मंगलवार, 10 सितंबर 2019

निशब्द**

*कल गणेश जी आरती के बाद, एक छोटी सी बच्ची ने मुझसे पूछा ..*
*बांझन को पुत्र दे .. पुत्री क्यू नही?*
बच्ची गलत नही थी,में निशब्द थी
* मेरे पास इसका जवाब नहीं था*
*शायद अभी भी कुछ चीजें बाकी हैं जिन्हें बदल ने की जरुरत है !*
*बांझन को संतान दे, निर्धन को माया.....*
*यहीं अब उच्चारण करना चाहिए.....*
🙏🙏🙏🙏🙏

रविवार, 11 अगस्त 2019

जैसी भी हूँ.. मैं

मैं, मैं हूँ ,
चाहे जैसी भी हूँ..

खुद से ही खुश हूँ ,
चाहे कैसी भी हूँ..

 न मैं अति सुन्दर न छरहरी,
ना ही नायिकाओ सी काया है मेरी..

   पर खुद पे ही है नाज़,
आत्मविश्वास और संबल ही
 छाया है मेरी..

   क्या करुँ क्या नहीं,
अब नही करनी किसी की परवाह..

   अब तो लगता है वही करुँ,
जो दिल मे दबा के रखी थी चाह..

   बच्चे उड़ चुके या उड़ने वाले हैं,
घोसलों से नई दिशाओं में..

   हम भी चुनेगें अब अपने पसंद की जमीं,
और आसमां नई आशाओं में..

   अब अपने घोंसले को ही नही,
खुद को भी सजाना है..

   बहुत मनाया सबको,
अब खुद को भी मनाना है..

   सूख चुकी उम्मीदों को,
फिर से सींचना है..

   रुठी हुई ख्वाहिशों को ,
गले लगा भींचना है..

   जीऊँगी जिंदगी को फिर से,
अब नए उमंग मे..

   लिए अपनी तमन्नाओं को ,
अपने संग में..

  थाम हाथ में जुगनुओं को ,
फिर से खिलखिलाऊँगी..

   नए सफर को नई उम्मीदों की,
रौशनी से जगमगाऊँगी

  फिर से बचपने के करीब हूँ,
लिखूँगी फिर से अपनी ज़िन्दगी..

