शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

*कभी बनाना लिस्ट*

 *कभी बनाना लिस्ट*

*...क्या क्या बनाया है बीवी ने...*

 

वो कहती है बनाने में घण्टों लगते हैं... 

और खाने में पल भर ... 

कभी कुछ बड़े जतन से बनाती है...

सुबह से तैयारी करके... 

कभी कुछ धूप में सुखा के...

तो कभी कुछ पानी में भिगो के... 

कभी मसालेदार..

तो कभी गुड़ सी मीठी... 

सारे स्वाद समेट लेती हैं ...

आलू के पराठों में, या गाजर के हलवे में, ऊपर बारीक कटे धनिये के पत्तों में, या पीस कर डाले गए इलाइची के दानों में...

सारे स्वाद समेट देती हैं एक छोटी सी थाली में...

न जाने कहाँ कहाँ से पकड़ के लाती है...

 ना जाने कितना कुछ तो होता है ...

कभी लिस्ट बनाना ... 

बीवी ने जो कुछ भी.. कभी भी बनाया है... 

तुम बना नही पाओगे...

हमें भी बस खाना ही दिखता है...

पर नहीं दिखती... 

किचन की गर्मी, 

उसका पसीना, 

हाथ में गरम तेल के छींटें, 

कटने के निशान,

कमर का दर्द,

पैरो में सूजन, 

सफ़ेद होते बाल..

कभी नहीं दिखते...,,

कभी तो ध्यान से देखो ना,,उस की छोटी से रसोई में... कोई दिखेगा तुम्हे ,,

जो बदल गया है इतने सालो में... दाँत हिले होंगे कुछ.... 

बाल झड़ गए होंगे कुछ...

झुर्रियां आयी होंगी कुछ तुम्हारे मकान को घर बनाने में,,,,,

चश्मा लगाए, हाथ में अपनी करछी, बेलन लिए जुटी होगी...

आज भी वही कर रही है.. जो कर रही है वो पिछले पच्चीस तीस सालों से, और तुम्हें देखते ही पूछेगी 

"क्या चाहिए?”... 

कभी देखना उसके मन के कुछ अनकहे ज़ज़्बात, दबी हुई इच्छाएं,,

जो दिखती नही..

क्योंकि जो दिखती नहीं, उन्हें देखना और भी ज़्यादा ज़रूरी होता है... 

जब रसोई से दो बिस्किट या रस हाथ में लेकर निकलता हूँ,, कभी उसकी गैर मौजूदगी में... 

तब उसकी बात सोचने पे मज़बूर कर देती है... क्योंकि उसने सिर्फ खाना ही नहीं बनाया है इतने सालों में... 

तुम्हें भी बनाया है...

खुद को मिटा के...

और याद है न...

बनाने में घण्टों लगते हैं..ख़तम एक बार में हो जाता है ...पूरा घर बनाया है... 

दिन रात मेहनत करके...

कभी बनाना लिस्ट और क्या क्या बनाया है बीवी ने... 

लिस्ट बन नहीं पाएगी.. 

कोशिश करना .

कभी बन नहीं पाएगी🙏😟सच में कभी नहीं बन पायेगी



शुक्रवार, 12 जुलाई 2024

*काश*




व्यतीत करना चाहती हूँ ...

सिर्फ एक दिन...

खुद के लिये...

जिसमें न जिम्मेदारियों का दायित्व हो

न कर्त्तव्यों का परायण

न कार्य क्षेत्र का अवलोकन हो

न मजबूरियोँ का समायन

बस मैं ,

मेरे पल ..

मेरी चाहतें और 

मेरा संबल

एक कप काफी से

हो मेरे दिन की शुरुआत

भीगकर अतीत के लम्हों में

खोजू अपने जज्बात

भूल गई जो जिंदगी जीना

उसे फिर से याद करु..

सबकी खातिर छोङ चुकी जो

उन ख्वाईशों की बात करु..

उलझी रहू बस स्वयं में ही

न कोई हो आस पास...

जी लू जी भर उन लम्हों को

जो मेरे हो सिर्फ खास..

मस्त मगन होकर में नाचूँ

अल्हङपन सी मस्ती में

जैसे चिङिया चहक रही हो

खुले आसमान सी बस्ती में..

