटिंग के ज़रिये आप मुझसे भी खुलकर बातें तो करोगे!”

पति  खामोश  निगाहों  से  उसे  देखता  रह गया, पर जवाब  में उसके पास  कोई  शब्द नहीं था, 

  हमारा  जीवन,  आजकल,  बिना मोबाइल  के  ,हम सोच भी नहीं सकते परंतु,  इसके साथ हमें  परिवार वालों को  कितना व्यक्त देना होगा, ये भी सोचा जाना  चाहिए, डिजिटल रिश्तों में कितना  व्यक्त बिताना  चाहिए, इसकी भी सीमा तय होना चाहिए तभी रिश्तों में प्यार और सम्मान बना  रहेगा।



                Anitasukhwal 

रविवार, 15 दिसंबर 2024

नई पीढी


 मैं बैंगलोर गयी बेटे पास ! हवाई जहाज से उतरते ही मैंने बेटा को फोन किया कि आ गयी हूं, कहां हो? मम्मी, मैं ऑफिस में हूं , आपके कैब बुक किया है , एयरपोर्ट के बाहर होगा ।जाकर बैठ जाईये ,घर का पता कैब वाले को दिया हुआ है वो घर तक आपको पहुंचा देगा।

मैं टैक्सी में बैठ गयी, और बेटे के घर पहुंची, और घर का ताला खोल दाखिल हुई। ड्राइंगरूम में सोफे पे पसर गयी थक गयी थी , थोङी देर में कालबेल बजी। दरवाजे पे डिलीवरी बाॅय खङा था कुछ खाने के पैकेट लिए।

पैकेट लिया ही था कि बेटे आकाश का फोन आया__ मम्मी आपका लंच भिजवाया है ,खा लीजिए और आराम करिए, शाम को मिलता हूं आपसे! खाना खाकर सो गयी मैं, बहुत थक  चुकी थी,व सुबह चार बजे ही पटना से बैंगलोर की फ्लाइट पकङने के लिए रात दो बजे से ही जगी हुई थी।  लेटते हीगहरी नींद आ गई थी।बेटे की आवाज आई, मम्मी ! कैैसी हो आप? हाल चाल लेता रहा, और बार बार मोबाइल पर भी ध्यान दे रहा था ।आकाश बहुत खुश था क्योंकि  मम्मी पहली बार, उसके यहाँ बैंगलोर आई थी।

दूसरे दिन सुबह उठी, तो चाय की तलब हुई, आदत थी मुझे सुबह सुबह उठकर चाय पीने की!।। पूछा कि किचन में दूध- चायपती है , चाय बना लेती  हूं।हंसकर आकाश बोला; मम्मी मैं चाय कहां पीता हूं? सोफा पे लेटे हुए मोबाइल पर उसकी उँगली तेजी से घूम रही थी। मैं चुपचाप बैठ गई , क्या करू! यहां का ,कुछ आइडिया भी नहीं ,कि बाहर जाकर चाय पी ले।खैर!अभी इसी उधेङबुन में थी, कि दरवाजे की घंटी बजी ।बेटा बोला , देखो न  मम्मी कौन है? बिचारा बेटा नींद में था और मेरे  आने से, जल्दी उठ गया था।दरवाजे पर गर्मा-गर्म चाय के साथ इडली सांभर बङा का पैकेट लेकर डिलीवरी बाॅय खङा था ।फिर हमदोनों ने नाश्ता किया ।बेटा बोला , कुछ भी जरूरत है, आप मोबाइल से ऑडर कर मंगा  सकतह हो ।आपको चाय पीने की आदत है , मै जानता था , इसलिए मंगा दिया। अपने बेटे की नवीनतम तकनीकी सुविधाजनक मोबाइल फोन ने मुझे अपनी पीढी की याद दिलाई, कि जब पापा ऑफिस से आते तो दौङकर हम सब भाई बहन, उनकी खातिर दारी में लग जाते थे ।कोई दौङकर पानी लाता,कोई नाश्ता देता, कोई जूठा बर्तन उठाता था, हमारे बीते हुए दौर में व आज की पीढी में कितना बदलाव आया है ।हमारे  समय पिता के लिए मन में आदर तो था ही,परंतु एक डर भी रहता था कि वो नाराज न हो जाए? आज की पीढी प्रैक्टिकल है व तकनीकी दुनिया में सांस ले रही है । याद आया कि मेरा टिकट भी मोबाइल से ही बुक किया था बेटे ने! अपने बेटे का ,मेरा इस तरह रखना  मुझे  बहुत स्वाभाविक सा लगा।ऐसा नहीं कि हमारे बच्चे हमारा आदर नहीं करते! बहुत प्यार करते हैं हमें ! बस  अब वक्त के साथ उनका तरीका बदल गया है। जिसको हमे समझना चाहिए, उनकी भावनाएं अब, उनके  व्यस्त वक्त के साथ  बदल गयी है, जिसको समझने मे ही सबकी भलाई है, सोच कर मैं भी मोबाइल चलाने मे खो गई|


गुरुवार, 21 नवंबर 2024

*जीवन का एक पड़ाव उम्र *

 सच कहूं तो मैं उम्र बताना नहीं चाहती हूँ,

जब भी यह सवाल कोई पूछता है,

मैं सोच में पड़ जाती हूँ,

बात यह नहीं, कि मैं,

उम्र बताना नहीं चाहती हूँ,

बात तो यह है, की,

मैं हर उम्र के पड़ाव को,

फिर से जीना चाहती हूँ,

इसलिए जबाब नहीं दे पाती हूँ,

मेरे हिसाब से तो उम्र,

बस एक संख्या ही है,

जब मैं बच्चो के साथ बैठ,

कार्टून फिल्म देखती हूँ,

उन्ही की, हम उम्र हो जाती हूँ,

उन्ही की तरह खुश होती हूँ,

मैं भी तब सात-आठ साल की होती हूँ,

और जब गाने की धुन में पैर थिरकाती हूँ,

तब मैं किशोरी बन जाती हूँ,

जब बड़ो के पास बैठ गप्पे सुनती हूँ,

उनकी ही तरह, सोचने लगती हूँ,

दरअसल मैं एकसाथ,

हर उम्र को जीना चाहती हूँ,

इसमें गलत ही क्या है?

क्या कभी किसी ने,

सूरज की रौशनी, या,

चाँद की चांदनी, से उम्र पूछी?

या फिर कल कल करती,

बहती नदी की धारा से उम्र फिर मुझसे ही क्यों?

बदलते रहना प्रकृति का नियम है,

मैं भी अपने आप को,

समय के साथ बदल रही हूँ,

आज के हिसाब से,

ढलने की कोशिश कर रही हूँ,

कितने साल की हो गयी मैं,

यह सोच कर क्या करना?

कितनी उम्र और बची है,

उसको जी भर जीना चाहती हूँ,

एकदिन सब को यहाँ से विदा लेना है,

वह पल, किसी के भी जीवन में,

कभी भी आ सकता है,

फिर क्यों न हम,

हर पल को मुठ्ठी में, भर के जी ले,

हर उम्र को फिर से, एक बार जी ले..