 मैं अब खुद ही, अपना
नसीब हूँ मैं

रविवार, 21 जुलाई 2019

अकेलापन***

मेरी पति ने कुछ दिनों पहले घर की छत पर कुछ गमले रखवा दिए और एक छोटा सा गार्डन बना लिया। पिछले दिनों मैं छत पर गई तो ये देख कर हैरान रह गई कि कई गमलों में फूल खिल गए हैं,नींबू के पौधे में दो नींबू भी लटके हुए हैं और दो चार हरीमिर्च भी लटकी हुई नज़रआई। मैंने देखा कि पिछले हफ्ते उसने बांस का जो पौधा गमले में लगाया था,उस गमले को घसीट कर दूसरे गमले के पास कर रहे थे |
मैं बोली आप इस भारी गमले को क्यों घसीट रहे हो ?
पतिदेव ने मुझसे कहा कि यहां ये बांस का पौधा सूख रहा है, इसे खिसका कर इस पौधे के पास कर देते हैं।
मैं हंस पड़ी और कहा अरे पौधा सूख रहा है तो खाद डालो, पानी डालो। इसे खिसका कर किसी और पौधेके पास कर देने से क्या होगा?"
पति ने मुस्कुराते हुए कहा ये पौधा यहां अकेला है इसलिए मुर्झा रहा है।इसे इस पौधे के पास कर देंगे तो ये फिर लहलहा उठेगा। पौधे अकेले में सूख जाते हैं, लेकिन उन्हें अगर किसी और पौधे का साथ मिल जाए तो जी उठते हैं।
"यह बहुत अजीब सी बात थी। एक-एक कर कई तस्वीरें आखों के आगे बनती चली गईं।...
.
...पिताजी की मौत के बाद मां  कैसे एक ही रात में  बूढी  क्या,बहुत बूढी  हो  गयी थी  ।हालांकिपिताजी   के जाने के बाद सोलह साल तक वो  रहीं  ,लेकिन सूखते हुए पौधे की तरह।
...पिता जी के रहते हुए जिस  मां को मैंने कभी उदास नहीं देखा था, वो पिताजी  के जाने के बाद खामोश सी हो गयी थी 
मुझे ,पति के विश्वास पर पूरा विश्वास हो रहा था ।लग रहा था कि सचमुच पौधे अकेले में सूख जाते होंगे।
बचपन में मैं एक बार बाज़ार से एक छोटी सी रंगीन मछली खरीद कर लाई थी और उसे शीशे के जार में पानी भर कर रख दिया था।
मछली सारा दिन गुमसुम रही।मैंने उसके लिए खाना भी डाली , लेकिन वो चुपचाप इधर-उधर पानी में अनमना सा घूमती रही।सारा खाना जार की तलहटी में जाकर बैठ गया, मछली ने कुछ नहीं खाया। दो दिनों तक वो ऐसे ही रही, और एक सुबह मैंने देखा कि वो पानी की सतह पर उल्टी पड़ी थी।
आज मुझे घर में पाली वो छोटी सी मछली याद आ रही थी।...बचपन में किसी ने मुझे ये नहीं बताया था, अगर मालूम होता तो कम से कम दो, तीन या ढ़ेर सारी मछलियां खरीद लाती और मेरी वो प्यारी मछली यूं तन्हा न मर जाती।
बचपन में माँ से सुनी थी कि लोग मकान बनवाते थे और रौशनी के लिए कमरे में दीपक रखने के लिए दीवार में इसलिए दो मोखे बनवाते थे क्योंकि माँ का कहना था कि बेचारा अकेला मोखा गुमसुम और उदास हो जाता है।
मुझे लगता है कि संसार में किसी को अकेलापन पसंद नहीं।
....आदमी हो या पौधा, हर किसी को किसी न किसी के साथ की ज़रुरत होती है।
आप अपने आसपास झांकिए, अगर कहीं कोई अकेला दिखे तो उसे अपना साथ दीजिए, उसे मुरझाने से बचाइए।
अगर आप अकेले हों, तो आप भी किसी का साथ लीजिए, आप खुद को भी मुरझाने से रोकिए।
अकेलापन संसार में सबसे बड़ी सजा है। गमले के पौधे को तो हाथ से खींचकर एक दूसरे पौधे के पास किया जा सकता है, लेकिन आदमी को करीब लाने के लिए जरुरत होती है रिश्तों को समझने की, सहेजने की और समेटने की। अगर मन के किसी कोने में आपको लगे कि ज़िंदगी का रस सूख रहा है,जीवन मुरझा रहा है तो उस पर रिश्तों के प्यार का रस डालिए। खुश रहिए और मुस्कुराइए। कोई यूं ही किसी और की गलती से आपसे दूर हो गया हो तो उसे अपने करीब लाने की कोशिश कीजिए और हो जाइए हरा-भरा..