मन का पहनू,

मन का खाऊं

न हो और किसी का ख्याल...

भूल गई हू जो जीना मैं

फिर से न हो मलाल..

शाम पङे सखियों से गपशप

और पानीपूरी खाऊं

डाक्टर के सारे निर्देशों को

बस एक दिन भूल जाऊँ..

मस्त हवा संग बाते करु

खुली सङक पर यूंही चलू..

बेफिक्री की राह पकङकर

अपनी बातों की धौंस धरु..

रात नशीली मेरे आंगन

इठलाती सी आये

लेकर अपनी आगोश में

चांद पूनम का दिखलायें...

सोऊं जब सपने में मुझे

वो राजकुमार आये

परियों की दुनियां से होकर

जो मेरे रंग में रंग जाये..

एकसाथ में बचपन ,

यौवन

फिर से जीना चाहती हूं..

काश! मिले वो लम्हेँ मुझको

 एक दिन अगर जो पाती हू...

मंगलवार, 2 जुलाई 2024

मेरे पापाजी

 "ऐसा भी होता था"

    "सर..मुख्य मंत्री जी फॉरेस्ट रेस्ट में ठहरे है..और रिजर्व फॉरेस्ट में शिकार कर  ..रहे. है..।"रेंजर ने आकर रिपोर्ट दी।

   याने आप भी चक्कर में होगें...किस मुख्य मंत्री की बात हो रही है?

   माफ किजीऐ..यह बात किस तरह का धमाका करने वाली बात है..यह आपको आगे मालुम होगा..

  बात करीब सन् 1963-64 की है...तब मध्य प्रदेश में मुख्य मंत्री संविद सरकार के गोविंद नारायण सिंह थे..

   उनकी आदत "अज्ञात वास "पर जाने की थी..आम  लोगों को पता न था..अज्ञातवास में माननीय करते क्या है..क्योकि उस जमाने न TVथा..मध्य प्रदेश में न ..न इतनी चैनल के 

पत्रकार..सब गोपनीय चलता था..जब मर्जी जाते..जब मर्जी जनता के बीच आ जाते..

  अब यह बात गुना जिले की है ..जहां DFOश्री एम.एम.त्रिपाठी थे..जिनके गुस्से से विभाग के  सारे कर्मचारी कांपते थे..याने वे लड्या-ततैय्या टाइप के न थे..अपितु  अत्यन्त ईमानदार थे ..सभी अधीनस्थों को मालुम था कि बेईमानी की किसी भी बात पर माफी नहीं मिलती..इसीलिए  सभी अधीनस्थ समय पूर्व हर घटना की सूचना देते थे..इसीलिए रेंजर ने मुख्य मंत्री के शिकार की रिपोर्ट की..क्योकि..गुना में वह इलाका रिजर्व फॉरेस्ट के अन्तर्गत आता था..जहां किसी को शिकार करने की अनुमति भी न थी..न कोई भी अधिकारी दे सकता था ..जो अत्यन्त दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आता था..

  अब ऐसी रिपोर्ट सुन..जो.

था तो अवैध कृत्य..क्या हुआ चाहे मुख्य मंत्री ही संलिप्त हो..वे तुरन्त SPके पास पहुंचे.और कहा-SPसाहब आप.हमारे साथCMके पास चलिए..और समझाईये कि वे ऐसा न करे..वर्ना आप जानके  है..हम उनके अपराध के खिलाफ कानूनी कार्रवाई...करेगे...!!"

   SPत्रिपाठी जी की ईमानदारी के बारे में  सब जानते थे..लेकिन वे CMके विरुद्ध भी कार्रवाई का  जिगर रखते है..सुनकर हत -प्रभ रह गये..

  तुरन्त  उनके साथ फॉरेस्ट रेस्ट हाउस मे गोविंद नारायण सिंहCM के पास..पहले अकेले जाकर धीरे से निवेदन कर ..उनकी शिकार करने  परDFOसा. की आपत्ति बताई...

  यह सुन CMभी आश्चर्य चकित रह गये..क्योकि वह जमाना और था..

