बुधवार, 4 मार्च 2020

**मेने पूछा**

पूछा मेने आइनेसे,  बता कैसी लगती हु?
निहार कर कूछ देर बोला......
मस्तिष्क पर रेखाएं नजर आ रही है,
पर इनमें फ़िक्र अपनो की है।
आखो में काजल सजी नही, नीचे डार्क सर्कल है,
 अपनो के लिये तू ठीक से सोई नहीं है।
कानो में पहनी बाली नहीं,
 पर तूने अनकहा सुनने का हुनर आगया है।
होठोपे सजी लाली नही,
 पर तेरे बोल मे प्यार झलकता है।
नाखून टूटे बेरंग है,पर हाथों मे स्वाद आगया है।
तोंद थोड़ीसी बाहर आगई है,
 यह खुद को समय ना देने का नतीजा है।
कमर तेरी कमसीन ना सही,
 तूने झुकना सिख लिया है।
घुटनों में थोड़ा दर्द है,
 पर घरमे, दौड़ तेरी मेराथन वाली है।
तू कल भी खूबसूरत थी, आजभी है....
  कल तू चंचल राधा थी, आज लक्ष्मी हो गई है।
     

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

***खुशी की असली वजह***

उसने कहा- बेवजह ही
खुश हो क्यों?
मैंने कहा- हर वक्त
दुखी भी क्यों रहूँ !

उसने कहा- जीवन में 
बहुत गम हैं,
मैंने कहा -गौर से देख,
खुशियां भी कहाँ कम हैं।

उसने तंज़ किया -
ज्यादा हँस मत,
नज़र लग  जाएगी,
मेरा ठहाका बोला-
चिकनी हूँ, 
फिसल जाएगी।

उसने कहा- नहीं होता
क्या तनाव कभी ?
जवाब दिया- मैंने ऐसा
तो कहा नहीं!

उसकी हैरानी बोली-
फिर भी यह हँसी?
मैंने कहा-डाल ली आदत
हर घड़ी मुसकुराने की!

फिर तंज़ किया-अच्छा!!
बनावटी हँसी, इसीलिए
परेशानी दिखती नहीं।
मैंने कहा-
अटूट विश्वास है,
प्रभु मेरे साथ है,
फिर चिंता-परेशानी की
क्या औकात है।
कोई मुझसे "मैं दुखी हूँ"
सुनने को बेताब था,
इसलिए प्रश्नों का
सिलसिला भी
बेहिसाब था

पूछा - कभी तो
छलकते होंगे आँसू ?
मैंने कहा-अपनी
मुसकुराहटों से बाँध
बना लेती हूँ,
अपनी हँसी कम पड़े तो
कुछ और लोगों को
हँसा देती हूँ ,
कुछ बिखरी ज़िंदगियों में
उम्मीदें जगा देती हूँ...
यह मेरी मुसकुराहटें
दुआऐं हैं उन सबकी
जिन्हें मैंने तब बाँटा,
जब मेरे पास भी
कमी थी।