बुधवार, 8 मई 2019

**मेरी कहानी मेरी जुबानी**

👇👇👇👇
मेरी कहानी मेरी ही जुबानीहेलो 👐सभी को मेरा नमस्कार🙏 मैं अनीता सुखवाल उदयपुर की हूं। मेरा पीहर इंदौर है।मैने वनस्पति शास्त्र में एम् एस सी किया है,मेरी होलकर साइंस कॉलेज में, मेरिट में चोथी पोजीशन थी। पी एच डी करते हुए ही, क्यूंकी मेरी शादी उदयपुर हो गई थी, तो वो काम अधूरा रह गया। मैं  पूरी तरह नए  खूबसूरत शहर के ,परिवार में ,जहां का नया माहौल,नया खानपान,नए तरह का पहनाना ओढ़ना, सब तरह के कामो में रच बस सी गई।परिवार मेरा ज्वाइंट है इसलिए काम खूब रहता था फिर भी बहुत बार  जरूर ऐसा लगा ,के मेरी
 पढाई के अनुरूप में कुछ भी नहीं कर पा रही हूं, कई बार नौकरी करू,ऐसा ख़्याल आता था, पर हर बार पतिदेव ने मना किया।बोलते रहते, के घर के काम क्या कम  हैं, जो बाहर जा के करना है l ढेर सारे शौक थे मेरे तो इन्हें में, कैसे और कब पूरे करूंगी ?समझ नही आता था,मन मसोस कर रह जाती थी,धीरे धीरे  समय के साथ दो बेटों का आगमन हुआ,इनकी परवरिश में समय भागा चला गया।आज बडा इंफोसिस में इंजिनियर है और छोटा शेफ  है।इनको देखकर लगता है मैने शायद उस वक्त जिद करके, नौकरी की होती तो आज ये पता भी किस मुकाम पर होते।अब इस उम्र के पड़ाव  मैं अपने तमाम
 शौक पूरे करती हूं।शुरू से ही मेरी तरह तरह की हॉबी रही थी ,इसलिए मैने श्रीनाथी की ग्लास पेंटिंग्स बनाई। अब इसके साथ , मै बच्चो को, सीखाकर अपने समय का सदुपयोग करती हूं और परिवार वालों का भी ख्याल रखती हूं।मुझे कहानियां कविताएं  लिखने का भी खूब शौक है,इसके लिए एक ब्लॉग ,मैने बनाया है ।मुझे ऊनी  क्रोशिए की टोपी बनाने का बहुत शौक है। हर बार ठंड के आगमन के साथ हमारे रिश्तेदारों की ओर दोस्तो को टोपियां बना के देना मेरा शौक है
छोटे बच्चो के बेबी फ्रोक बूटी बनाना मेरे मनपसंद काम है।इसको मैने अब प्रोफ़ेशनल तरीके से भी बनाना शुरू किया है।मैने शायद कोई भी काम के लिए आज तक ना नही किया और  में समझती हूं ,किसी भी काम को सीखना है या सिखाना  है तो इसकी कोई उम्र नहीं होती ।आज भी में समय के साथ  जब भी फ्री  रहती हूं ऑनलाइन खूब सिखती हूं यहां से मुझे अपने शौक के अनुसार बहुत अच्छा सीखना मिल जाता है।और अपने शौक को बच्चो और महिलाओ को सिखाकर बहुत खुश होती हूं। मैने  अभी मात्र  इकसठ वसंत देखे है, पर अभी भी मेरा सीखना और सिखाना कम नहीं पड़ा है।श्रीनाथजी की कला के साथ साथ,मेने हॉबी क्लासेज में करीबन दो सौ एक्टिविटीज , डांस म्यूजिक के सारे काम सिखाना शुरू किए है, जिसमें में अपने आप को व्यस्त  रखती हूं। शायद मेरे  यही जीवन का सार है। बस सीखो और खूब सिखाओ ।



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**सोचती हूँ फिर से**

सोचती हूँ फिर से प्यार कर लूँ.
बेरंग सी हो गई है जिंदगी, रंग उसमें चाहत का भर लूं
सोचती हूँ फिर से प्यार कर लूँ..
वो चटक लाल रंग का कुर्ता जो फबता था बेहद मुझपर,
क्यों ना फिर से बक्से से निकाल अलमारी में ऊपर उसको धर लूँ
सोचती हूँ फिर से प्यार कर लूँ.
सजना- संवरना जो मुझको बेहद भाता था, वो आँखों का काजल कितना लुभाता था
क्यों ना आज फिर से थोड़ा सज-संवर लूँ
सोचती हूँ फिर से प्यार कर लूँ.
वो जो मेरी हँसी पूरे घर में गूंज जाती थी और मुझे हंसता देख दादी-बुआ बड़ी बड़ी आंखें दिखाती थी
आज भूल के सारे बंधन फिर दिल खोल कर के हँस लूँ
सोचती हूँ फिर से प्यार कर लूँ.
वो जो मैं अल्हड़ बेपरवाह हुआ करती थी, जो सिर्फ जिंदगी में उम्मीदों के रंग भरती थी
क्यों ना फिर से अपने अंदर उस लड़की को जिंदा कर लूँ
सोचती हूँ फिर से प्यार कर लूँ.
अपनी सारी जिम्मेदारियाँ बेशक निभाऊंगी लेकिन संग ही खुद में वो बचपना भी फिर जगाऊंगी
ये वादा खुद से आज कर लूँ
सोचती हूँ फिर से खुद से प्यार कर लूँ।  😊😊😊😊

मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

**मेरी कहानी मेरी जुबानी**

👇👇👇👇
**मेरी कहानी मेरी जुबानी**
हेलो 👐सभी को मेरा नमस्कार🙏 मैं अनीता सुखवाल उदयपुर की हूं। मेरा पीहर इंदौर है।मैने वनस्पति शास्त्र में एम् एस सी किया है,मेरी होलकर साइंस कॉलेज में, मेरिट में चोथी पोजीशन थी। पी एच डी करते हुए ही, क्यूंकी मेरी शादी उदयपुर हो गई थी, तो वो काम अधूरा रह गया। मैं  पूरी तरह नए  खूबसूरत शहर के ,परिवार में ,जहां का नया माहौल,नया खानपान,नए तरह का पहनाना ओढ़ना, सब तरह के कामो में रच बस सी गई।परिवार मेरा ज्वाइंट है इसलिए काम खूब रहता था फिर भी बहुत बार  जरूर ऐसा लगा ,के मेरी
 पढाई के अनुरूप में कुछ भी नहीं कर पा रही हूं, कई बार नौकरी करू,ऐसा ख़्याल आता था, पर हर बार पतिदेव ने मना किया।बोलते रहते, के घर के काम क्या कम  हैं, जो बाहर जा के करना है l ढेर सारे शौक थे मेरे तो इन्हें में, कैसे और कब पूरे करूंगी ?समझ नही आता था,मन मसोस कर रह जाती थी,धीरे धीरे  समय के साथ दो बेटों का आगमन हुआ,इनकी परवरिश में समय भागा चला गया।आज बडा इंफोसिस में इंजिनियर है और छोटा शेफ  है।इनको देखकर लगता है मैने शायद उस वक्त जिद करके, नौकरी की होती तो आज ये पता भी किस मुकाम पर होते।अब इस उम्र के पड़ाव  मैं अपने तमाम
 शौक पूरे करती हूं।शुरू से ही मेरी तरह तरह की हॉबी रही थी ,इसलिए मैने श्रीनाथी की ग्लास पेंटिंग्स बनाई। अब इसके साथ , मै बच्चो को, सीखाकर अपने समय का सदुपयोग करती हूं और परिवार वालों का भी ख्याल रखती हूं।मुझे कहानियां कविताएं  लिखने का भी खूब शौक है,इसके लिए एक ब्लॉग ,मैने बनाया है ।मुझे ऊनी  क्रोशिए की टोपी बनाने का बहुत शौक है। हर बार ठंड के आगमन के साथ हमारे रिश्तेदारों की ओर दोस्तो को टोपियां बना के देना मेरा शौक है
छोटे बच्चो के बेबी फ्रोक बूटी बनाना मेरे मनपसंद काम है।इसको मैने अब प्रोफ़ेशनल तरीके से भी बनाना शुरू किया है।मैने शायद कोई भी काम के लिए आज तक ना नही किया और  में समझती हूं ,किसी भी काम को सीखना है या सिखाना  है तो इसकी कोई उम्र नहीं होती ।आज भी में समय के साथ  जब भी फ्री  रहती हूं ऑनलाइन खूब सिखती हूं यहां से मुझे अपने शौक के अनुसार बहुत अच्छा सीखना मिल जाता है।और अपने शौक को बच्चो और महिलाओ को सिखाकर बहुत खुश होती हूं। मैने  अभी मात्र  इकसठ वसंत देखे है, पर अभी भी मेरा सीखना और सिखाना कम नहीं पड़ा है।श्रीनाथजी की कला के साथ साथ,मेने हॉबी क्लासेज में करीबन दो सौ एक्टिविटीज , डांस म्यूजिक के सारे काम सिखाना शुरू किए है, जिसमें में अपने आप को व्यस्त  रखती हूं। शायद मेरे  यही जीवन का सार है। बस सीखो और खूब सिखाओ ।
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सोमवार, 8 अप्रैल 2019

