शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

*दर्द*

 मैं भी इंसान हूँ..." 🌧️🕊️


हर रोज़ मुस्कुराती हूँ, पर कभी-कभी में भी अंदर से रोती हूँ,

भीड़ में सबसे मिलती हूँ, पर अंदर से अपने आप को खोती भी हूँ।


हर चेहरे पे हँसी बाँटती हूँ,कोशिश यही होती है मेरी

पर अपने ग़म किसी से नहीं कहती,आदत है मेरी, 

क्योंकि मैंने सीखा है —

हर सवाल का जवाब देना

हर बार ज़रूरी नहीं होता।


मैं पत्थर नहीं…

जो ठोकरें खा के भी ,आवाज़ न करे,

मैं भी एक इंसान हूँ…

फिर भी कभी-कभी ,टूटकर, खुद से ही माफ़ी माँग लेती हूँ।


कभी किसी की जीत में तालियाँ बजाईं,

तो कभी खुद की हार पे चुपचाप सिर भी झुकाया है मैने।

मैंने रिश्तों को बचाने में खुद को खोया,

पर कभी किसी को ये एहसास तक नहीं होने दिया।


कई लोग कहते भी हैं —

"तू तो मजबूत है ..."

पर कोई नहीं जानता —

मजबूती की इस, दीवार के पीछे, 

एक थका हुआ दिल, हर रात बिखरता भी है।


मैं दिखती हूँ शांत समंदर सी,

पर अंदर ज्वार मेरे भी उठते हैं — 

रोज़… हर लम्हा उठते हैं।


कभी-कभी जी चाहता है —

कि कोई तो पूछे...

"तू ठीक तो है ना?" 



मंगलवार, 2 सितंबर 2025

*कभी नहीं सोचा*

 कभी सोचा है…हम कौन हैं 

क्या हैं, किधर हैं, क्यूँ हैं 


हर वक़्त भाग रहे हैं हम 

किसी और के जैसा बनने के लिए 


अपने जैसा बनने में 

अपने दिल की सुनने में 

पता नहीं कौन सा डर है हमें 


जिसके साथ ख़ुश हैं 

उसके साथ होते नहीं 

जो पाना चाहते हैं 

वो मिलता नहीं 

हर वक़्त ख़ुद से जाने 

कितने समझौते 

करते हुए जिये जा रहे हैं 


अपने ही भीतर की 

आवाज़ को 

अनसुनी कर 

बाहर के शोर में 

ख़ुद को 

खोते चले जा रहे हम 

सबके लिए और 

सबके हिसाब से जीते जी

सबके जैसे बनने की 

होड़ में ख़ुद को ही 

मारते जा रहे हम 


कौन है हम वास्तव में 

क्या चाहते हैं हम ?

क्या ये सवाल ख़ुद से 

कभी करते हैं हम ?


शायद नहीं… 

क्यूँकि ख़ुद के भीतर 

झांक कर देखना ही 

नहीं चाहते हम

अपनी ही सच्चाई से डरते हैं हम

दुनिया के इस बने बनाए ढाँचे में 

ख़ुद को कैसे भी करके फ़िट करते हम ll


अनिता ✍️