शनिवार, 4 जनवरी 2020

* यादो की हरियाली*

मेरे घर के अनगिन बढ़ती, अलमारियों के बीच
एक मेरी  अपनी अलमारी है,
मेरी नितांत अपनी निजी ,अलमारी, जिसे खोल कर मेरा,साड़ियों को उलटना पलटना  देखना,हर तीसरे - चौथे महीने की घटना है।
आज फिर खोला मैंने अपना पिटारा
कहीं शिफॉन कहीं बंधेज कहीं चंदेरी है कहीं बनारसी रंगीन झिलमिल कोमल रेशमी साड़ी,
मेरे कमरे में फैली यह दुनिया मेरी अपनी  है।
जब खोलो अलमारी, श्रीमान जी जरूर कमरे में चले आते हैं।
'बाप रे , इतनी साड़ियां!' ऑंखें फैला कर बुदबुदाते हैं।
क्या करोगी इनका? बस अच्छी अच्छी छांट दो।
बाकी जो नहीं पहनती गरीबों में बाँट दो।
जवाब में यही कहती हूँ, सुनो जी,बाहर जाओ,
पहले ही कम हैं, तुम नज़र मत लगाओ।
वे हंस कर चले जाते हैं, जेंटलमैन जो ठहरे।
पर यह बात , भीतर कहीं गहरे मेरे,लग जाती थी,लाओ देख ही लूँ , क्या पता कुछ निकल आये,सालों से न पहनी हुई कोई साड़ी किसी गरीब का तन ढकने के काम तो जरूर आयेगी।
देखो तो यह लाल सितारों जड़ी रंगीन बॉर्डर वाली साड़ी ,पर यह तो माँ ने पहली तीज पर दी थी।काली सफ़ेद प्योर शिफॉन अपनी पहली तनख्वाह से बहू ने दी थी। यह भारी भरकम बनारसी पहन कर मैं विदा हो ससुराल आयी थी।और यह हलकी फुल्की लहरिया मैं जोधपुर से लायी थी।यह पीली माहेश्वरी साड़ी श्रीमान जी खुद पसंद कर महू से मेरे लिए लाये थे।
और वो नीली लिनन मेरी पसंद से ऑनलाइन ,उन्होंने ही मंगाई थी।वेलफेयर और किट्टी की साड़ियों का अलग हिसाब है।सर्दी में सिल्क और गर्मी में शिफॉन का अपना शुरू से ही फौजी रुआब है। एक दो बेकार सी साड़ियाँ हैं, जिन्हे लायी थीं मेरी सहेलियां और रिश्तेदार ,मेरे दिल में बसी हैं ये, चाहे मैं इन्हे पहनूं या ना पहनूं।
सासुमा की दी हुई कई एक हैं, कुछ पसंद कुछ नापसंद,यही बाँट आउंगी,पर वो सालों बाद भी पूछ बैठेंगी तो उनका दिल कैसे दुखाऊँगी?
फिर हैं जो साड़ियाँ, वो मां और सास से उधार ली हुई,वापस करुँगी सोचा है, पहन पहन कर हैं रखी हुई।शादी में मिली हुई साड़ियां, जो खास पसंद तो नहीं हैं,पर कैसे दे दूँ इन्हें , मेरी यादों की पहली कड़ी तो यही हैं।और कड़ी दर कड़ी ही तो बनती है यादों की लड़ी,इन पुरानी कड़ियों को कैसे मिटाऊं? फिर आगे लड़ी कैसे बनेगी,
यही सोच कर रह जाऊं।
मेरी मामूली साड़ियों से किसी की गरीबी क्या ढंकेगी ,अलबत्ता मैं यादों से गरीब जरुर हो जाऊंगी।खुलती है अलमारी  तो दिल को बेहद सुकून मिलता है,खाली अलमारी में, यह रेशमी छुअन कैसे पाऊँगी? कहाँ मिलेगी इतनी नाज़ुक यादों की डोर,ज़िन्दगी की तपन में वो सूती छाँव कहाँ से लाऊंगी ?भले ही कीसि को, जगह और पैसे की बर्बादी लगे,इस आलमारी  को मेरे कमरे में पड़ा रहने दो,सोचा* गो ग्रीन* के नारे से परे मेरी साड़ियां और उनकी यादों को यूँ ही हरा रहने दो।तुम गरीबों में कुछ और बाँट दो,
मेरी अलमारी  को ऐसे ही भरा रहने दो ।


शनिवार, 16 नवंबर 2019

*आज औऱ कल*

आज बच्चों को शोर मचाने दो
कल जब ये बड़े हो जाएँगे
ख़ामोश ज़िंदगी बिताएँगे

*हम-तुम जैसे बन जाएँगे*

गेंदों से तोड़ने दो शीशें
कल जब ये बड़े हो जाएँगे
दिल तोड़ेंगे या ख़ुद टूट जाएँगे

*हम-तुम जैसे बन जाएँगे*

बोलने दो बेहिसाब इन्हें
कल जब ये बड़े हो जाएँगे
इनके भी होंठ सिल जाएँगे

*हम-तुम जैसे बन जाएँगे* 

दोस्तों संग छुट्टियों मनाने दो
कल जब ये बड़े हो जाएँगे
दोस्ती-छुट्टी को तरस जाएँगे

*हम-तुम जैसे बन जाएँगे* 

भरने दो इन्हें सपनों की उड़ान
कल जब ये बड़े हो जाएँगे
पर इनके भी कट जाएँगे

*हम-तुम जैसे बन जाएँगे* 

बनाने दो इन्हें काग़ज़ की कश्ती
कल जब ये बड़े हो जाएँगे
ऑफ़िस के काग़ज़ों में खो जाएँगे

