सोमवार, 6 अप्रैल 2026

**कभी तुम**

 कभी तुम 

अकेले में देखना 

*तारों को ,_____*


जो कोई तारा

 तुम्हे देखकर 

टिमटिमाया

*समझ लेना*

*वो मैं हूँ.......*


कभी तुम 

खामोश हो

 यूँ ही टहलना,

चली जो भीनी हवा

 तुमसे लिपटकर

*समझ लेना*

 *वो मैं हूँ..____*


कभी तुम 

उदास होके 

अकेले खड़े हो,

उस पल 

जो आंसू गिरे 

तुम्हारे गालो को छूकर

*समझ लेना*

 *वो मैं हूँ..______*


कभी तुम 

जो यूँ ही

 अकेले में सोच के 

कुछ मुस्कुराओ 

उस पल जो

 सुकून मिले 

तुम्हारे मन को

*समझ लेना* 

*वो मैं हूँ..*

अनिता

......... ✍️


गुरुवार, 5 मार्च 2026

*नया जीवन

 यूं तो वृद्ध आश्रम में, उन दोनों को साथ साथ रहते ,दोनों को करीबन आठ माह से ऊपर हो गए थे, थोड़ी जान पहचान हो ही गई थी!

एक दिन, शाम 68 वर्षीय गजेंद्र जी ने, कुछ सोच विचार के बाद सामने बैठी 63 वर्ष की गीता बाली से कहा—

“क्यों न हम अपने बचे हुए जीवन की एक नई शुरुआत करें?”

क्या आप मुझसे शादी करेंगी...

अचानक से आए प्रस्ताव को सुनकर 

गीता जी कुछ पल तो चुप रहीं।

उनकी आँखों  में डर था लेकिन उससे ज़्यादा थकान थी

उन्होंने धीरे से कहा—

“मेरी अपनी कोई संतान नहीं है उनका

थोड़ा गला भर आया 

फिर वो बोलीं—

“मेरे पति प्राइवेट नौकरी में थे।

दस साल पहले गुजर गए।मेरे अपने बच्चे तो नहीं थे पर ज्वाइंट फैमिली थी, धीरे धीरे सबके रहते भी उस घर में, मेरी आवाज़ ,को सबने दबा सा दिया था,ऐसा लगने लगा था कि मैं सबके ऊपर बोझ सी बनती जा रही हूं ।”

जेठ जेठानी,देवर देवरानी ,उनके सबके बच्चे है ,

लेकिन किसी को मेरी ज़रूरत नहीं रही ..जबकि . उन सबके कहे अनुसार, मेने अपनी,सारी प्रॉपर्टी उनके सब बच्चों, के नाम से कर दी और कुछ समय के बाद वो ही लोग मुझे यहां छोड़ गए।”इतना कहते हुए वो सिसकने लगीं,तब गजेन्द्रजी

बोले—

“मेरे पास अपना घर है,पेंशन है,इलाज की सारी सुविधा भी है…

बस किसी का भी साथ नहीं है,मेरी पत्नी को गुजरे 2 साल हो गया .एक ही बेटा हे जो बहू के साथ विदेश में हमेशा के लिए बस गया है ,कहते हुए उनका गला भर गया

फिर बहुत धीमे स्वर में वो बोले—बस इसी

“मुझे मजबूरी में मुझे यहाँ रहना पड़ रहा है। यहां हमउम्र लोगों का साथ, एक सकुन देता है,

अगर आप मेरा साथ दें तो हम इस वृद्ध आश्रम से निकलकर,मेरे अपने घर में आराम से रह सकते हैं।

मैं आपका सहारा बनूँगा और आप मेरा।”

गीता देवी की आँखों से आँसू गिर पड़े।

वह बोलीं—

“लेकिन ये समाज…क्या कहेंगा? लोग हमें क्या बोलेंगे?

इस उम्र में विवाह !!! 

 गजेंद्र जी की आवाज़ में पहली बार कठोरता थी—

“कौन_सा_समाज?

वही समाज जिसने कभी यह किसी से नहीं पूछा

कि परिवार के रहते भी एक पिता आश्रम में क्यों गया?

वही_समाज?

आपके परिवार वालों से जाकर ,यह कभी,किसी ने नहीं पूछा कि अपनों ने ही, आपके साथ, इतना बड़ा धोखा क्यों किया ?

कौन से समाज ने हमें अपने घर रखा?

किस समाज ने आकर ,हमारे आँसू पोंछे?

तो अब हम , समाज से इजाज़त क्यों माँगें?”

उस दिन गीता देवी ने पहली बार

खुद को बेकार नहीं, ज़रूरी सा, महसूस किया।

मन ही मन प्रण करने का सोचा और उन्होंने गजेन्द्रजी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया,

कुछ दिनों बाद दोनों ने विवाह कर लिया।

कोई शोर नहीं था कोई रिश्तेदार नहीं था।

बस दो टूटे जीवन थे—

जो एक-दूसरे के सहारे फिर से जुड़ रहे थे।


 ✍🏼 अनिता सुखवाल

         उदयपुर 

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

*सुनहरे वर्षों का नया श्रृंगार*



बुजुर्ग होते ही सबसे बड़ी समस्या वक्त गुजारने की होती है क्यूंकि घर के सारे सदस्य भी अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं,अब खाली समय खूब रहता है!
मुझे कला और रचनात्मकता, क्रिएटिविटी के साथ गायकी का भी, शुरू से शौक रहा था, परन्तु घर गृहस्थी को संभालने के वक्त, समय नहीं मिला, ये मेरा शौक अब न केवल समय बिताने का जरिया है, बल्कि मन को शांति, सकून के साथ,जीवन को एक नई ऊर्जा सी भरता है।

