मंगलवार, 18 जून 2024

*घर-परिवार की रौनक*

 पूरे परिवार को एकसूत्र में 

पिरोकर रखने वाली 

सबकी चिंता और परवाह करने में मगन 

खुद के प्रति बेपरवाह रहने वाली , 

सबकी गल्तियों पर अपनी खट्टी-मीठी झिड़कियों से नसीहत देने वाली, 

राजा, चाँद और परियों की कहानियां सुनाकर 

सबको प्रेरणा देने वाली, 

मीठी लोरी गुनगुनाकर सपनों की दुनिया की

सैर करवाकर सुख की नींद सुलाने वाली ,

सादा खाने में अपने हाथों के जादू से 

स्वाद का तड़का लगाने वाली, 

रसोई-चौके में कुछ सामान न होते हुए भी, 

झट से बढिया पकवान बना डालने वाली , 

अपने हाथों के स्पर्श से पुराने सामान को 

एकदम नया सा रूप देने वाली, 

आर्थिक संकट से जूझते परिवार पर 

बरसों बरस‌ से अपने पास सहेज कर रखी गई 

बचत जमा मिनटभर में न्यौछावर कर देने वाली , 

हर अपने-पराए को हंस कर गले लगाने वाली  समझ ही गए होंगे आप भी,

ये दादी-नानी मां हर घर-परिवार की रौनक होती हैं !


लेकिन न जाने क्यों आजकल परिवार की यही रौनक अब परिवारों से दूर होकर एकाकी जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं और बच्चे इनके अस्तित्व से अंजान एक अलग ही दुनिया में पल-बढ़ रहे हैं जहां मानवीय मूल्य और संवेदनाएं लगभग लुप्त हो चुकी हैं .


कारण , एकल परिवारों का चलन और रिश्तों से अधिक पैसों को अहमियत देने वाली एक ऐसी पीढ़ी जिनके लिए ये रौनक केवल एक बोझ से बढ़कर कुछ नहीं .


लेकिन ऐसे लोगों को मैं केवल बदकिस्मत ही कह सकती हूं क्योंकि वे नहीं जानते कि उन्होंने जिसे बोझ समझ खुद से अलग कर दिया है , असल में खुद का ही नुकसान किया है .


वो उस दैवीय आशीर्वाद से वंचित रह गए हैं जो इनकी उपस्थिति मात्र से ही पूरे परिवार को हर बुरी नज़र और आपदा से बचाने की शक्ति समेटे होता है 

और इतना ही नहीं, जो लोग सोचते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ अब उनके बुजुर्गों के अनुभव व सोच भी बूढ़े हो गए हैं तो उन्हें जान लेना चाहिए कि घर की सबसे बुजुर्ग सदस्या जिसे अक्सर एक अवांछित बोझ की तरह समझा जाता है , मैंने पाया है कि उनके पास परिवार चलाने के लिए बिल्कुल एक मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ से अधिक अनुभव और कौशल होता है . इनके रहते परिवार की आर्थिक स्थिति और तमाम रिश्तों की जमा पूंजी हमेशा लाभ में ही रहती है .

इनके पास कठिन से कठिन परिस्थितियों से निपटने की अचूक क्षमता होती है .

बच्चे बीमार पड़ जाएं और महंगे डाक्टर और दवाइयों से भी सुधार न आ रहा हो तो इनके प्यार और ममता भरे स्पर्श मात्र से ही बच्चे आश्चर्यजनक रूप से ठीक हो फिर से चहक कर खिलखिला उठते हैं .

यह सब कोरी कल्पना नहीं है. मैंने इन दादी-नानी मांओं में देखी है वह ईश्वरीय शक्ति जो हर पल परिवार के साथ रहती है.

तो अभी भी वक्त है, अपने घर में देवी देवताओं को अवश्य पूजिए लेकिन घर को नानी-दादी मांओं के के रूप में मिले दैवीय आशीर्वादों से भी गुलज़ार कीजिए .

और वैसे भी वो फिर 'मां' तो हैं ही.

हां लेकिन आज भी सच में वो परिवार भाग्यवान हैं जहां इनकी रौनकों से घर चहक रहा है.

"उस घर से सुख, रौनकें और खुशहाली कभी नहीं जाती,

जहां दादी-नानी मां की खिलखिलाती हंसी और डांट की बौछार है आती !"