*** औरतों की छोटी-छोटी खुशियां ****

 कुछ नहीं कहती ,कुछ नहीं मांगती कुछ नहीं चाहती
बस छोटी-छोटी  ,खुशियां होती है औरतों की..
जरूरत के सामान के साथ,सब छोड़ के आई है
यादों के पुलिन्दे के सिवाय,कुछ भी नहीं लाई है ।
उस निर्वासन, उस विलगता, उस बिछोह,
उस अकेलेपन का दर्द ,महसूस भी होना जरूरी है ......
पहले ही दिन से सब बदल जाता है
रसोई, आँगन, दरवाजाबाथरूम, छत और रसोई ।
बीस-पच्चीस बरस तक जिस जगह खेली-पली-बढ़ी
वो एक पल में छूट जाता है रह-रहकर बस याद आता है ।
उसे क्या चाहिये,सोना-चांदी, हीरे मोती
मंहगें वस्त्र, धन-दौलत नहीं... नहीं
ये सब मिट्टी है उसके लिये ये सब तो वो संग ही ले आई ।
उसे समानुभूति - सम्मान करने वाला और
बिना कहे समझने वालाएक हमसफर चाहिये...
उसे सच्चा महत्व- प्यार देने वाला और
अकेलापन दूर करने वालाएक अदद दोस्त चाहिये....
वो रहती है, चार दीवारी में सहेजती- समेटती सामान को
वो सँवारती है घर आँगन को वो भी मन-तन से थक जाती है ....
दो मीठे बोल मिटाते हैं,उसकी सारी तकलीफें
यदा-कदा तारीफ से भी वो गुड़फील करती है
क्या हुआ जो समय पर,खाना नहीं बना
क्या हुआ जो किसी दिन,घर पूरा फैला हुआ है
क्या हुआ जो तैयार होने मेंवो थोड़ी देर करती है
वो भी रिमोट हाथ में रखकर,तकिये पर सिर टिकाकर
बगल में मोबाईल रखकर,घण्टों न्यूज देखना चाहती है
वो भी हफ्ते में किसी एक दिन रोजमर्रा के कामों को भूलकर
छह दिनों की ऊर्जा के लिये,अवकाश रखने की हकदार है....
वो याद रखती है, हर तारीख ,दूध की नागा, व्रत- त्यौंहार
वो भूल नहीं पाती है कभी भी,जन्मदिनों को,शादी-ब्याह को
उसे भी हक है कि कोई बताये,उसे भी कोई यादगार लम्हा
दिन-रात में कुछ देर ही सही,पर कोई करें उससे कुछ बातें
मंहगा नेकलैस नहीं चाहिये,उसे सरप्राईज चाहिये नया
एक गुलाब भी उसका चेहरा,खुशी से लाल कर सकता है
जब बना रही हो वो खाना,पसीने ले तरबतर परेशान
धीमे पांव जाकर, छू लेना,से तरोताज़ा कर सकता है....
जब धो रही हो वो कपड़े,अपनी नाजुक हथेलियों से
"सुनों ! कपड़े मैं सुखा दूंगा"सुनना उसे अच्छा लगता है
नमक तेज़ हो या मिर्च,उसने चाहकर तो नहीं किया
हम बना ही नहीं सकते तो,कमियां बताना जरूरी तो नहीं
उसे गुस्सा करने दो,उसे खुलकर बोलने दो
उसे अपनी राय रखने दो,उसे भी उन्मुक्त बनने दो
वो भी एक दिल, दो किड़नी,एक यकृत रखती है
उसकी भी सांस भरती है,घुटने और कमर दुखती है
वो क्यों ना हँसे सबके सामने,वो क्यों ना सोये देर सुबह तक
वो भी आखिर इन्सान है...उसके भी छोटे -छोटे से अरमान हैं ।
कुछ नहीं कहती,कुछ नहीं मांगती
कुछ नहीं चाहती,बस छोटी-छोटी
खुशियां होती है औरतों की..👆🙏🏻🌹