*हम-तुम जैसे बन जाएँगे* 

खाने दो जो दिल चाहे इनका
कल जब ये बड़े हो जाएँगे
हर दाने की कैलोरी गिनाएँगे

*हम-तुम जैसे बन जाएँगे*

रहने दो आज मासूम इन्हें
कल जब ये बड़े हो जाएँगे
ये भी “समझदार” हो जाएँगे

*हम-तुम जैसे बन जाएँगे*

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

***कभी सोचती हूं***

कभी सोचती हूं
क्यों न,उम्र को दराज़ में रख दूँ,
उम्रदराज़ ना बनु,
खो जाऊ ज़िन्दगी में अपनी
मौत का इन्तज़ार मैं  क्यू करू.
कभी सोचती हूं
.जिंदगी  है मेरी
जिसको आना है आये
जिसको जाना है जाये
ये तो वक़्त की पहचान है
मे तो जीना जानती हु
ज़िन्दगी में बार बार मिलते हैं कईं लोग
 उसी को पहचान बना लेती हु....
कभी सोचती में हूं ,अपना गुजरा   हुआ जमाना 
सोचकर कभी बचपन को जीती हूँ
कभी जवानी में सपने सँजोती हूँ
बुढापे में भी रहूँगी जवान ही
ऐसा में सोचती हूँ
महफिलों का शौक रखती हूँ
दोस्तों से प्यार भी   करती हूँ
जो रिश्ते मुझे समझ सकें
मैं उनसे जुड़ी रहती हूँ
बँधती नहीं किसी से
ना किसी को जुड़ने पर मजबूर करती हूँ
दिल से जोड़ती हूँ हर रिश्ता सबसे
और उन रिश्तों से दिल से ही, जुड़ी रहना चाहती हूँ...
हँसना मुझे भाता है
पर अपनों के लिये रोने से भी परहेज नहीं करती
कभी सोचती हूं मैं
जो दे देता है ,एक बार दगा
उससे दूर जाने में भी परहेज़ नहीं करती
,उन लोगो के बारे में जो याद आते हैं  कभी,
तो अपनी आँखें भिगो लेती हूँ
पर फिर ज़िन्दगी की हसीन वादियों में खो जाती हूँ
जानती हूँ कि मेरी ,ज़िन्दगी के पास अब 
समय कुछ थोड़ा है
शिकवे शिकायतों में व्यर्थ समय ,क्यों गँवाऊँ
क्यों न अब  शिद्दत से ज़िन्दगी जी लूँ 
 और प्रेम की गंगा हर तरफ बहाऊँ
कभी सोचती हूं कि
मैं रहूँ न रहूँ,कोई गम नहीँ
पर  किसी के तो दिल मे ,
मेरी छवि, मेरे बाद भी ज़िन्दा रहेगी,
मुझे दिल से जो भी याद करेगा
मैं उसे,  शायद महसूस कर सकूंगी...
ऐसा कभी मैं सोचती हूं ।



शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2019

*गुम होते संयुक्त परिवार*


*एक वो दौर था* जब पति,
*अपनी भाभी को आवाज़ लगाकर*
घर आने की खबर अपनी पत्नी को देता था । 
पत्नी की छनकती पायल और खनकते कंगन बड़े उतावलेपन के साथ पति का स्वागत करते थे ।
 बाऊजी की बातों का.. *”हाँ बाऊजी"* 
*"जी बाऊजी"*' के अलावा दूसरा जवाब नही होता था ।
*आज बेटा बाप से बड़ा हो गया, रिश्तों का केवल नाम रह गया ।*
 ये *"समय-समय"* की नही,
*"समझ-समझ"* की बात है
बीवी से तो दूर, बड़ो के सामने, अपने बच्चों तक से बात नही करते थे
*आज बड़े बैठे रहते हैं हम *सिर्फ बीवी* से बात करते हैं
दादाजी के कंधे तो मानो, पोतों-पोतियों के लिए
आरक्षित होते थे, *काका* ही
*भतीजों के दोस्त हुआ करते थे ।*
आज वही दादू - दादी 
*वृद्धाश्रम* की पहचान है,
 *चाचा - चाची* बस
 *रिश्तेदारों की सूची का नाम है ।*
बड़े पापा सभी का ख्याल रखते थे, अपने बेटे के लिए
जो खिलौना खरीदा वैसा ही खिलौना परिवार के सभी बच्चों के लिए लाते थे ।
*'ताऊजी'*
आज *सिर्फ पहचान* रह गए
और,......
 *छोटे के बच्चे*
पता नही *कब जवान* हो गये..??
दादी जब बिलोना करती थी,
बेटों को भले ही छाछ दे
 पर *मक्खन* तो
*केवल पोतों में ही बाँटती थी।*
 *दादी ने*
*पोतों की आस छोड़ दी*,
 क्योंकि,...
*पोतों ने अपनी राह*
*अलग मोड़ दी ।*
राखी पर *बुआ* आती थी,
घर मे नही
*मोहल्ले* में,
*फूफाजी* को
 *चाय-नाश्ते पर बुलाते थे।*
अब बुआजी,
बस *दादा-दादी* के
बीमार होने पर आते है,
किसी और को
उनसे मतलब नही
चुपचाप नयननीर बरसाकर
वो भी चले जाते है ।
शायद *मेरे शब्दों* का
कोई *महत्व ना* हो,
पर *कोशिश* करना,
इस *भीड़* में
*खुद को पहचानने की*,
*कि*,.......
*हम "ज़िंदा है"*
या
*बस "जी रहे" हैं"*
अंग्रेजी ने अपना स्वांग रचा दिया,
*"शिक्षा के चक्कर में*
 *संस्कारों को ही भुला दिया"।*
बालक की *प्रथम पाठशाला परिवार*
पहला *शिक्षक उसकी माँ* होती थी,
आज
 *परिवार ही नही रहे*
पहली शिक्षक का क्या काम...??
"ये *समय-समय* की नही,
 समझ-समझ* की बात है"।

Written by abhasaxena

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2019

* जैसे को तैसा*

रमेश बाबु अपनी पत्नी स्वाति  साथ बैठे चाय पी रहे  थे।
  "अनिल ने जो फ्लैट बुक किया था,उसकी चाभी उसे मिल गयी है।कहीं  वह अपनी बहू और बच्चों के साथ वहीं न शिफ्ट कर जाये।"....स्वाति ने कहा ।
    "अरे नहीं!अनिल ने फ्लैट बुक करते समय ही कहा था,केवल पैसा इन्वेस्ट कर रहा था।मुझे यकीन है, हमलोग को छोड़ कर वह कभी नहीं जायेगा ।".....रमेश बाबु ने मुस्कुराते हुए कहा ।पता नहीं क्यों उनकी आँखों के सामने उनकी माँ गंगा देवी का चेहरा आ गया ।बीस साल पहले उन्होंने अपने माता-पिता का घर यह कहते हुए छोड़ दिया था कि ऑफिस की तरफ से इतना बढ़िया फ्लैट मिल रहा है,अगर अभी शिफ्ट नहीं करेंगे तो फ्लैट हाथ से चला जायेगा ।पत्नी     स्वाति का इतना दबाब था कि उन्होंने आपनी माँ का अश्रुपूरित आँखों को भी नजरअंदाज कर दिया ।माँ ने बड़ी धीमी आवाज और बेचारगी भरे स्वर  में कहा था,"तुमलोगों के बगैर हमलोग कैसे रह पायेंगे ।बच्चों के बिना घर खाने को दौड़ेगा।"
    माँ का उदास और बुझा हुआ चेहरा उनकी आँखों के सामने आ गया ।लेकिन पत्नी की हार्दिक इच्छा और सुखद स्वछन्द जीवन की लालसा ने उन्हें सरकारी आवास में रहने को मजबूर कर दिया ।
     वे अभी ये सब सोच ही रहे थे कि तभी अनिल आया और उनकी बगल में  बैठ गया ।बोला," पिताजी! एक बात कहनी है ।हमें नये फ्लैट की चाभी मिल गयी है ।हमलोग वहीं शिफ्ट होना चाहते हैं ।वहाँ से मेरा ऑफिस और बच्चों का स्कूल नजदीक है।आपकी बहु, को भी वहीं पास के स्कूल में  टीचर की नौकरी लग गयी है ।" हम लोग कल से ,वहाँ रहने जा रहे हैं।कहकर वो बाहर चला गया
रमेश बाबु ने अपनी पत्नी की तरफ देखा ......उसका चेहरा  बिलकुल उनकी माँ की तरह दिख रहा था ..... उदास और बुझा हुआ ।