   CMने DFO त्रिपाठी जी को बुलाकर पुछा..".कहिए DFOसाहब..क्या  आपत्ति है?"DFOत्रिपाठी ने कहा -"सर मुझे कोई आपत्ति नहीं है..लेकिन हाल फिलहाल वन मंत्री भी आप है..और कानून यहां Reserve  Forestमें शिकार करना जुर्म है..और कोई भी  शिकार की Permission..किसी भी हालात में नहीं दे सकता..कल को विधान सभा में सवाल उठेगा तो हम वही कहेगे जो सत्य है..और माफ करना हम कार्रवाई भी करेगे..तब आप  पुछेगे..पहले क्यो नही बताया"

  "बहुत बढिया..आप जैसे ईमानदार अफसरों की हम कदर करते है..हम फौरन यहां से अपने शिकार आदि का प्लान निरस्त कर जाते है,,देश आप जैसे बहादुर चौकीदारों से के कारण महफूज रहेगा..वर्ना आमतौर पर तो हमारी हां में हां मिलाते हुए ..किसी भी गलत बात का समर्थन करने लगते है..वे भूल जाते है ..हम राजा नहीं..जनता के चुने हुए प्रतिनिधि है"

  और वास्तव में उन्होने तत्क्षण रवानगी डाल दी।

   एस.सी.त्रिपाठी.....मुम्बई




शुक्रवार, 28 जून 2024

*सत्तर साल की मां*

 अपनी सत्तर बरस की मां को देखकर,

क्या सोचा है तुमने कभी,

कि वो भी कालेज में टाईट कुर्ती 

और स्लैक्स पहन कर जाया करती थी।


तुम सोच नहीं सकते कि

तुम्हारी माँ जब अपने घर के आँगन में

छमछम कर चहकती हुई ऊधम मचाती

दौड़ा करती तो घर का कोना-कोना 

उस आवाज़ से गुलज़ार हो उठता था


तुम नहीं सोच सकते कि 

'ट्विस्ट' डांस वाली प्रतियोगिता में,

जीते थे उन्होंने अनेकों बार प्रथम पुरुस्कार।


तुम यह भी सोच नहीं सकते कि

किशोरावस्था में वो जब भी कभी

अपने गीले बालों को तौलिए में लपेटे 

छत पर फैली गुनगुनी धूप में सुखाने जाया करती,

तो न जाने कितनी ही पतंगें 

आसमान में कटने लगा करती थी।


क्या सोचा है तुमने कभी कि 

अट्ठारह बरस की मां ने

तुम्हारे बीस बरस के पिता को 

जब वरमाला पहनाई तो मारे लाज से 

दुहरी होकर गठरी बन, उन्होंने अपने वर को 

नज़र उठाकर भी नहीं देखा था।


तुमने तो ये भी नहीं सोचा होगा कि 

तुम्हारे आने की दस्तक देती उस

प्रसव पीड़ा के उठने पर अस्पताल जाने से पहले 

उन्होंने माँग कर बेसन की खट्टी सब्जी खाई थी।


तुम सोच सकते हो क्या कि कभी,

अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि

'तुम्हें ही ' मानकर , 

अपनी सारी शैक्षणिक डिग्रियां 

जिस संदूक के अखबार के कागज़ के नीचे रख 

एकबार तालाबंद की थी, उस संदूक की चाबी 

आजतक उन्होंने नहीं ढूंढी।


और तुम उनके झुर्रीदार कांपते हाथों, क्षीण याद्दाश्त, मद्धम नजर और झुकी कमर को देख, 

उनसे कतराकर ,

खुद पर इतराते हो ?

ये बरसों का सफर है !

तुम सोच सकते भी नहीं !


(जैसे मोबाइल में हुई कुछ प्राब्लम पूछने पर चुटकियों में सुलझाता मेरा बेटा नहीं सोच सकता कि उसकी मां ने अपने कालेज के दिनों में तब प्रसिद्ध कंप्यूटर गेम 'प्रिंस आफ पर्शिया' के सारे लैवल क्लीयर कर प्रिंसैस को हासिल किया था ! और भी बहुत कुछ ऐसा है जो आने वाली पीढ़ियां बीती पीढ़ियों के विषय में शायद कभी सोच नहीं पाएंगीं !)