रविवार, 26 मई 2024

*हर पल को जीना चाहती हूं*

 *जब भी यह सवाल कोई पूछता है,*

 *मैं सोच में पड़ जाती हूँ,*


*बात यह नहीं, कि मैं,*

 *उम्र बताना नहीं चाहती हूँ,*

 *बात तो यह है, की,*

 *मैं हर उम्र के पड़ाव को,*

 *फिर से जीना चाहती हूँ,*

 *इसलिए जबाब नहीं दे पाती हूँ,*


*मेरे हिसाब से तो उम्र,*

 *बस एक संख्या ही है,*


*जब मैं बच्चो के साथ बैठ,*

 *कार्टून फिल्म देखती हूँ,*

 *उन्ही की, हम उम्र हो जाती हूँ,*

 *उन्ही की तरह खुश होती हूँ,*

 *मैं भी तब सात-आठ साल की होती हूँ,*


*और जब गाने की धुन में पैर थिरकाती हूँ,*

 *तब मैं किशोरी बन जाती हूँ,*


*जब बड़ो के पास बैठ गप्पे सुनती हूँ,*

 *उनकी ही तरह, सोचने लगती हूँ,*


*दरअसल मैं एकसाथ,*

 *हर उम्र को जीना चाहती हूँ,*


*इसमें गलत ही क्या है?*

 *क्या कभी किसी ने,*

 *सूरज की रौशनी, या,*

 *चाँद की चांदनी, से उम्र पूछी?*


*या फिर खल खल करती,*

 *बहती नदी की धारा से उम्र पूछी?*


*फिर मुझसे ही क्यों?*


*बदलते रहना प्रकृति का नियम है,*

 *मैं भी अपने आप को,*

 *समय के साथ बदल रही हूँ,*


*आज के हिसाब से,*

 *ढलने की कोशिश कर रही हूँ,*


*कितने साल की हो गयी मैं,*

 *यह सोच कर क्या करना?*


*कितनी उम्र और बची है,*

 *उसको जी भर जीना चाहती हूँ,*


*एकदिन सब को यहाँ से विदा लेना है,*

 *वह पल, किसी के भी जीवन में,*

 *कभी भी आ सकता है,*


*फिर क्यों न हम,*

 *हर पल को मुठ्ठी में, भर के जी ले,*

 *हर उम्र को फिर से, एक बार जी ले..*





शुक्रवार, 24 मई 2024

*मिलने की उम्मीद*

 बहुत पछताती हूँ जब उनका फ़ोन नहीं उठा पाती, जब उनके बीमार होने पर उनके पास नहीं जा पाती हूँ तब बेटी के रूप में खुद को हारा हुआ पाती हूँ। 


सोचती हूँ कभी कितने ओहदे पाए मैंने बहन, बहु, पत्नी, माँ, गुरु, लेखक लेकिन सबसे ज्यादा हारा हुआ मैंने बेटी को पाया है।

हारा हुआ देखा मैंने खुद को जब जब भी मैं उनके पास नहीं थी एक बूँद पलकों पर आने से पहले जो समेट लेती मुझे आँचल में कभी रोई होगी सिसकियाँ भर कर अँधेरे में, उस वक़्त मैं उसके साथ नहीं थी।

जो मेरे लिए छप्पन व्यंजन बना7ती तो मैं नखरे कर एक कौर खाती

जो सौ आवाजों पर नहीं उठती मैं, फिर भी प्यार से मेरा सर सहलाती

बिजली की तरह अब सरपट आदेशों की पालन करती नज़र आती हूँबेटी के रूप में खुद को हारा हुआ पाती हूँ।

बहुत पछताती हूँ जब गृहस्थी में उलझी उनका फ़ोन नहीं उठा पाती

“बस काम में लग गयी थी”, उनके चौथे फ़ोन पर भी इतना ही कह पाती हूँ,याद करती हूँ वो ज़माना जब सब कुछ ज़रूरी छोड़ वो मेरे पास बैठ जाया करते “अरे काम तो होता रहेगा” पापा बड़ी आसानी से कह जाया करते उस वक़्त में खुद को बहुत छोटा पाती हूँ बेटी के रूप में खुद को हारा हुआ पाती हूँ।

