रविवार, 22 सितंबर 2013
मंगलवार, 10 सितंबर 2013
सच्चाई
बेटे ने जॉब के खातिर घर ही छोड़ा था , लेकिन जॉब लगने के बाद शादी हुई, और शादी होने के बाद उसने घर के साथ साथ , रिश्ते भी छोड़ दिए थे , जिन रिश्तों ने उसे जन्म दिया था , वो अब उसकी जिन्दगी में कोई मायने नहीं रखते थे |
लेकिन आज बेटे ने माँ से फ़ोन पर लगभग आधा घंटा बात करी , बेटे के साथ साथ उसकी बहु ने उसके पोते पोतियों ने भी | माँ की अचरज का कोई ठिकाना ना रहा , पोता बड़े प्यार से कह रहा था , दादी आप यहाँ आओ ना हमारे साथ रहने, .. आज ऐसा महसूस हो रहा था उस बूढी माँ को , जैसे कानों में किसी ने मिश्री घोल दी हो |
उसने अपने पति से कहा , अजी सुनते हो चलिए ना कुछ दिन बेटे के घर हो आते है , अभी उसके बच्चों की छुटियाँ भी है , तो उन्हें परेशानी भी नही होगी , वो बुजुर्ग दंपत्ति अगले दिन की ट्रेन पकड़ कर बेटे के घर जा पहुंचे
सभी उनकी , आवभगत में लगे हुए थे , कुछ दिनों के के बाद, बेटे ने माँ से कहा, माँ गाँव का अपना मकान और दुकान बेच दो , एक करोड़ से ऊपर की संपत्ति है , वो बेच कर, आप दोनों मेरे साथ यही रहने आ जाओ, मै आप के रहने का इंतजाम ऊपर किए देते हूँ , वही पर रसोई बना देता हूँ , आप दोनों ऊपर ही रहिये और बचा हुआ जीवन आराम से बिताइए , पिता जी ने सुन कर कहा ....बेटा , मेरे जीते जी ये संपत्ति बिकेगी नहीं , और यदि हमे यहाँ आ कर भी अकेले रहना है , तो गाँव में रहने में क्या बुराई है ? गुस्से से पिताजी ने बेटे को डांट दिया , बेटा माँ की और बड़ी हसरत से देख रहा था , लेकिन माँ के हाथ में कुछ था नहीं
जैसे तैसे रात ढली और सुबह होते ही बेटे ने कहा ....माँ आज हम लोग तीन दिन के लिए बाहर जा रहें है , मेरे ससुराल में कोई काम अचानक आ गया है , तो आप लोग गाँव चले जाइए , यहाँ आप की देखभाल करने वाला, कोई रहेगा नहीं, और वैसे भी आप लोगों को आलीशान बंगले से ज्यादा सुकून गाँव के उस टूटे फूटे से मकान में मिलता है , माँ को अब सुबह की सच्चाई साफ़ नजर आ चुकी थी, उसे पता चल चुका था की इस रिश्ते की जान , सिर्फ उस संपत्ति में निहित है |
माँ ने भारी मन से , अपना सामान उठाया , एक रात में द्रश्य एक दम बदल चुका था , कल जो बहु और पोते पोती दरवाजे तक लेने आये थे , आज वो लोग उस बुजुर्ग दंपत्ति को विदा करने के लिए, अपने कमरों से बाहर भी नहीं निकलें , माँ ने सामान , उठाते हुए कहा बेटा, उस टूटे हुए , मकान की हर ईंट पर हमारा अधिकार है , और देखना , इस आलिशान बंगले का क़र्ज़ भी , उसी से चुकेगा एक दिन अब सिर्फ सन्नाटा था रिश्तों के बीच ||
लेकिन आज बेटे ने माँ से फ़ोन पर लगभग आधा घंटा बात करी , बेटे के साथ साथ उसकी बहु ने उसके पोते पोतियों ने भी | माँ की अचरज का कोई ठिकाना ना रहा , पोता बड़े प्यार से कह रहा था , दादी आप यहाँ आओ ना हमारे साथ रहने, .. आज ऐसा महसूस हो रहा था उस बूढी माँ को , जैसे कानों में किसी ने मिश्री घोल दी हो |
उसने अपने पति से कहा , अजी सुनते हो चलिए ना कुछ दिन बेटे के घर हो आते है , अभी उसके बच्चों की छुटियाँ भी है , तो उन्हें परेशानी भी नही होगी , वो बुजुर्ग दंपत्ति अगले दिन की ट्रेन पकड़ कर बेटे के घर जा पहुंचे