जीवन की लंबी यात्रा में जब हम 'सीनियर सिटीजन' के पड़ाव पर पहुँचते हैं, तो अक्सर लोग इसे विश्राम का समय मानते हैं। लेकिन असल में, यह समय स्वयं को खोजने और उन सपनों को जीने का है जो जिम्मेदारियों के शोर में कहीं दब गए थे। वास्तव में यह खाली समय नहीं, यह 'अपना' समय (ME TIME)है
काम और परिवार की व्यस्तताओं से मुक्त होने के बाद, वक्त का एक बड़ा हिस्सा हमारे पास होता है। हमारी खोई हुई रचनात्मकता, इस खालीपन को, रंगों, धागों या गायकी के शब्दों से भर देती है। जब हम कुछ नया बनाते हैं चाहे वह पेंटिंग हो, बुनाई हो, या कोई अन्य कला ,तो यह केवल एक वस्तु नहीं होती, बल्कि हमारे अनुभवों का निचोड़ होती है।
 मन की शांति और स्वास्थ्य का संगम,का
कला से, सीधा संबंध ,हमारे मानसिक स्वास्थ्य से है। जब हम किसी रचनात्मक कार्य में डूब जाते हैं, तो तनाव कम होता है! एकाग्रता बढ़ने से मन शांत रहता है साथ ही याददाश्त तेज रहती है! नई चीजें सीखना सिखाना ,और उनकी बारीकियों पर ध्यान देना , हमारे मस्तिष्क को सक्रिय रखता है।
अकेलेपन से मुक्ति मिलती है ,हमारी ये कलायें ही,हमें खुद का सबसे अच्छा दोस्त बना देती है।
सृजन का आनंद लेते हुए ,जब एक कोरे कैनवास या कागज पर रंग बिखेरना, या ऊन के गोलों से एक सुंदर स्वेटर बुनना, पुराने गीतों को गाकर,मुझे एक अलग ही संतुष्टि का अनुभव देता है। एक अहसास सा होता है कि "मैंने कुछ नया सीखा है ,बनाया है", यही मेरे अंदर के आत्मविश्वास को बढ़ाता है।में सोचती हूँ हमारी यही कल्पना शक्ति,आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनमोल विरासत और प्रेरणा बन सकती है।
बढ़ती उम्र का मतलब रुकना नहीं, बल्कि अपनी पसंद के रंगों में, रंग जाना होता है। रचनात्मकता वह खिड़की है जिससे हम दुनिया को, फिर से एक बच्चे की जिज्ञासा की तरह देख सकते हैं। तो चलिए, अपनी रुचि को पहचानें और इस सुनहरे समय को और भी हसीन बनाएँ।कहते हैं कि उम्र केवल अंकों का खेल है, और जब हाथ में ब्रश और सामने एक कोरा कैनवास हो, तो समय जैसे ठहर सा जाता है। मेरे लिए पेंटिंग और गायकी केवल एक शौक नहीं, बल्कि मौन संवाद का, एक खूबसूरत नजरिया सा है। अपनी अनुभूतियों को हम इसी तरह जीवंत रख सकते हैं।
 
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, मन को शांत और केंद्रित रखना एक चुनौती होती है। कार्य एक प्रकार का 'सक्रिय ध्यान' (Active Meditation) है। ब्रश के हर स्ट्रोक और रंगों के मिश्रण पर ध्यान लगाने से मन की उथल-पुथल शांत हो जाती है औरगायकी से एक असीम शांति का अनुभव सा होता है।
 नए रंगों को मिलाना और अलग-अलग तकनीकों को सीखना मन को युवा बनाए रखता है।
 कभी-कभी जो बातें हम कह नहीं पाते, वे पेंटिंग के जरिए रंगों के रूप में बाहर आ जाती हैं।
 इसी तरह गायकी करते समय ,घंटों का पता नहीं चलता, जिससे बोरियत या अकेलेपन की जगह सृजन का आनंद ले लेता है।

जब हम अपनी बनाई हुई पेंटिंग को घर की दीवार पर सजाते हैं या अपने नाती-पोतों को दिखाते हैं, तो उनकी आंखों की चमक हमें एक नई ऊर्जा देती है। यह कला हमें समाज और परिवार से एक नए रूप में जोड़ती है।

जीवन एक जादुई सफर है जहाँ कोई 'गलती' नहीं होती, बस नए प्रयोग होते हैं। हमारे पास अनुभवों का जो खजाना है, उसे कैनवास पर बिखेरने का और माइक हाथ में पकड़के गाने का ,सबसे सही समय यही है। 
"हाथों की लकीरें भले ही धुंधली पड़ जाएं, लेकिन रंगों से बनी यादें हमेशा चमकती रहती हैं।"
 "कलाओं की कोई उम्र नहीं होती, बस एक दिल चाहिए जो धड़कना और बनाना जानता हो।"

अनिता सुखवाल
उदयपुर