पुरानी और बेमेल रंगों से बनी वो प्रतिच्छाया भी मेरी जब आज भी तुम सहेजे रख लेती हो “कितनी पुरानी  है माँ ये, इसे फेंकती क्यूँ नहीं?” कहा मैंने और तुम उतने ही प्रणय से उसे अपने सीने से लिपटा लेती हो मेरा मन बंट गया है कितनों में, पर आज भी तुम्हारे मन पर मेरा एकाधिकार पाती हूँ उस वक़्त, बेटी के रूप में खुद को हारा हुआ पाती हूँ।

“मैं आ रही हूँ कल घर पर”, सुनते ही, मेरे आने से पहले ही भरे बाज़ार से कैसे उस पतली गली के कोने वाली दुकान से पापा “अभी फ्रेश बना हुआ” मावा लेने पहुँच जाया करते हैं चार दिन दिवाली हो ऐसे जताया करते हैं जब उनके बीमार होने पर उनके पास नहीं जा पाती हूँ उस वक़्त, बेटी के रूप में खुद को हारा हुआ पाती हूँ।

भरी आँखें और फिर मिलने की उम्मीद, जब घर छोड़ते हुए देखती हूँ रूककर फिर से उन्हें गले नहीं लगा पाती जिम्मेदारियों का चोला और ये मीठे रिवाज़ मुझे फिर उतरकर उनके पास नहीं जाने देते अंतरमन में दहाड़ कर रोते हुए भी उन्हें बचपना ना करने की बनावटी नसीहत देती हूँ उस वक़्त मैं बेटी के रूप में खुद को हारा हुआ पाती हूँ।







*सासु माँ का साथ एक आशीर्वाद*

“ बेटा सुन आज आते वक्त मेरा एक काम कर देगा?” दमयंती जी ने सोमेश से पूछा 

“ हाँ माँ बोलो ना क्या काम है?” सोमेश ने कहा 

उधर रसोई में काम करती रचिता मन ही मन बुदबुदा रही थी.. जब से आई है जरा पल भर का सुकून नहीं है… कभी चाय कभी पानी तो कभी दवा बस अपने आगे पीछे लट्टू की तरह घुमाए रखती हैं… कल मेरा जन्मदिन है वो भी इनकी सेवा में बीत जाना.. कितना मन था सुबह मंदिर जाकर पूजा करूँगी फिर शाम को सोमेश के साथ किसी मॉल में शॉपिंग और डिनर कर घर आते …पर ये है ना महारानी जी इनके रहते हम बाहर कैसे जा सकते ….बाहर का खाना तो इन्हें हज़म नहीं होगा …पहले पकाओ फिर कही जाओ.. कितना अच्छा था ये उधर अपने घर में ही रहती थी…।

उधर दमयंती जी से बात कर सोमेश ऑफिस चला गया पूरे दिन रचिता मन ही मन सास को जली कटी सुनाती रही …ना अच्छे से बात की ना दो घड़ी उनके पास बैठी…. सोमेश ही माँ को ज़िद्द कर साथ ले आया था जब इस बार घर गए थे अब तो सास यही रहेंगी… सारी आज़ादी ख़त्म … सोच सोच कर रचिता को कोफ़्त हो रही थी ।

रात सोमेश जब घर आया तो पहले माँ से मिलने गया फिर चाय नाश्ता किया ।।

रात को खाने के बाद जब सब सोने जा रहे थे दमयंती जी ने रचिता को कमरे में बुलाया 

“ बहू कल तुम्हारा जन्मदिन है ना… ये लो सलवार सूट… सोमेश से कहा था तुम्हारी पसंद का ही लाए… कल सुबह तुम उठ कर मंदिर चली जाना… नाश्ते खाने की चिंता ना करना वो मैं देख लूँगी… कल सोमेश की तो छुट्टी है नहीं पर जब वो ऑफिस से आ जाए तुम उसके साथ बाहर घूम आना।” दमयंती जी एक पैकेट रचिता को देती हुई बोली 

“ पर माँ आपको कैसे पता मैं मंदिर जाती हूँ नए कपड़े पहन कर?” आश्चर्य से रचिता ने पूछा 

“ बहू तुम हर बार मंदिर से निकल कर ही तो फ़ोन कर आशीर्वाद लेती हो तो कैसे याद नहीं रहेगा..।”दमयंती जी ने कहा

रचिता पैकेट लेकर सास को प्रणाम कर जाने लगी तो दमयंती जी बोली,“ बहू तुम जैसे पहले रहती थी वैसे ही रहो..मेरी वजह से परेशान मत हुआ करो.. बस जब से यहाँ आई हूँ तो लगता है घर में कोई तो है… तो बस तुम्हें अपने आसपास रखने को तुमसे कुछ ना कुछ करवाती रहती हूँ…..वहाँ घर पर तो अकेले ही रह रही थी ना।” 