सभी उनकी , आवभगत में लगे हुए थे , कुछ दिनों के के बाद, बेटे ने माँ से कहा, माँ गाँव का अपना मकान और दुकान बेच दो , एक करोड़ से ऊपर की संपत्ति है , वो बेच कर, आप दोनों मेरे साथ यही रहने आ जाओ, मै आप के रहने का इंतजाम ऊपर किए देते हूँ , वही पर रसोई बना देता हूँ , आप दोनों ऊपर ही रहिये और बचा हुआ जीवन आराम से बिताइए , पिता जी ने सुन कर कहा ....बेटा , मेरे जीते जी ये संपत्ति बिकेगी नहीं , और यदि हमे यहाँ आ कर भी अकेले रहना है , तो गाँव में रहने में क्या बुराई है ? गुस्से से पिताजी ने बेटे को डांट दिया , बेटा माँ की और बड़ी हसरत से देख रहा था , लेकिन माँ के हाथ में कुछ था नहीं
जैसे तैसे रात ढली और सुबह होते ही बेटे ने कहा ....माँ आज हम लोग तीन दिन के लिए बाहर जा रहें है , मेरे ससुराल में कोई काम अचानक आ गया है , तो आप लोग गाँव चले जाइए , यहाँ आप की देखभाल करने वाला, कोई रहेगा नहीं, और वैसे भी आप लोगों को आलीशान बंगले से ज्यादा सुकून गाँव के उस टूटे फूटे से मकान में मिलता है , माँ को अब सुबह की सच्चाई साफ़ नजर आ चुकी थी, उसे पता चल चुका था की इस रिश्ते की जान , सिर्फ उस संपत्ति में निहित है |
माँ ने भारी मन से , अपना सामान उठाया , एक रात में द्रश्य एक दम बदल चुका था , कल जो बहु और पोते पोती दरवाजे तक लेने आये थे , आज वो लोग उस बुजुर्ग दंपत्ति को विदा करने के लिए, अपने कमरों से बाहर भी नहीं निकलें , माँ ने सामान , उठाते हुए कहा बेटा, उस टूटे हुए , मकान की हर ईंट पर हमारा अधिकार है , और देखना , इस आलिशान बंगले का क़र्ज़ भी , उसी से चुकेगा एक दिन अब सिर्फ सन्नाटा था रिश्तों के बीच ||
शुक्रवार, 16 अगस्त 2013
बड़ा छोटा
एक थे पण्डित जी और एक थी पण्डिताइन। पण्डित जी के मन मेंजातिवाद कूट-कूट कर भरा था। परन्तु पण्डिताइन समझदार थी। समाज की विकृत रूढ़ियों को नही मानती थी।एक दिन पण्डितजी को प्यास लगी।संयोगवश् घर मेंपानी नही था। इसलिए पण्डिताइन पड़ोस सेपानी ले आयी। पानी पीकर पण्डित जी नेपूछा।) पण्डित जी- कहाँ से लाई हो। बहुतठण्डा पानी है। पण्डिताइन जी- पड़ोस केकुम्हार के घर से।(पण्डित जी ने यह सुन करलोटा फेंक दिया और उनके तेवर चढ़गये। वे जोर-जोर से चीखनेलगे।)पण्डित जी- अरी तूनेतो मेरा धर्म भ्रष्ट करदिया। कुम्हार के घरका पानी पिला दिया।(पण्डिताइन भय से थर-थरकाँपने लगी, उसनेपण्डित जी से माफी माँग ली।) पण्डिताइन- अब ऐसी भूल नही होगी।(शाम को पण्डित जी जबखाना खाने बैठेतो पण्डिताइन ने उन्हें सूखी रोटियाँ परस दी।)पण्डित जी- सागनही बनाया।पण्डिताइन जी-बनाया तो था, लेकिन फेंक दिया। क्योंकि जिसहाँडी में वो पकाया था,वो तो कुम्हार के घर की थी।पण्डित जी- तू तो पगली है।कहीं हाँडी में भी छूतहोती है?(यह कह कर पण्डित जी नेदो-चार कौर खायेऔर बोले-)पण्डित जी- पानी तो ले आ।पण्डिताइन जी-पानी तो नही है जी।पण्डित जी- घड़े कहाँ गये?पण्डिताइन जी- वो तो मैंने फेंक दिये। कुम्हार केहाथों से बने थे ना।(पण्डित जी ने फिर दो-चार कौर खाये औरबोले-)पण्डित जी- दूध ही ले आ।उसमें ये सूखी रोटी मसल करखा लूँगा।पण्डिताइन जी- दूध भी फेंकदिया जी। गाय को जिस नौकर ने दुहा था, वह भी कुम्हार ही था।पण्डित जी- हद कर दी! तूने तो, यह भी नही जानती दूध में छूत नही लगती।पण्डिताइन जी- यहकैसी छूत है जी! जो पानी में तो लगती है,परन्तु दूध में नही लगती।(पण्डित जी के मन में