त‌ो जब भी खुद के रुतबे पर जब कभी गुरूर होने लगे

तब देखना अपनी मां की कोई बरसों बरस पुरानी फोटो और उतरना उनकी आंखों की गहराई में, पढ़ना उनके चेहरे की लिखावट, निहारना उनके व्यक्तित्व की लिखावट, तौलना उनके हौसलों की सुगबुगाहट।

तुम पाओगे कि आज तुम उनका दस प्रतिशत भी नहीं हो।


*मेरा यह  आर्टिकल हर माँ को समर्पित है*


*अनदेखा बहुमूल्य सहयोग*

 मम्मी यार …अपने आप को एक बार तो आईने के सामने देख लिया करो, आप तो रहने ही दो, मैं पीटीएम में पापा को लेकर चली जाऊंगी! पता है मम्मी.. मेरी सभी दोस्तों की मम्मी इतनी टिप टॉप अप टू डेट रहती हैं एक आप हो .. पता नहीं कैसे रहती हो, अब तो आपके साथ जाने में भी मुझे शर्म सी आती है!

जब मेरे दोस्त मुझसे पूछते हैं नेहा… क्या यह तुम्हारी मम्मी है तो मुझे अपने आप पर बहुत शर्म महसूस होती है, इसलिए प्लीज मम्मी आप तो घर में ही काम किया करो !कुछ ही समय बाद बेटा विपुल भी कॉलेज से आया और आते ही बरस पड़ा.. मम्मी आपको बिल्कुल भी  सलीका है या नहीं, आज आपने फिर से मेरे बैग में अचार और पराठे का टिफिन रख दिया,

मम्मी 18 साल का हो गया हूं, तथा अचार की खुशबू से मेरे सभी दोस्तों के सामने मुझे कितना शर्मिंदा होना पड़ा। मेरा कोई भी दोस्त बच्चों की तरह टिफिन लेकर कॉलेज नहीं आता, आपको कितनी भी समझा लो आपको तो कोई बात समझ में ही नहीं आती!  मेरे काम में आगे से आप हस्तक्षेप मत किया करो, मेरे सभी दोस्तों की मम्मी देखो, क्या फर्राटेदार इंग्लिश बोलती हैं,

गाड़ियां चलती हैं, और बिल्कुल आधुनिकता से जीती हैं और एक आप हो.. अपने दोस्तों की मम्मी के साथ में उनसे मिलवाने में शर्म आती है आपको! नेहा और विपुल की बात सुनकर आरती एकदम सन्न  रह गई! उसने तो कभी सपनों में भी ऐसी कल्पना नहीं की थी, आज उनके बच्चों को अपनी मम्मी से ही शर्म आ रही है! बस अब और नहीं सहा गया आरती से, बच्चे बड़े हो गए तो क्या हुआ, क्या उन्हें हक मिल गया

अपनी मम्मी की आए दिन बेइज्जती करने का, तब आरती ने भी उनको जोरदार सुना दिया ..हां मैं गवार हूं, मुझे नहीं आती इंग्लिश, न हीं मुझे आधुनिकता के साथ रहना आता है, जब मैं शादी करके इस घर में आई थी मेरी अच्छी सरकारी टीचर की नौकरी थी, किंतु तब तुम्हारे पापा और दादी ने कहा..

कि तुम अगर नौकरी करोगी तो तुम्हारे दादा दादी को कौन संभालेगा? मैंने नौकरी छोड़ दी! कुछ समय पश्चात जब दोबारा नौकरी करने की सोची तब तक विपुल मेरी गोद में आ चुका था और उसके कुछ समय बाद नेहा! और फिर तुम दोनों की जिम्मेदारियां में मैं ऐसी पिसती चली गई कि मैं अपने बारे में तो सोचना ही भूल गई,

तुम्हारे पापा ने कहा.. अगर तुम भी नौकरी करने लगोगी तो बच्चों की परवरिश कैसे होगी? बच्चों को सही दिशा कैसे मिलेगी?  फिर नौकरी के बारे में नहीं सोचा! मुझे क्या पता था कि मेरी शिक्षा या परवरिश ही आज यह रंग दिखाएगी? अरे.. मैंने तो तुम्हारी वजह से अपनी सारी खुशियां, सारी दुनिया सब छोड़ दी,