“ जी माँ ।” रचिता बस इतना ही कह पाई… 

बाहर सोमेश ये सब खड़े होकर सुन रहा था जैसे ही रचिता अपने कमरे में पहुँची सोमेश ने कहा,“ जब से माँ आई है तुम कभी भी उससे ना तो ठीक से बात करती हो ना तुम्हें उसके पास बैठना पसंद है और जब तब जो माँ के लिए जली कटी मुझे सुनाती रहती हो बता नहीं सकता कितनी पीड़ा होती हैं….पर जब माँ ने मुझे कहा कल बहू का जन्मदिन है उसके लिए एक सूट ला देना और मुझे पैसे भी दिए मना करने लगा तो बोली तू अपनी तरफ़ से जो देना दे ….ये मेरी तरफ़ से ला देना…अब बताओ माँ के मन में तुम्हारे लिए क्या है… और तुम्हारे मन में माँ के लिए क्या?” 

“ मुझे माफ कर दो सोमेश मैं माँ को समझ ही नहीं पा रही थी वो जब से यहाँ आई मुझे लग रहा था मेरा काम बढ़ गया है पर ये नहीं सोच पाई वो अपने अकेलेपन की वजह से मुझे अपने आसपास रखती थी… कल माँ को भी मॉल लेकर चलेंगे…ठीक है ना?” रचिता ने शर्मिंदा होते हुए कहा 

“ चलो जल्दी ही समझ आ गया नहीं तो मैं सोच रहा था मेरी माँ का क्या होगा?” सोमेश रचिता को देखते हुए बोला 

“ कुछ नहीं होगा अब माँ अपनी बहू के साथ अच्छे से रहेंगी तुम देख लेना।” रचिता कह कर सो गई 

कल की सुबह उसे माँ समान सास से आशीर्वाद भी तो लेना था… इधर सोमेश अब माँ को लेकर थोड़ा बेफ़िक्र हो गया था ।

साभार

(रश्मि प्रकाश जी की कहानी )

रविवार, 31 दिसंबर 2023

*बरसों का सफर*

 अपनी सत्तर बरस की मां को देखकर,

क्या सोचा है तुमने कभी,

कि वो भी कभी कालेज में टाईट कुर्ती 

और स्लैक्स पहन कर जाया करती थी !

तुम हरगिज़ नहीं सोच सकते कि

तुम्हारी माँ जब अपने घर के आँगन में

छमछम कर चहकती हुई ऊधम मचाती

दौड़ा करती तो घर का कोना-कोना 

उस आवाज़ से गुलज़ार हो उठता था !

तुम नहीं जानते कि 'ट्विस्ट' डांस वाली प्रतियोगिता में,

जीते थे उन्होंने अनेकों बार प्रथम पुरुस्कार !

किशोरावस्था में वो जब भी कभी

अपने गीले बालों को तौलिए में लपेटे 

छत पर फैली गुनगुनी धूप में सुखाने जाया करती,

तो न जाने कितनी ही पतंगें 

आसमान में कटने लगा करती  थी !

क्या सोचा है तुमने कभी कि अट्ठारह बरस की मां ने

तुम्हारे बीस बरस के पिता को 

जब वरमाला पहनाई तो मारे लाज से 

दुहरी होकर गठरी बन, उन्होंने अपने वर को 

नज़र उठाकर भी नहीं देखा था!

तुमने तो ये भी नहीं सोचा होगा कि 

तुम्हारे आने की दस्तक देती उस

प्रसव पीड़ा के उठने पर अस्पताल जाने से पहले 

उन्होंने माँग कर बेसन की खट्टी सब्जी खाई थी !

तुम सोच सकते हो क्या कि कभी,

अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि

तुम्हें मानकर , अपनी सारी शैक्षणिक डिग्रियां 

जिस संदूक के अखबार के कागज़ के नीचे रख 

एकबार तालाबंद की थी, उस संदूक की चाबी 

आजतक उन्होंने नहीं ढूंढी !

और तुम उनके झुर्रीदार कांपते हाथों, क्षीण याद्दाश्त, मद्धम नजर और झुकी कमर को देख, 

उनसे कतराकर ,

खुद पर इतराते हो ?