आया कि दीवार से सरफोड़ ले, गुर्रा करबोले-)पण्डित जी- तूने मुझे चौपटकर दिया। जा अब
आँगन में खाट डालदे। मुझे नींद आ रही है।पण्डिताइन जी- खाट! उसेतो मैंने तोड़ कर फेंक
दिया। उसे नीची जात के आदमी ने बुना था ना।(पण्डित जी चीखे!)पण्डित जी- सब मे आग
लगा दो। घर में कुछ बचा भी है या नही।पण्डिताइन जी- हाँ! घर बचा है। उसेभी तोड़ना बाकी है।
क्योकि उसे भी तो नीची जाति केमजदूरों नेही बनाया है।(पण्डित जी कुछ देर गुम-सुम खड़े रहे! फिर
बोले-)पण्डित जी- तूने मेरी आँखेंखोल दीं। मेरी ना-समझी से ही सब गड़-बड़ हो रही थी।
कोईभी छोटा बड़ा नही है।सभी मानव समान हैं ।
प्रेम ,धन और सफलता
एक दिन एक औरत अपने घर के बाहर आई और उसने तीन
संतों को अपने घर के सामने देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी।
औरत ने कहा – “कृपया भीतर आइये और भोजन करिए।”
संत बोले – “क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?”
औरत ने कहा – “नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।”
संत बोले – “हम तभी भीतर आयेंगे जब वह घर पर हों।”
शाम को उस औरत का पति घर आया और औरत ने उसे यह सब
बताया।
औरत के पति ने कहा – “जाओ और उनसे कहो कि मैं घर आ गया हूँ और
उनको आदर सहित बुलाओ।”
औरत बाहर गई और उनको भीतर आने के लिए कहा।
संत बोले – “हम सब किसी भी घर में एक साथ नहीं जाते।”
“पर क्यों?” – औरत ने पूछा।
उनमें से एक संत ने कहा – “मेरा नाम धन है” – फ़िर दूसरे
संतों की ओर इशारा कर के कहा – “इन दोनों के नाम सफलता और
प्रेम हैं। हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है। आप घर के अन्य
सदस्यों से मिलकर तय कर लें कि भीतर किसे निमंत्रित करना है।”
औरत ने भीतर जाकर अपने पति को यह सब बताया।
उसका पति बहुत प्रसन्न हो गया और बोला – “यदि ऐसा है
तो हमें धन को आमंत्रित करना चाहिए। हमारा घर खुशियों से
भर जाएगा।”
लेकिन उसकी पत्नी ने कहा – “मुझे लगता है कि हमें
सफलता को आमंत्रित करना चाहिए।”
उनकी बेटी दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी। वह उनके पास आई
और बोली – “मुझे लगता है कि हमें प्रेम को आमंत्रित
करना चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।”
“तुम ठीक कहती हो, हमें प्रेम को ही बुलाना चाहिए” – उसके
माता-पिता ने कहा।
औरत घर के बाहर गई और उसने संतों से पूछा – “आप में से
जिनका नाम प्रेम है वे कृपया घर में प्रवेश कर भोजन गृहण करें।”
प्रेम घर की ओर बढ़ चले। बाकी के दो संत भी उनके पीछे चलने
लगे।
औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा – “मैंने तो सिर्फ़ प्रेम
को आमंत्रित किया था। आप लोग भीतर क्यों जा रहे हैं?”
उनमें से एक ने कहा – “यदि आपने धन और सफलता में से किसी एक
को आमंत्रित किया होता तो केवल वही भीतर जाता। आपने प्रेम
को आमंत्रित किया है। प्रेम कभी अकेला नहीं जाता। प्रेम जहाँ-
जहाँ जाता है, धन और सफलता उसके पीछे जाते हैं।
संतों को अपने घर के सामने देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी।
औरत ने कहा – “कृपया भीतर आइये और भोजन करिए।”
संत बोले – “क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?”