जैसा तुम लोगों को पसंद था सिर्फ वही करती रही, और जिसका सिला मुझे इस रूप में दे रहे हो! विपुल तुम्हें याद है, तुम कितना बीमार रहते थे? तुम्हें ले लेकर हम जाने कितने ही अस्पतालों के चक्कर काटते थे और फिर डॉक्टर ने कहा था कि तुम्हारे हाथ पांव में बहुत कमजोरी है तो सिर्फ मैंने.. तरह-तरह की तुम्हारी मालिश से तुमको इस लायक बनाया है, ताकि आज तुम अपनी बाइक चला सको, और नेहा तुम्हें मैंने घर पर ही इतना पढ़ाया था कि आज तुम हर कक्षा में अब्बल आती हो,

मैं तुमको यह सब सुनाना नहीं चाहती थी, नाही मैं तुमसे इस तरह की बातें सुनना चाहती हूं! अगर तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारे काम में हस्तक्षेप करती हूं या तुम्हें मेरे साथ आने-जाने में शर्म आती है तो ठीक है.. आज से तुम दोनों आजाद हो, मैं तो मैं ही पागल थी.. मेरे बच्चे, मेरे बच्चे करके रात दिन तुम्हारी चिंता में घुली जा रही हूं, तुम जब भी दोनों बहन भाई स्कूल कॉलेज से घर आते हो तुम्हारे लिए बैठी रहती हूं

कि ताकि तुम्हें गर्म खाना मिल सके, तुम्हें रखा हुआ ठंडा खाना नहीं खाना पड़े, तुम्हारे बैग में टिफिन इसलिए रखती हूं कि कहीं रोज-रोज बाहर का खाना खाने से तुम्हारी सेहत पर कोई विपरीत असर न पड़े, अरे ..मुझे क्या बल्कि अगर तुम लोग बाहर खाना खाओगे तो  मेरी तो मेहनत बचेगी ही! मैं क्यों दिन-रात रसोई में तुम्हारे लिए लगी रहती हूं!

कभी तुम्हें घर की पसंद की चीज बनाकर खिलाती हूं, कभी लड्डू , कभी क्या, चीज बनाती हूं, मैं गवार हूं इसलिए,… शायद पढ़ी-लिखी  नौकरी वाली मम्मी यह सब नहीं करती होगी, हां मुझे कार चलाना चलना भी नहीं आता, किंतु मैं घर के सारे काम खुद जाकर करती हूं, और नेहा जब तुम्हारी मैडम तुमसे कहती है कि तुम्हें पढ़ाई में कौन मदद करता है तो वह मैं हूं,

जो आज तुम इस लायक हो वह सिर्फ मेरी वजह से हो और तुम मुझे इतना जलील कर रहे हो! अरे मैंने तो इस परिवार और तुम्हारे पीछे अपनी जिंदगी के खुशनुमा पल इस घर की चार दिवारी में बर्बाद कर दिए !मैं भी चाहती तो तुम्हें किसी आया के भरोसे छोड़कर नौकरी पर जाती और मैं भी तुम्हारे दोस्तों की मम्मी की तरह होती,

पर गलती मेरी थी जो मैंने तुम्हारे बारे में, सिर्फ तुम्हारी सुख सुविधा और इस परिवार के बारे में इतना सोचा! मुझसे गलती हुई है! इसलिए मेरे प्यारे बच्चों.. हो सके तो अपनी मम्मी को माफ कर देना, तब दोनों बच्चों को महसूस हुआ कि उनकी हर कामयाबी के पीछे आज तक उनकी मम्मी का उनके द्वारा अनदेखा सहयोग ही था!

दोनों अपनी मम्मी से अपने किए पर माफी मांगने लगे, मम्मी आपने आज तक हमारे लिए इतना सब कुछ किया है बस लास्ट बार आप हमारे लिए, हमें माफ कर दो! आइंदा हम कभी भी ऐसा ना कहेंगे ना सोचेंगे, बाहर से सब कुछ देख रहे उनके पापा अपने बच्चों की माफी मांगने की हरकत पर मुस्कुरा रहे थे ,और इशारों ही इशारों में आरती से भी उन्हें माफ करने के लिए कह रहे थे।