ये बरसों का सफर है !

तुम सोच सकते भी नहीं ,,

🙏🙏

सुजाता,,,

बुधवार, 6 दिसंबर 2023

*संकीर्ण विचार*

 जब अर्चना इवनिंग वॉक से घर लौटीं, तो उनके साथ एक सज्जन भी थे, जो अर्चना के ही हमउम्र थे. अर्चना अपनी बहू सांची से उस सज्जन का परिचय कराती हुई बोलीं, "सांची, ये हैं विवेक गुप्ता, मेरे कॉलेज फ्रेंड."

यह सुन सांची को हैरानी मिश्रित ख़ुशी हुई, इतने सालों में कभी भी अर्चना ने इस नाम का ज़िक्र नहीं किया था. हां, सांची की शादी के वक़्त अवश्य कुछ महिलाओं से अर्चना ने सांची को यह कहकर मिलवाया था कि ये मेरी स्कूल और कॉलेज फ्रेंड्स हैं, लेकिन उनमें कोई भी पुरुष मित्र नहीं था.

सांची ने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था और ना उसे कभी ऐसा लगा कि उसकी सासू मां का भी कोई पुरुष मित्र होगा या हो सकता है. यहां इस भोपाल शहर में अर्चना की कुछ सहेलियां ज़रूर थीं, जो अक्सर घर आती-जाती रहती थीं, लेकिन वे सभी आस-पड़ोस की महिलाएं और अर्चना के स्वर्गवासी पति के मित्र व सहकर्मी की पत्नियां ही थीं, जिन्हें सांची बहुत अच्छी तरह से जानती थी. सांची के लिए ये विवेक गुप्ता नया नाम था, लेकिन उसके बावजूद सांची ने उस शख़्स को पूरे सम्मान के साथ बैठने का आग्रह किया और उसके बाद अर्चना से बोली, "मम्मीजी, आप बातें कीजिए मैं चाय लेकर आती हूं."

सांची इतना कहकर मुड़ने ही वाली थी कि अर्चना बोली, "सांची, चाय केवल मेरे लिए ही लाना, विवेक के लिए ब्लैक कॉफी ले आओ." ऐसा कहकर अर्चना हंसती हुई विवेक की ओर देखकर बोली, "क्यों ठीक कह रही हूं ना." इस पर विवेक भी हंसता हुआ बोला, "अरे वाह! अर्चु आज भी तुम्हें मेरी पसंद याद है."

अर्चना भी चहकती हुई बोली, "हां, भला कैसे भूल सकती हूं. कॉलेज कैंटीन में हमने घंटों जो साथ बिताए हैं."

अर्चना का इतना कहना था कि दोनों ठहाके मार कर हंसने लगे. विवेक के मुंह से अर्चु और अर्चना से कॉलेज कैंटीन सुन कर कुछ पल के लिए सांची के पांव की गति स्वत: ही धीमी हो गई और उसके कान खड़े हो गए. इधर अर्चना और विवेक इस बात से बेख़बर कॉलेज में बिताए अपने दिनों को स्मरण करके आनंदित हो रहे थे. उधर सांची किचन में ज़रूर थी, परन्तु उसका पूरा ध्यान हॉल में बैठे अर्चना और विवेक की बातों की ओर ही था. यह अलग बात थी कि उसे दोनों के बीच होते वार्तालाप ठीक से सुनाई नहीं दे रहे थे, केवल हंसने की आवाज़ ही सांची के कानों तक पहुंच रही थी.

चाय, कॉफी और कुछ नमकीन के साथ जब सांची हॉल में पहुंची, तो उसने देखा अर्चना और विवेक बिंदास किसी बात पर हंस रहे हैं. अर्चना के चेहरे पर ऐसी हंसी सांची तभी देखती, जब अर्चना की स्कूल व कॉलेज फ्रेंड मालिनी आंटी अर्चना से मिलने आती, वरना बाकी लोगों के संग मिलकर अर्चना के होंठों पर मुस्कान तो ज़रूर होती, किन्तु यह बेबाक़पन और बिंदास हंसी कभी दिखाई नहीं देती.