औरत ने कहा – “नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।”
संत बोले – “हम तभी भीतर आयेंगे जब वह घर पर हों।”
शाम को उस औरत का पति घर आया और औरत ने उसे यह सब
बताया।
औरत के पति ने कहा – “जाओ और उनसे कहो कि मैं घर आ गया हूँ और
उनको आदर सहित बुलाओ।”
औरत बाहर गई और उनको भीतर आने के लिए कहा।
संत बोले – “हम सब किसी भी घर में एक साथ नहीं जाते।”
“पर क्यों?” – औरत ने पूछा।
उनमें से एक संत ने कहा – “मेरा नाम धन है” – फ़िर दूसरे
संतों की ओर इशारा कर के कहा – “इन दोनों के नाम सफलता और
प्रेम हैं। हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है। आप घर के अन्य
सदस्यों से मिलकर तय कर लें कि भीतर किसे निमंत्रित करना है।”
औरत ने भीतर जाकर अपने पति को यह सब बताया।
उसका पति बहुत प्रसन्न हो गया और बोला – “यदि ऐसा है
तो हमें धन को आमंत्रित करना चाहिए। हमारा घर खुशियों से
भर जाएगा।”
लेकिन उसकी पत्नी ने कहा – “मुझे लगता है कि हमें
सफलता को आमंत्रित करना चाहिए।”
उनकी बेटी दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी। वह उनके पास आई
और बोली – “मुझे लगता है कि हमें प्रेम को आमंत्रित
करना चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।”
“तुम ठीक कहती हो, हमें प्रेम को ही बुलाना चाहिए” – उसके
माता-पिता ने कहा।
औरत घर के बाहर गई और उसने संतों से पूछा – “आप में से
जिनका नाम प्रेम है वे कृपया घर में प्रवेश कर भोजन गृहण करें।”
प्रेम घर की ओर बढ़ चले। बाकी के दो संत भी उनके पीछे चलने
लगे।
औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा – “मैंने तो सिर्फ़ प्रेम
को आमंत्रित किया था। आप लोग भीतर क्यों जा रहे हैं?”
उनमें से एक ने कहा – “यदि आपने धन और सफलता में से किसी एक
को आमंत्रित किया होता तो केवल वही भीतर जाता। आपने प्रेम
को आमंत्रित किया है। प्रेम कभी अकेला नहीं जाता। प्रेम जहाँ-
जहाँ जाता है, धन और सफलता उसके पीछे जाते हैं।
गुरुवार, 8 अगस्त 2013
***विनम्रता का रहस्य***
एक
साधु बहुत बूढ़े हो गए थे। उनके जीवन का आखिरी क्षण आ पहुँचा। आखिरी
क्षणों में उन्होंने अपने शिष्यों और चेलों को पास बुलाया। जब सब उनके पास आ
गए, तब उन्होंने अपना पोपला मुँह पूरा खोल दिया और शिष्यों से बोले-'देखो,
मेरे मुँह में कितने दाँत बच गए हैं?' शिष्यों ने उनके मुँह की ओर देखा।
कुछ टटोलते हुए वे लगभग एक स्वर में बोल उठे-'महाराज आपका तो एक भीदाँत
शेष नहीं बचा। शायद कई वर्षों से आपका एक भी दाँत नहीं है।' साधु
बोले-'देखो, मेरी जीभ तो बची हुई है।'
सबने उत्तर दिया-'हाँ, आपकी
जीभ अवश्य बची हुई है।' इस पर सबने कहा-'पर यह हुआ कैसे?' मेरे जन्म के
समय जीभ थी और आज मैं यह चोला छोड़ रहा हूँ तो भी यह जीभ बची हुईहै। ये
दाँत पीछे पैदा हुए, ये जीभसे पहले कैसे विदा हो गए? इसका क्या कारण है,
कभी सोचा?'
शिष्यों ने उत्तर दिया-'हमें मालूम नहीं। महाराज, आप ही बतलाइए।'
उस समय मृदु आवाज में संत ने समझाया- 'यही रहस्य बताने के लिए मैंने तुम
सबको इस बेला में बुलाया है। इस जीभ में माधुर्य था, मृदुता थी और खुद भी
कोमल थी, इसलिए वह आज भी मेरे पास है परंतु.......मेरे दाँतों में शुरू से
ही कठोरता थी, इसलिए वे पीछे आकर भी पहले खत्म हो गए, अपनी कठोरता के कारण
ही ये दीर्घजीवी नहीं हो सके।
दीर्घजीवी होना चाहते हो तो कठोरता छोड़ो और विनम्रता सीखो।'
बुधवार, 24 जुलाई 2013
एक छोटा सा पैगाम
माता का एक छोटा सा पैगाम :- बेटे के नाम
1. जिस दिन तुम हमे बूढ़ा देखो तब सब्र करना और हमे समझने की कोशिश करना.