# बच्चों और परिवार के पीछे वह खुद को भूल गई!

मंगलवार, 18 जून 2024

*घर-परिवार की रौनक*

 पूरे परिवार को एकसूत्र में 

पिरोकर रखने वाली 

सबकी चिंता और परवाह करने में मगन 

खुद के प्रति बेपरवाह रहने वाली , 

सबकी गल्तियों पर अपनी खट्टी-मीठी झिड़कियों से नसीहत देने वाली, 

राजा, चाँद और परियों की कहानियां सुनाकर 

सबको प्रेरणा देने वाली, 

मीठी लोरी गुनगुनाकर सपनों की दुनिया की

सैर करवाकर सुख की नींद सुलाने वाली ,

सादा खाने में अपने हाथों के जादू से 

स्वाद का तड़का लगाने वाली, 

रसोई-चौके में कुछ सामान न होते हुए भी, 

झट से बढिया पकवान बना डालने वाली , 

अपने हाथों के स्पर्श से पुराने सामान को 

एकदम नया सा रूप देने वाली, 

आर्थिक संकट से जूझते परिवार पर 

बरसों बरस‌ से अपने पास सहेज कर रखी गई 

बचत जमा मिनटभर में न्यौछावर कर देने वाली , 

हर अपने-पराए को हंस कर गले लगाने वाली  समझ ही गए होंगे आप भी,

ये दादी-नानी मां हर घर-परिवार की रौनक होती हैं !


लेकिन न जाने क्यों आजकल परिवार की यही रौनक अब परिवारों से दूर होकर एकाकी जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं और बच्चे इनके अस्तित्व से अंजान एक अलग ही दुनिया में पल-बढ़ रहे हैं जहां मानवीय मूल्य और संवेदनाएं लगभग लुप्त हो चुकी हैं .


कारण , एकल परिवारों का चलन और रिश्तों से अधिक पैसों को अहमियत देने वाली एक ऐसी पीढ़ी जिनके लिए ये रौनक केवल एक बोझ से बढ़कर कुछ नहीं .


लेकिन ऐसे लोगों को मैं केवल बदकिस्मत ही कह सकती हूं क्योंकि वे नहीं जानते कि उन्होंने जिसे बोझ समझ खुद से अलग कर दिया है , असल में खुद का ही नुकसान किया है .


वो उस दैवीय आशीर्वाद से वंचित रह गए हैं जो इनकी उपस्थिति मात्र से ही पूरे परिवार को हर बुरी नज़र और आपदा से बचाने की शक्ति समेटे होता है 

और इतना ही नहीं, जो लोग सोचते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ अब उनके बुजुर्गों के अनुभव व सोच भी बूढ़े हो गए हैं तो उन्हें जान लेना चाहिए कि घर की सबसे बुजुर्ग सदस्या जिसे अक्सर एक अवांछित बोझ की तरह समझा जाता है , मैंने पाया है कि उनके पास परिवार चलाने के लिए बिल्कुल एक मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ से अधिक अनुभव और कौशल होता है . इनके रहते परिवार की आर्थिक स्थिति और तमाम रिश्तों की जमा पूंजी हमेशा लाभ में ही रहती है .

इनके पास कठिन से कठिन परिस्थितियों से निपटने की अचूक क्षमता होती है .

बच्चे बीमार पड़ जाएं और महंगे डाक्टर और दवाइयों से भी सुधार न आ रहा हो तो इनके प्यार और ममता भरे स्पर्श मात्र से ही बच्चे आश्चर्यजनक रूप से ठीक हो फिर से चहक कर खिलखिला उठते हैं .

यह सब कोरी कल्पना नहीं है. मैंने इन दादी-नानी मांओं में देखी है वह ईश्वरीय शक्ति जो हर पल परिवार के साथ रहती है.

तो अभी भी वक्त है, अपने घर में देवी देवताओं को अवश्य पूजिए लेकिन घर को नानी-दादी मांओं के के रूप में मिले दैवीय आशीर्वादों से भी गुलज़ार कीजिए .

और वैसे भी वो फिर 'मां' तो हैं ही.

हां लेकिन आज भी सच में वो परिवार भाग्यवान हैं जहां इनकी रौनकों से घर चहक रहा है.

"उस घर से सुख, रौनकें और खुशहाली कभी नहीं जाती,

जहां दादी-नानी मां की खिलखिलाती हंसी और डांट की बौछार है आती !"