आज अर्चना की आंखों में चमक और चेहरे पर निश्छल हंसी थी. यह देख सांची को समझने में वक़्त नहीं लगा कि जो शख़्स उसकी सासू मां के साथ बैठा है वह उसकी सासू मां का सच्चा व गहरा मित्र है, क्योंकि सांची यह बात भली-भांति जानती थी कि कोई भी इंसान दिल खोलकर केवल अपने सच्चे दोस्त के समक्ष ही हंसता या फिर रोता है.

काफ़ी देर गप्पे मारने के पश्चात विवेक बोला, "अच्छा अर्चु अब मैं चलता हूं, कल मिलते हैं इवनिंग वॉक पर." इतना कहकर विवेक ने दरवाज़े का रूख किया और अर्चना अपने कमरे की ओर चली गईं. विवेक का घर से बाहर निकलना हुआ और उसी वक़्त अर्चना का बेटा यानी सांची के पति संदीप का आना हुआ. अपने घर से किसी अनजान व्यक्ति को निकलता देख संदीप को थोड़ा आश्चर्य हुआ. घर के अंदर आते ही संदीप ने सांची से पूछा, "ये हमारे घर से अभी-अभी जो बंदा बाहर गया वो कौन था..?"

संदीप का ऑफिस बैग अपने हाथों में लेती हुई सांची बोली, "ये विवेक गुप्ताजी थे मम्मीजी के कॉलेज फ्रेंड."


यह सुनते ही संदीप के चेहरे का भाव थोड़ा बदल गया और वह आश्चर्य से बोला, "मम्मी के फ्रेंड? विवेक गुप्ता! यह नाम तो पहले कभी नहीं सुना, लेकिन ये आए क्यों थे?"

"ये आए नहीं थे, मम्मीजी इन्हें लेकर आई थीं."

"क्यों..?" अभी सांची इस क्यों का कोई जवाब संदीप को दे पाती, इससे पहले ही अर्चना हॉल में आ पहुंचीं और संदीप के क्यों का जवाब देती हुई बोली, "क्योंकि विवेक गुप्ता मेरा फ्रेंड है और उसे मेरा घर देखना था."

अर्चना से यह जवाब सुन संदीप स्वयं को संयमित करते हुए बोला, "आपका फ्रेंड, लेकिन मम्मी आज से पहले तो ये हमारे घर कभी नहीं आए और ना ही आपने कभी इनकी चर्चा की, फिर आज अचानक…"

इतना कहकर संदीप बीच में ही रुक गया, तभी अर्चना संदीप की बातों व आंखों में संदेह देखकर बोलीं, "अचानक नहीं बेटा पिछले एक सप्ताह से विवेक को मैं घर लाने की सोच रही थी, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था. आज समय मिला, तो सोचा ले चलती हूं. और रही बात पहले कभी विवेक की ज़िक्र ना करने की, तो ऐसा है कि कभी ऐसा कोई प्रसंग ही नहीं आया कि मैं विवेक की चर्चा करती. वैसे भी कॉलेज के बाद विवेक ऑउट ऑफ इंडिया चला गया और मेरी शादी हो गई. अब जा कर मिला है इतने सालों बाद. तुम्हें पता है विवेक भी हमारी ही सोसायटी के ए विंग में अपने बेटा-बहू और पोते के साथ रहता है."

अर्चना अपने बेटे संदीप को कुछ इस तरह से सफ़ाई दे रही थी मानो उसने विवेक को घर बुलाकर कोई गुनाह कर दिया हो. तभी सांची बोली, "अच्छा हां, ए विंग में मैंने सुना तो है कोई गुप्ता फैमिली आई है, तो क्या ये विवेक अंकल की फैमिली है." अभी यह सारी बातें हो ही रही थी कि संदीप वहां से चला गया और बात आई गई हो गई.

अब रोज़ इवनिंग वॉक पर अर्चना और विवेक का सोसाइटी पार्क पर मिलना, बातें करना, साथ वक़्त गुज़ारना अर्चना के बेटे संदीप को नागवार गुज़रने लगा और वही स्थिति विवेक के बेटा-बहू की भी थी. उन्हें भी अर्चना और विवेक की दोस्ती अपनी बदनामी से ज़्यादा कुछ नही लग रही थी.