2. जब हम कोई बात भूल जाए तो हम पर गुस्सा ना करना और अपना बचपन याद करना.
3. जब हम बूढ़े होकर चल ना पाए तो हमारा सहारा बनना और अपना पहला कदम याद करना.
4. जब हम बीमार हो जाए तो वो दिन याद करके हम पर अपने पैसे खर्च करना जब
हम तुम्हारी ख्वाहिशे पूरी करने के लिए अपनी ख्वाहिशे कुर्बान करते थे.
5. जब हमारे आँखों मे आँसू देखना तो वह दिन याद करना , जब तुम रोते थे , तो सीने से लगाकर चुप कराते थे ।
6. जब हम ठंड से ठिठुर रहें हो तो , और गुहार लगा रहें हों , तो बिना कोई देर किये हमारे ऊपर रजाई और कम्बल डालना ।वह दिन याद करना जब ठंड के दिनों मे पैरों से रजाई नीचे गिरा देते थे और
ठंड लगने पर रोते थे , तो अपने कलेजे लगाकर फिर रजाई ओढाते थे ।
इस खूबसूरत संदेश को ,सभी के साथ ,शेयर करनाऔर अपने अभिभावको का सम्मान करना.
....
सोमवार, 22 जुलाई 2013
दो भाई
किसी शहर में दो भाई रहते थे .
उनमे से एक शहर का सबसे बड़ा बिजनेसमैन था तो दूसरा एक ड्रग
-एडिक्ट था जो अक्सर नशे की हालत में लोगों से मार -पीट किया
करता था . जब लोग इनके बारे में जानते तो बहुत आश्चर्य करते कि
आखिर दोनों में इतना अंतर क्यों है जबकि दोनों एक ही
माता-पिता की संताने हैं , एक जैसी शिक्षा प्राप्त हैं और बिलकुल
एक जैसे माहौल में पले -बढे हैं . कुछ लोगों ने इस बात का पता
लगाने का निश्चय किया और शाम को भाइयों के घर पहुंचे .
अन्दर घुसते ही उन्हें नशे में धुत एक
व्यक्ति दिखा , वे उसके पास गए और पूछा , “ भाई तुम ऐसे क्यों
हो ??..तुम बेवजह लोगों से लड़ाई -झगडा करते हो , नशे में धुत
अपने बीवी -बच्चों को पीटते हो …आखिर ये सब करने की वजह क्या है
?”
“मेरे पिता ” , भाई ने उत्तर दिया .
“पिता !! ….वो कैसे ?” , लोगों ने पूछा
भाई बोल , “ मेरे पिता शराबी थे ,
वे अक्सर मेरी माँ और हम दोनों भाइयों को पीटा करते थे …भला तुम
लोग मुझसे और क्या उम्मीद कर सकते हो …मैं भी वैसा ही हूँ ..”
फिर वे लोग दूसरे भाई के पास गए , वो अपने काम में व्यस्त था और थोड़ी देर बाद उनसे मिलने आया ,
“माफ़ कीजियेगा , मुझे आने में थोड़ी देर हो गयी .” भाई बोल , “ बताइए मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ ? ”
लोगों ने इस भाई से भी वही प्रश्न
किया , “ आप इतने सम्मानित बिजनेसमैन हैं , आपकी हर जगह पूछ है ,
सभी आपकी प्रशंसा करते हैं , आखिर आपकी इन उपलब्धियों की वजह
क्या है ?”
“ मेरे पिता “, उत्तर आया .
लोगों ने आश्चर्य से पूछा , “ भला वो कैसे ?”
“मेरे पिता शराबी थे , नशे में वो
हमें मारा- पीटा करते थे मैं ये सब चुप -चाप देखा करता था , और
तभी मैंने निश्चय कर लिया था की मैं ऐसा बिलकुल नहीं बनना चाहता
मुझे तो एक सभ्य , सम्मानित और बड़ा आदमी बनना है , और मैं
वही बना .” भाई ने अपनी बात पूरी की .
हमारे साथ जो कुछ भी घटता है
उसके positive और negative aspects हो सकते हैं . ज़रुरत इस बात की
है की हम positive aspect पर concentrate करें और वहीँ से अपनी
inspiration draw करें .
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