संदीप ने सांची से क‌ई बार कहा कि वह अर्चना को विवेक गुप्ता से दूर रहने को कहे, लेकिन सांची हर बार संदीप की बातों को अनसुना कर देती, क्योंकि उसे कभी भी नहीं लगा कि अर्चना और विवेक की दोस्ती में कुछ ग़लत है. सोसाइटी में भी अब अर्चना और विवेक को लेकर कानाफूसी और तरह-तरह की बातें होने लगी, जो उड़ती हुई दोनों परिवारों के कानों तक भी पहुंचती, परंतु अर्चना और विवेक इन बातों से बेख़बर अपनी दोस्ती और पुराने दोस्तों के संग रियूनियन पार्टी प्लान करने में लगे हुए थे. एक शाम अचानक इन्हीं सब बातों को लेकर संदीप ग़ुस्से से तमतमाता हुआ घर पहुंचा, तो उसने देखा अर्चना और सांची पैकिंग कर रही हैं. यह देख संदीप ग़ुस्से में सांची से बोला, "यह सब क्या हो रहा है और तुम ये मम्मी का सूटकेस क्यों पैक कर रही हो."

संदीप को इस प्रकार ग़ुस्से में देख, उसे शांत कराती हुई सांची प्यार से समझाते हुए संदीप से बोली, "मम्मीजी सागर जा रही है रियूनियन पार्टी के लिए."

यह सुनते ही संदीप का पारा चढ़ गया और वह ऊंची आवाज़ में बोला, "उस विवेक गुप्ता के साथ… मम्मी आप का दिमाग़ तो ठिकाने पर है. ज़रा सोचिए लोग क्या कहेंगे. आपको कुछ पता भी है सोसाइटी में आपके और उस विवेक गुप्ता के बारे में लोग क्या-क्या बातें बना रहे हैं. अपनी नहीं तो कम-से-कम हमारी इज्ज़त का तो ख़्याल कीजिए."

अभी संदीप अपने मन की भड़ास अर्चना पर निकाल ही रहा था कि विवेक के बेटा-बहू अमित और साक्षी भी अर्चना के घर आ धमके और अर्चना को भला-बुरा कहने लगे.

विवेक का बेटा अमित अर्चना पर आरोप लगाते हुए बोला, "मेरी मम्मी को दिवंगत हुए सालों बीत गए हैं, लेकिन मेरे पापा ने कभी भी किसी औरत की तरफ़ आंख उठाकर नहीं देखा और आज आपसे मिलते ही अपना मान-सम्मान सब भुला कर, हमारी मुंह पर कालिख पोत कर आपके साथ सागर जाने की तैयारी कर रहे हैं."

अर्चना का अपना बेटा संदीप भी दूसरे लोगों की कही बातों में आकर अपनी मां का अपमान कर रहा था, सब मिलकर अर्चना पर लांछन लगाने और उसके चरित्र पर उंगली उठा रहे थे, अर्चना डबडबाई आंखों से ख़ुद को कठघरे में खड़े किसी मुजरिम की तरह चुपचाप सब सुन रही थी. यह देखकर सांची से रहा नहीं गया और वह चीखती हुई बोली, "बस करिए… आप में किसी को भी इस तरह मम्मीजी पर लांछन लगाने का कोई अधिकार नहीं है. मम्मीजी और विवेक अंकल अच्छे दोस्त हैं. जब एक स्त्री मां हो सकती है, बेटी हो सकती, बहन हो सकती है, प्रेमिका और पत्नी हो सकती है, तो दोस्त क्यों नहीं..? और वह क्यों अपने दोस्त के साथ कहीं नहीं जा सकती."


सांची से यह सब सुन विवेक की बहू साक्षी की भी आंखें खुल गई और वह भी जो अब तक अर्चना पर आरोप लगा रही थी अर्चना के संग आ खड़ी हुई और अपने पति अमित से बोली, "सांची बिल्कुल सही कह रही है, आंटीजी क्यों नहीं जा सकती पापाजी के साथ. जब आप अपनी रियूनियन पार्टी में अपनी फ्रैंड शिल्पा के साथ जा सकते हो तो पापाजी और मम्मीजी भी जा सकते हैं."

सांची और साक्षी को अर्चना के पक्ष में देख कर संदीप बौखला गया और गुर्राता हुआ बोला, "बंद करो तुम दोनों अपना ज्ञान का पिटारा. ईश्वर आराधना और हरी भजन करने की उम्र में अपने पुरुष या महिला मित्र के साथ घूमना-फिरना शोभा नहीं देता और ना ही एक मां को पुरुष मित्र बनाने की इजाज़त हमारा समाज देता है."

संदीप की संकीर्ण विचारों को सुन कर अर्चना का हृदय द्रवित हो उठा. उसकी आंखों में अब तक ठहरा पानी बह निकला और वह अपना सूटकेस पैक करती हुई सोचने लगी कि कहने को तो हम इक्कीसवीं सदी में पहुंच गए हैं, लेकिन आज भी स्त्री-पुरुष को लेकर हमारे समाज की मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है, लेकिन अब बदलना होगा… यदि हम बदलाव चाहते हैं, तो हमें स्वयं बदलाव की ओर अपना पहला कदम आगे बढ़ाना होगा. इसी सोच के साथ अर्चना हाथों में सूटकेस लेकर घर से निकलती हुई सांची और साक्षी से बोली, "बेटा, मेरी गाड़ी का समय हो गया है मैं निकलती हूं." 

बुधवार, 15 नवंबर 2023

*समय का दान *

    मीना इतवार को तो तेरी छुट्टी होती है फिर कहां से आ रही है। पिछले रविवार भी मैंने देखा था सुबह सुबह भाग रही थी ।"सरोज ने अपनी पड़ोसन मीना से पूछा ।

"बस कुछ खास नहीं । मैं हर इतवार को महिला वृद्धाश्रम जाती हूं ।"मीना ने कहा ।

"क्या  तेरा कोई रिश्तेदार है वहां?" सरोज ने जिज्ञासा से पूछा। 

"भगवान न करें कोई रिश्तेदार वहां जाए।" मीना ने आसमान की तरफ हाथ जोड़ते हुए ठंडी सी आवाज में कहा। 

"फिर रिश्तेदार नहीं तो रोज-रोज क्यों जाती है?" सरोज ने फिर प्रश्न दागा।

" अब तो समझो रिश्तेदार ही है।" "क्या मतलब?" सरोज ने माथे पर बल से डालते हुए पूछा। 

"मेरी मैडम अक्सर महिला वृद्धाश्रम जाती है। उन महिलाओं को कुछ खाने का या पहनने ओढ़ने का सामान देकर आती है। इसी साल जनवरी में हम, मुझे वह हमेशा अपने साथ लेकर जाती है जब वृद्धाश्रम उन महिलाओं को गरम शॉल बांटने गए। तो सभी महिलाओं ने ले ली। परंतु एक संभ्रांत सी वृद्ध महिला ने शाल लेने से इनकार किया और मुदिता मैडम की बाह पकड़ कर कमरे की तरफ ले जाते हुए कहने लगी ।आप प्लीज मेरे साथ आए एक बार , सिर्फ 5 मिनट के लिए। एक अजीब सी कशिश थी उसके कहने और ले जाने में। हम दोनों ही उसके साथ चल दी। कमरे में जाकर उसने अपने बेड के नीचे से एक बड़ा सा ट्रक निकालकर खोला तो हमने देखा उसमें ढेरों गरम बहुत सुंदर नई शॉल रखी थी। उसका नाम गायत्री है। वह कहने लगी, मेरे पास कपड़ों की कोई कमी नहीं । अगर बेटा दे सकती है तो कभी-कभी थोड़ा समय मुझे दे दिया कर। मुदिता मैडम एकदम बोली , "क्या मतलब समय से?   गायत्री ने कहा," मेरे से कभी कभी बात कर लिया कर। आ सको तो, तुम्हारा बहुत एहसान बेटा,  नहीं तो फोन पर ही बात कर लिया कर । मुझे भी लगे मेरा कोई है। मुझसे मिलने आने वाला, बात करने वाला।" वो कहकर चुप हो गई और एक आस के साथ मैडम को देखने लगी। मैं अपने आंसुओं को बड़ी मुश्किल से रोक पाई। मैं जो हमेशा यह सोच सोच कर दुखी होती थी कि भगवान ने मेरे को तो इतना पैसा नहीं दिया कि कुछ दान कर सकूं। गायत्री देवी की इस बात ने एक पल में मुझे राहत दे दी।" मीना जो लगातार सरोज को बता रही थी उसे  सरोज ने बीच में ही टोका ," वह कैसे"? अब मैं हर इतवार  सुबह 9:30 से 12:30 बजे तक अपना समय महिला वृद्ध आश्रम में बिताती हूं । उन महिलाओं के साथ , खासकर गायत्री देवी के साथ ।"मीणा की आवाज में एक अजीब सी खुशी और सुकून था।

     डॉ अंजना गर्ग द्वारा लिखी गई